मप्र लोकसभा चुनाव : कसौटी पर कमल-नाथ

MP elections

राघवेंद्र सिंह

लोकसभा चुनाव को लेकर उलटी गिनती शुरू हो गई है। सभी दलों ने रणनीति बनाने और नेताओं-कार्यकर्ताओं ने अपने हिसाब से पार्टी नेतृत्व को दबाव बनाने का काम शुरू कर दिया है। कांग्रेस में इसके चलते प्रियंका गांधी बढेरा युग की शुरुआत हो चुकी है। यंग वोटर्स को रिझाने में प्रियंका और उनके साथ महासचिव बनाए गए ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस का एक बड़ा फैसला है। भाजपा के पास युवा वोटर्स को अपने पाले में लाने का कोई एक्शन प्लान नजर नहीं आता।
MP elections: Kamal Nath on the criterion
मध्यप्रदेश के संदर्भ में देखें तो भाजपा-कांग्रेस दोनों में हाईकमान के फैसले हार-जीत पर बड़ा असर डालेंगे। कांग्रेस के लिहाज से टीम कमलनाथ और विधानसभा में नाकाम रहे चेहरों के साथ भाजपा मैदान में है। दावोस यात्रा से लौटे मुख्यमंत्री कमलनाथ का ध्यान किसानों की कर्जमाफी के साथ उनमें आ रही दिक्कतों पर तो होगी ही, साथ ही स्कूल-कॉलेज और अस्पतालों की समस्या भी उनके रिपोर्ट कार्ड पर असर डालेगी। कानून व्यवस्था और रेत खनन को लेकर भी कमलनाथ सरकार पर जनता की नजर पैनी बनी हुई है। इन क्षेत्रों में नतीजे आदर्श भले ही न हों सामान्य से नीचे गए तो फिर लोकसभा में कांग्रेस का प्रदर्शन जैसी पार्टी उम्मीद कर रही है उसके मुताबिक होने के अनुमान कम हैं।

जहां तक रेत खनन का मामला है हालात बदले नहीं हैं बल्कि पहले से ज्यादा बिगड़ते दिख रहे हैं। होशंगाबाद और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी की ही बात करें तो दिन-रात दौड़ रहे ओवरलोड रेत के डंपर कमलनाथ सरकार की छवि पर बट्टा लगा रहे हैं। स्थितियां नहीं सुधरीं तो भाजपा की सक्रियता को देखते हुए यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि भाजपा खुद रेत जैसे मुद्दों पर कोई बड़ा प्रदर्शन या आंदोलन करे। अभी अंदरखाने की खबर यह है कि सिर्फ रेत खनन वाले हाथ बदले हैं, बाकी डंपर और दलाल तो पहले की तरह काम में लगे हैं। ओवरलोडिंग के कारण करोड़ों की लागत से बनी सड़कें बर्बाद हो रही हैं और सड़कों पर गाय-बैल के साथ आम वाहन चालक भी डंपरों की टक्कर का शिकार हो रहे हैं। इस मुद्दे पर जिले से लेकर राज्य स्तर तक हफ्ता और महीना देने की खबरें जनता में आम हो रही हैं। कह सकते हैं कि रेत के मुद्दे पर भी कमलनाथ सरकार कसौटी पर है।

जनवरी खत्म हो रही है। स्कूल-कॉलेजों में शिक्षक और प्राध्यापकों की कमी के चलते इस बार फिर नकल का बोलबाला रहेगा। खतरनाक बात यह है कि टीम कमलनाथ पढ़ने और पढ़ाने के मामले में कोई ध्यान दे रही है, ऐसा नजर नहीं आता। एक स्कूल आठवीं क्लास तक का है और उसमें आठ शिक्षक की बजाय सिर्फ एक ही मास्साब हैं। अब बताइए आठ क्लास और पढ़ाने वाले मात्र एक। ऐसी ही कुछ हालत उच्च शिक्षा की है। मान सकते हैं कि एक दिन में कोई जादू नहीं कर सकता लेकिन शिक्षक और प्रोफेसरों की भर्ती के लिए अभी कोई बड़ी कोशिश नहीं हुई है। इसका मतलब अगला सत्र भी शिक्षा के मामले में अनाथों की तरह रहेगा।

