शर्म है……मगर आती किसी को नहीं!

Raghvendra Singh 
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने एक भाषण में कहा था कि पलासी के युद्ध के समय जितने लोग रणभूमि में लड़ रहे थे उससे ज्यादा लोग बाहर खड़े होकर तमाशा देख लड़ाई के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे। देश के भाग्य का निर्णय होने जा रहा था मगर उसमें पूरा देश शामिल नहीं था। अगर तमाशा देखने वाले भी युद्ध के मैदान में होते तो भारत का इतिहास और भूगोल दोनों बदला हुआ होता। हमने न केवल लोगों को बांटा बल्कि कौन देश के लिए लड़ेगा और कौन पूजा पाठ करेगा इसमें लोगों को अलग-अलग कर दिया। देश की जो हालत है आज सबके सामने है। मगर पलासी युद्ध की जो मानसिकता थी वह आज भी देशवासियों में कूट कूट कर भरी हुई लगती है। इतिहास से कोई सबक न तो नेताओं ने लिया न सरकारों ने और न समाज ने। इसलिए सबकुछ गड्ड-मड्ड है। सुधार का कोई सिरा नहीं मिल रहा है। दरअसल हम बात कर रहे हैं, नदियों और पेयजल व पर्यावरण के बारे में। मध्यप्रदेश में हाल ही में दिवंगत हुए नेता केन्द्रीय मंत्री रहे अनिल माधव दवे के नदी चिंतन पर पिछले चार साल से तीर्थ कहे जाने वाले बांद्राभान के नर्मदा तट पर हुए नदी महोत्सव से रिसकर आने वाली बातों पर ।
शुरुआत भले ही हमने अटलजी के भाषण के अंश से की है लेकिन दिवंगत दवेजी की भतीजा बहू धरा पांडे के सोशल मीडिया पर पिछले दिनों पांचवे नदी महोत्सव को लेकर वायरल हुई प्रतिक्रिया भी इसकी महत्वपूर्ण वजह बनी है। धरा जी लिखती हैं… कुछ तो शर्म करते सरकार।
हमारा यहां कहना है शर्म तो है,मगर वह आती किसी को नहीं है। सरकारें तो पहले से ही इससे अछूती रही हैं। कमोबेश बहुत से नेता भी इसी खाने में हैं। समाज भी शर्म के मामले में बेशर्म ज्यादा है। वरना जिस नर्मदा जी के दर्शन मात्र से पाप दूर करने लोग लाखों की तादाद में परिक्रमा करते हैं, वे ही नर्मदाजी को मैला करने में कोई शर्म नहीं करते। धरा जी ने अपनी पीड़ा में दवे जी का नाम पोस्टरों पर नहीं होने का जिक्र किया है। उन्होंने यह भी कहा कि लोग तर्क दे सकते हैं कि दवेजी ने अपनी वसीयत में अपने नाम से कुछ भी न करने का जिक्र किया था तब वे सवाल करती हैं कि फिर नदी महोत्सव के सभागार का नाम अनिल माधव दवे परिसर क्यों रख दिया गया। उनकी बात को पूरी तरह बताने के लिए हम उनका वायरल हुआ विचार आलेख में जस का तस रख रहे हैं। अब बात शुरू होती है मां नर्मदा को प्रदूषण से बचाने की। पहले तो नदी महोत्सव करने वाले दवे जी के साथी और उनके अनुयायियों को बधाई कि उन्होंने इस आयोजन को जारी रखा और नदियों के साथ पर्यावरण को बचाने पर विमर्श को बनाए रखा। बहुत माथापच्ची पिछले चार साल से हो रही है लेकिन हालत ये है कि होशंगाबाद और बांद्राभान के तटों पर नर्मदा जी पहले से ज्यादा मैली हुई हैं। यही बताता है कि आयोजन तो राष्ट्रीयस्तर की ऊंचाईयों को छू गया। मगर माई में मैला और गहरे तक चला गया। अब शर्म आने का नंबर समाज के साथ संस्थाओं पर भी आता है। हम आयोजन पर होने वाले खर्च के गुणा भाग में नहीं जाना चाहते। हमारा मकसद भी इस बात की पड़ताल करना नहीं है कि इसमें कितना खर्च सही था और कितना गलत। इस पर चर्चा होगी तो विषय़ बदलेगा और बात दूर तक जाएगी। इस मुद्दे पर किसी और मुफीद मौके पर लिखा पढ़ा जाएगा। अभी तो यह है कि गणित के जानने वाले समझते