हम भी रिहर्सल करें क्या

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दिमाग की बात
सुधीर निगम

क्वीन की तबीयत खराब देख, भाई लोग शोक की रिहर्सल में जुटे हैं। कहीं गलती से भी कोई गलती न हो जाये। इसे कहते हैं परफेक्शन, जो भी होगा कायदे में होगा, बेकायदे की कोई जगह नहीं। एक हम हैं किसी की खबर आने पर भी जब तक ठोंक बजा न लें तब तक भरोसा नहीं करते। और करें भी क्यों, जेपी के मामले में तो बड़े बड़े गच्चा खा गए थे, उसके बाद हमारे देशवासी काफी सतर्क हो गए हैं। भाई किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता इस जालिम जमाने में। कल को हमारा दुश्मन हमारी खबर उड़ा दे और लोग यकीन कर लें, तो हम तो गए काम से।
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क्वीन जैसी व्यवस्था यहां हो जाए, तो कल्पना करिए क्या होगा। हमारे यहां राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी इसे एक आॅपरच्यूनिटी की तरह देखेंगे। एक कहेगा ‘यार वो बहुत उड़ रहा है, उसकी रिहर्सल करवा दें क्या। पब्लिक में मैसेज जाएगा कि अब ये तो कोई काम का नहीं और अपना काम बन जाएगा’। सयाना सा दिखने वाला दूसरा टुटपुंजिया अपना पूरा अनुभव निचोड़ कर सौ टके की सलाह देगा ‘ऐसा करियो भी मत भैय्या, जनता में उल्टी सहानुभूति चली जे है। और रिहर्सल के बाद भी टिक गयो तो समझ लो, तुम्हारे काम बनने की बजाय काम लग जे हैं।’

यदि किसी की रिहर्सल हो गई और डॉक्टर ने चमत्कार कर दिया, तब क्या होगा। अस्पताल से घर के रास्ते में अपने सहयोगी (साफ शब्दों में कहा जाए तो चमचे) से रिहर्सल हो चुकने वाला गब्बर स्टाइल में पूछेगा ‘कितने आदमी थे’। चमचा थोड़ा सोचने का ढोंग करते हुए ’40-50 तो थे भाईसाहब (चमचे अक्सर अपने माईबाप को इसी सम्बोधन से नवाजते हैं)’। माईबाप तो ‘हुंह’ कहकर गणित में डूब जाएंगे, लेकिन चमचा शुरू रहेगा ‘मिश्रा, दानिश, खिलावन, पांडे, खरे, ढाबे वाला, गणेश, साथ में आपके खास सेठ जी भी’। ‘सेठ जी भी’ अचानक माईबाप को झटका लगेगा और रिहर्सल सार्थक ही जाएगी।

एक खास पार्टी वाले तो मांग कर देंगे कि हम जिसकी चाहे उसकी रिहर्सल करेंगे। और एक बार रिहर्सल हो गई तो अगले को जिम्मेदारी पूरी करनी होगी, हम बार बार रिहर्सल नहीं करेंगे। बस बहुत हुआ भैया अपन भी चलते हैं, कहीं कोई अपनी ही रिहर्सल न कर दे।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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