किसानों के मामले में 2 लाख की कर्जमाफी का जो ट्रंप कार्ड कांग्रेस ने खेला उसका असर यह हुआ कि 15 साल बाद मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। लेकिन कर्जमाफी को लेकर जो अटपटी खबरें गांव देहात से आ रही हैं उसका समाधान नहीं निकाला गया तो लोकसभा चुनाव में भाजपा इसका लाभ ले सकती है। मुख्यमंत्री कमलनाथ सतर्क हैं और उन्होंने कर्जमाफी में गड़बड़ी करने वालों पर कार्रवाई के साथ एफआईआर भी करने के निर्देश हुए हैं।

हर ग्राम पंचायत ने गौशाला बनाने के मुद्दे पर कांग्रेस सरकार का रवैया उम्मीद से थोड़ा कमजोर नजर आता है। गांव गांव और सड़कों पर घूम रहे आवारा मवेशियों को शहरों में तो पकड़ा जा रहा है पर असल शिकायत गांव से आ रही है। आवारा पशुओं से फसलों को बचाने के लिए किसान दिन रात खेतों में खड़ा हुआ है। ऐसे में हर गांव में गौशाला नहीं खुलने की चर्चा हाट बाजारों से लेकर चौपालों तक में हो रही है। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ता ब्लॉक और जिला स्तर के नेता इस मुद्दे पर ग्रामीणों को जवाब नहीं दे पा रहे हैं। मार्च में लोकसभा चुनाव को लेकर आचार संहिता लगने का अनुमान है। ऐसे में सरकार को काम करने के लिए एक डेढ़ महीना ही बचा है।

कानून व्यवस्था को लेकर भी कांग्रेस सरकार घिरती दिख रही है। हालांकि कई बार पुलिस की भाषा में कहें तो क्राइम वेब चलती है। ऐसा जब होता है तो अपराध को रोकना मुश्किल रहता है। जानकार कहते हैं कि अगर हर आदमी के पीछे एक पुलिस लगा दी जाए तब भी क्राइम वेब के चलते अपराध घटित हो ही जाते हैं। हालांकि पिछले दिनों भाजपा नेताओं की हत्या की घटनाएं ज्यादा सामने आई हैं। इसे लेकर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस सरकार पर लापरवाही के आरोप लगाए हैं।

गौर पर गौर करने की जरूरत…
पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर भले भी भाजपा लीडर हैं मगर उनके प्रिय नेताओं में कांग्रेस के अर्जुन सिंह, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह शामिल हैं। लोकसभा चुनाव के पहले उन्होंने अपनी पार्टी को यह कहते हुए निशाने पर लिया कि अब यह कुशाभाऊ ठाकरे जैसे नेताओं की पार्टी नहीं बची है। उन्होंने यह भी कहा कि दिग्विजय सिंह ने उन्हें भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया है। इसके पीछे उनका हाईकमान पर दबाव बनाने का मन भी नजर आता है। असल में वह अपना राजनीतिक पुनर्वास चाहते हैं। नेतृत्व चाहे तो उनके लिए चुनाव के पहले राज्यपाल और राजदूत बनाए जाने के रास्ते खुले हुए हैं। अब देखते हैं कि आगे आगे होता है क्या। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी एक यात्रा में कह चुके थे कि एक बार और बाबूलाल गौर।

इमरती ने कराई जगहंगाई…
कांग्रेस में मंत्री इमरतीदेवी का गणतंत्र दिवस पर मुख्यमंत्री कमलनाथ का संदेश नहीं पढ़ पाना जगहंसाई का मुद्दा बना हुआ है। आज के दौर में हिन्दी नहीं पढ़ सकने वाली नेता को मंत्री बनाना किसी को हजम नहीं हो रहा है, खासतौर से नौजवानों को। अगर मंत्री भी नहीं पढ़ पाएंगी तो विभाग कैसे चलाएंगी? यह दिक्कत छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिली है जहां शपथ समारोह में एक मंत्री शपथ तक नहीं पढ़ पाए थे।
( लेखक IND24 न्यूज चैनल समूह के प्रबंध संपादक)

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