हे भगवान इनको माफ करना ये नहीं जानते मीडिया क्या है….

ब्रजेश राजपूत की ग्राउंड रिपोर्ट

वो हमारे शर्मा जी के मित्र वर्मा जी थे जिनसे थोडी देर पहले ही परिचय हुआ था। सेंट्रल सर्विस के रिटायर्ड अफसर थे जिनके बच्चे विदेश में हैं और यहां चाय पीने और गप्पें करने गाहे बगाहे चले आते हैं। जैसे ही उनको पता चला कि अपन टीवी मीडिया के पत्रकार हैं और चैनल का नाम सुनते ही सुलग उठे और मुंह में कम से कम बीस मिर्ची की कडवाहट और जलन घोल कर बोले अरे भाई क्यों पीछे पडे रहते हो आप और आपका चैनल मोदी जी के पीछे। काम करने दो उनको। ऐसा नेता फिर इतिहास में नहीं मिलेगा।
O God, forgive them, they do not know what the media is ….
बातचीत की शुरूआत ही ऐसी होगी अंदाजा नहीं था। मुझसे संभलते नहीं बना मैंने कहा नहीं मोदी जी के पीछे क्यों पडेगे वो हमारे पीएम हैं। मगर वो मानने को तैयार नहीं थे अरे कहां जब आपका चैनल खोलो मोदी और शिवराज की बुराई के अलावा और कुछ चलता ही नहीं है। कुछ देशभक्ति और विकास की बातें भी बताया करो।

मैंने कहा कि अभी पंद्रह अगस्त को तो हमारे चैनल ने सुबह से शाम तक देशभक्ति दिखाई थी। सुबह मोदी जी का भाषण दोपहर में अक्षय कुमार से शहीदों का सम्मान और शाम को देशप्रेम की कविताओं वाला कवि सम्मेलन और क्या चाहिये। फिर सरकार की नीतियों की आलोचना करना देशद्रोह नहीं है। ये आपको समझना होगा। मगर वो मानने को तैयार नहीं थे। आज कल ऐसे लोगों से अक्सर पाला पडता रहता है जो मानते हैं कि आप सरकार के खिलाफ कहानियां चलाकर माहौल बिगाड रहे हो।

अब मैने उनको ये समझाने की कोशिश छोड दी कि पत्रकारिता हमेशा से ऐसी होती रही है। सरकार और विपक्ष पहले भी मीडिया और पत्रकारों के निशाने पर होती आयी है। दोनों की खिचाई खबरों में होती है। हां सरकार ज्यादा ताकतवर होती है उससे शिकायतें ज्यादा होती है इसलिये सरकार की पोल खोलती या फिर खिंचाई करती खबरें ज्यादा आतीं हैं और पढी और सराही भी जाती है। मीडिया किसी व्यक्ति विशेष की बात कम समाज की बात ज्यादा कहता है।

मगर मीडिया इन दिनों निशाने पर है। जनता हर चीज की उम्मीद मीडिया से करते हैं मीडिया जनता की उम्मीदें दिखाये, मीडिया जनता की परेशानियां दिखाये, मीडिया ईमानदार रहकर भ्रष्टाचार की खबरें दिखायें, मीडिया सरकार के अच्छे काम दिखाये, और इन सब बातों के अलावा मीडिया निष्पक्ष भी रहे। आजकल एक उम्मीद और की जाने लगी है मीडिया राष्टभक्त और राष्टवादी भी रहे और इसका पैमाना यही है कि आप राष्टवादी और राष्टभक्त सरकार के खिलाफ खबरें ना छापें ना चलायें और ना दिखायें।

अब इस तस्वीर का दूसरा पहलू देखिये। मेरे एक परिचित राजधानी के नामी डाक्टर हैं आजकल उनके ज्यादातर वाटसअप संदेशों में ताने ही भरे रहते हैं। मीडिया बिक गया है मीडिया निष्पक्ष नहीं रह गया है सरकार की वाहवाही करता रहता है हिम्मत नहीं है सच्ची खबरें दिखानें की वगैरह वगैरह। आज सुबह ही उनका व्हाटएप पर मैसेज आया तो अब तो आपका चैनल टीआरपी में नीचे पहुंच गया होगा, जो कुछ हुआ उसका संदेश अच्छा नहीं गया। हमने कहा नहीं हमारा चैनल टीआरपी मीटर में नंबर दो पर आ गया है। आजतक के बाद हमारा चैनल ही देखा जा रहा है।

उनका जबाव था लेकिन मैंने देखना छोड दिया तो हमने कहा आपने भले ही छोड दिया हो मगर जनता पसंद कर रही है। आपकी पसंद नापसंद कुछ व्यक्ति हो सकते हैं मगर चैनल खबरों और उनके प्रस्तुतिकरण के कारण देखे और पसंद किये जाते हैं। कितना भी दबाव हो मीडिया को मीडिया जैसा दिखना और करना ही होगा। लोग मीडिया में क्या देखना सुनना चाहते हैं वो तो आपको बेहतर तरीके से दिखाना ही होगा तभी आप खबरों के बाजार में बने रह सकते हो। उधर मीडिया कारोबार करना आसान नहीं होता। दो रूप्ये में मिलने वाला अखबार पांच रूप्ये का होता है। रोज का लाखों कापियों में होने वाला घाटे को बाजार से पैसा कमाकर बैलेंस करना पडता है।

मगर इस बैंक बैलेंस बनाये रखने में भी बडी बैलेंस की जरूरत होती है। मीडिया यदि बाजार और सरकार के हाथों खेलने लगा तो फिर मीडिया नहीं रह जाता ऐसे में वो पहचान और साख खो देता है। मीडिया को नसीहत देने वाले और हिमालय सरीखें उम्मीदें करने वाले लोग इस परिपेक्ष्य में नहीं सोच पाते इसलिये आजकल जब शर्मा जी के घर मिले वर्मा जी या हमारे डाक्टर साहब कुछ कहते हैं तो हम मन ही मन में यहीं सोचते हैं कि भगवान इनको माफ करना ये नहीं जानते मीडिया की सच्चाई क्या है।

एबीपी न्यूज, भोपाल

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