हैं कि सवाल हल करने के लिए माना कि (चूंकि) जमाने का रिवाज है सो मान लेते हैं कि हर साल आयोजन में पांच करोड़ खर्च आता होगा। (सही आंकड़ा तो आयोजक ही बताएंगे) यदि प्रतिवर्ष पांच करोड़ नदी महोत्सव पर व्यय हुए हैं तो पांच साल में 25 करोड़ की बड़ी रकम खर्च हुई मानी जाए। इस राशि से होशंगाबाद का मलमूत्र काफी हद तक नर्मदा जी में जाने से रोका जा सकता था। यह अलग बात है कि इसके बदले देशव्यापी प्रचार नहीं मिल पाता। लेकिन दवे जी की भावना और उनके सपने के अनुरूप नर्मदा माई में होशंगाबाद,बांद्राभान,बुदनी,जहानपुर,जोशीपुर,शाहगंज और आसपास के कई इलाकों में गांव और कस्बों का मैला जाने से रोका जा सकता था। हालांकि अब दवेजी नहीं हैं मगर उनके विचार और मानने वाले जरूर हैं और वे भविष्य में कुछ जमीन पर उतारने वाले काम अवश्य करेंगे। नदी महोत्सव के नाम पर होने वाले आयोजन निश्चित रूप से राष्ट्रीयस्तर पर फल देने वाले होंगे मगर बांद्राभान और होशंगाबाद में नर्मदा जी में प्रदूषण बढ़ा है तो यह सरकार समाज और नदी महोत्सव सबके लिए शर्म की बात है। क्योंकि बात हो रही है नर्मदाजी समेत प्रदेश की नदियों और पहाड़ों और जंगलों को बचाने की। लेकिन जबसे प्रदेश की जीवन रेखा मां नर्मदा को बचाने की बात हो रही है तब से उनके मरने के खतरे ज्यादा हो गए हैं। नर्मदाजी के उद्गम अमरकंटक से थोड़ा आगे ही उनकी धार दिखनी बंद हो जाती है। दरअसल वे अपनी एक सौ उन्तीस सहायक नदियों सतपुड़ा और विन्ध्यांचल के घने जंगल साल के पेड़ों के काऱण अविरल बह रहीं हैं लेकिन ये नदियां भी या तो सुख रही या नाले में बदल गई है। साथ ही अपनी जड़ों के जरियें पानी देने वाले साल के वृक्ष भी लगातार काटे जा रहे हैं। पहाड़ सड़क बनाने के काम आ रहे हैं और प्राकृतिक रूप से पानी को साफ करने वाली रेत भी जेसीबी मशीनों से माई की छाती छलनी कर निकाली जा रही है। अच्छा होता समाज,सरकार औऱ महोत्सव मनाने वाले फाईव स्टार आयोजन करने के साथ मैदानी रूप से भी माई को बचाने का काम करते। अभी तो जो कुछ हो रहा है उस पर यही कहा जा सकता है कि नर्मदाजी सहित नदी,पहाड़ों और वनों को बचाने की बात हो रही है। उन पर चिंतन हो रहा है औऱ खास जगहों पर उसका जिक्र भी हो रहा है। एक जुमला है अगर नौकरी सफलता पूर्वक करनी है तो तू काम मत कर, काम का जिक्र कर। जिक्र भी मत कर,काम की फिक्र कर। अभी तो ऐसा कुछ ज्यादा नजर आ रहा है।
धरा जी के मुताबिक सरकार में और हमारे मुताबिक पाप धोने वाले समाज में शर्म है तो जरूर, महोत्सव मनाने के साथ जमीन पर काम करने और परिणाम देने की दरकार है। नतीजे देने के लिए बहुत होते हैं। वामपंथियों का एक नारा है…जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करती। अब कुछ हो न हो कम से कम होशंगाबाद,बुदनी,बांद्राभान समेत आसपास के गांव और कस्बों का मैला नर्मदा माई में नहीं मिलेगा। पीने लायक भले ही नर्मदा जल अभी न हो नहाने लायक तो बना रहेगा। नर्मदाजी को बचाने में जितने लोग लगे हैं उससे कई गुना ज्यादा तमाशा देखने में लगे  हैं। नर्मदा यात्रा और परिक्रमाएं जबसे राजनेताओं ने शुरू की है तब से वे धर्म कम सियासत के लाभ हानि का गणित बनकर ज्यादा रह गई हैं।
होशंगाबाद के वरिष्ठ पत्रकार साकेत दुबे कहते हैं महोत्सव में जैसी कथनी नजर आती है अगर वैसी करनी हो जाये तो नर्मदा जी बच सकती है।
कुछ तो शर्म करते सरकार….
