कर्जदार किसानों की सूची लगते ही प्याज की छिलके की तरह उजागर हो रहा फर्जीवाड़ा, मंत्री ने दिए जांच के आदेश

list of farmers

भोपाल। प्रदेश में कर्जमाफी योजना के क्रियान्वयन के साथ ही फर्जी अल्पकालीन कृषि ऋ ण का मामला भी उजागर होने लगा है। जैसे-जैसे पंचायतों में कर्जदार किसानों की सूची लग रही हैं, वैसे-वैसे फर्जीवाड़ा प्याज के छिलके की तरह उजागर होता जा रहा है। फर्जी लोन के साथ समिति और बैंक शाखा के स्तर पर ब्याज अनुदान घोटाले को भी अंजाम दिया गया। दरअसल, प्रदेश में शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर किसानों को कृषि ऋण मुहैया कराया जाता है। इससे होने वाले नुकसान की भरपाई सरकार जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों को हर साल 500 से 600 करोड़ रुपए ब्याज अनुदान देकर करती है।
The bogey of the farmers, when the list of farmers, is being exposed, like the onion peels, the minister ordered the inquiry
केंद्र सरकार से भी लगभग 300 करोड़ रुपए ब्याज और प्रोत्साहन अनुदान मिलता है। इस हिसाब से देखा जाए तो फर्जी ऋण के साथ ब्याज अनुदान में भी घोटाला किया गया। सहकारिता मंत्री डॉ.गोविंद सिंह ने इसकी आशंका जताते हुए विभाग को जांच कराने के आदेश दिए हैं। ग्वालियर के बाद होशंगाबाद और हरदा में फर्जी लोन के मामले सामने आए हैं। यहां किसानों ने कर्ज लिया ही नहीं और उनके नाम जय किसान कृषि ऋण मुक्ति योजना की सूची में आ गए। इसके मायने यह हुए कि किसान के नाम पर जो फर्जी कर्ज लिया गया, उस पर ब्याज अनुदान का लाभ भी लिया गया।

यह भी संभावना है कि इस खेल में समिति, बैंक शाखा और मुख्यालय के लोग भी शामिल हो सकते हैं, क्योंकि केस समिति के स्तर पर बनता है और शाखा उसे आगे बढ़ाती है। जिला मुख्यालय से स्वीकृति मिलती है। ब्याज अनुदान के दावे भी इसी क्रम में बनते हैं और जिला बैंक अपेक्स बैंक के जरिए राज्य सरकार से अनुदान की मांग करते हैं। सहकारिता विभाग के अधिकारियों का कहना है कि किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज दर पर अल्पकालीन ऋ ण देने में 11 प्रतिशत की लागत आती है।

इसकी भरपाई केंद्र (पांच प्रतिशत) और राज्य सरकार (छह प्रतिशत) से मिलने वाले अनुदान से की जाती है। केंद्र सरकार तीन प्रतिशत की सबसिडी देती है और दो प्रतिशत प्रोत्साहन अनुदान समय से कर्ज चुकाने वाले किसानों को दिया जाता है। इस प्रकार देखा जाए तो प्रदेश में फर्जी कर्ज के साथ ही ब्याज अनुदान घोटाले को भी अंजाम दिया गया।

सहकारी बैंक राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नहीं कर रहे कर्ज
सहकारी अधिनियम में प्रावधान है कि किसान जो कर्ज लेते हैं, उसकी सूची हर साल तहसीलदार को भेजी जाएगी और ऋ ण पुस्तिका में एंट्री होगी। राजस्व विभाग ने आॅनलाइन व्यवस्था लागू की है। इससे किसान के राजस्व रिकॉर्ड में आसानी से प्रविष्टि की जा सकती है।
व्यावसायिक बैंक तो इस सुविधा का लाभ ले रहे हैं, लेकिन सहकारी बैंकों में यह काम नहीं हो रहा है। माना जा रहा है कि इसके पीछे मुख्य वजह अनियमितता पर परदा डालना है। इस गड़बड़ी पर रोक लगाने के लिए तय किया गया है कि संस्था और पंचायत स्तर पर हर साल 31 मार्च तक दिए कर्ज की सूची का प्रकाशन अनिवार्य रूप से किया जाए।

मूल ऋण के साथ ब्याज अनुदान भी हड़पा : डॉ.सिंह
सहकारिता मंत्री डॉ.गोविंद सिंह ने विभाग को दिए आदेश में लिखा कि किसानों के नाम से फर्जी ऋण दर्ज कर उस पर शून्य प्रतिशत ब्याज का लाभ भी दिया गया। इससे साफ है कि मूल ऋण के साथ केंद्र और राज्य सरकार के ब्याज अनुदान को भी हड़पा गया। ऐसे किसी भी मामले में दोषियों को बख्शा नहीं जाए। कानूनी कार्रवाई की जाए। होशंगाबाद और हरदा जिले की जांच बारीकी से हो। इसमें भी प्राथमिक साख सहकारी समिति खेड़ा और नीम गांव के सभी हितग्राहियों की जांच कराई जाए।

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