अभी-अभी पंचम नदी महोत्सव स्थल से निकली हूँ।यह स्थल बांद्राभान का वही नर्मदा तट है,जो पूर्व में भी नदी महोत्सव का स्थान रहा है।कुछ बातें बहुत ज़्यादा अखरती हैं।भोपाल और होशंगाबाद में पंचम नदी महोत्सव के बहुत से होर्डिंग्स देखे। पर हर जगह मैं वह नाम और चेहरा देखने के लिए तरसती रही जिसने इस नदी उत्सव की नींव रखी।कहीं एक तस्वीर नहीं,कहीं नाम तक नहीं! मेरे ऐसा कहने पर यदि आप इसका जवाब इस तर्क के रूप में देते हैं कि अनिल जी तो अपनी वसीयत में अपने नाम से कुछ भी न करने के लिए कहकर गए थे तो मेरा सवाल आपसे यह है कि फिर क्यों आपने इसी महोत्सव के एक हॉल का नाम ‘अनिल माधव दवे परिसर’ रख दिया? क्यों नहीं मानी पूरी बात ? अनिल जी तो होर्डिंग्स वाली राजनीति के भी विरोधी थे।
उन्होंने कहा था लेकिन उनके कामों को और उनके नाम को ज़िंदा रखने की ज़िम्मेदारी हम सब की है। खानापूर्ति तो बस खानापूर्ति ही होती है साहब। उसके कितने भी बहाने दिए जाएँ वो सांत्वना नहीं देते।
इसी तट पर ‘श्री अनिल माधव दवे’ के अंतिम संस्कार पर हमारे माननीय मुख्यमंत्री जी ने बड़े ही मार्मिक ढंग से यह घोषणा की थी कि “अनिल जी नहीं रहे तो क्या हुआ, अब नदी महोत्सव सरकार करवाएगी”।
सरकार, आप इतनी जल्दी भूल गए उनको? थोड़ा वक़्त तो हुआ होता। किसी ने मुझसे कहा था कि “राजनीति में ग़लतियाँ या भूल नहीं होतीं” इसलिए इस ग़लती को आप भूल कहकर टरका नहीं सकते।
यदि प्रदेश संगठन के एक बड़े अधिकारी एवं नर्मदा समग्र के समस्त कार्यकर्ता न होते तो शायद यह आयोजन भी न होता। उन सभी को इस बात की बधाई कि ऐसी विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अनिल जी के इस आयोजन को ज़िंदा रखा अन्यथा ‘नदी महोत्सव’
केवल एक ‘हाईजैक्ड उत्सव’ बनकर रह जाता।
( जैसी कि अनिल माधव दवे की भतीजा बहू धरा पांडे ने सोशल मीडिया में अपनी बात रखी)

(लेखक IND 24 के समूह प्रबंध सम्पादक हैं।)

Raghvendra Singh 

Leave a Response