भोपाल। मप्र में 28 नवंबर को होने वाले चुनाव में नोटा का सोटा किस-किस पर पड़ेगा, इसका अंदाजा अभी किसी को भी नहीं है, फिलहाल नोटा जिसे चाहे नाट आउट कर दे और जिसे चाहे आउट करार दे दे। पिछले चुनाव में इसी नोटा ने कांग्रेस के 14 और भाजपा के 12 प्रत्याशियों को आउट कर दिया था, जिससे इन 26 प्रत्याशियों के विधानसभा पहुंचने का सपना अधूरा रह गया।
Nota has changed 26 candidates in 2013, defeat-winning equation
दरअसल, चुनावी रण में हर विधानसभा सीट पर थोक के भाव में प्रत्याशी मैदान में उतरते हैं, जिनमें से सिर्फ एक ही प्रत्याशी को विधानसभा में पहुंचने का मौका मिलता है, लेकिन कई बार इस हार जीत का फासला इतना कम होता है, जिसे भुलाना प्रत्याशियों के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है, कई बार ऐसी हार-जीत इतिहास के पन्नों में भी दर्ज हो जाती हैं, जैसे बेहद कम अंतर से हार-जीत या दो प्रत्याशियों को एक समान वोट मिलना।
साल 2015 में इस हार जीत में एक और अध्याय जुड़ा, जिसे नोटा नाम से जाना जाता है, जो मतदाताओं को कोई भी प्रत्याशी पसंद नहीं आने पर नोटा का बटन दबाने का विकल्प देता है। यही वजह है कि हारा हुआ प्रत्याशी तब अपनी हार को और भी नहीं भुला पाता, जब वोट निकटतम प्रतिद्वंदी की बजाय अदृश्य प्रत्याशी को चला जाये, यानि नोटा का वोट बढ़ने से राजनीतिक दलों की चिंता भी बढ़ जाती है। चुनाव में सभी प्रत्याशियों की नींद उड़ाने वाला उम्मीदवार है नोटा।
मप्र में पिछले विधानसभा चुनाव में इसी नोटा ने कांग्रेस के 14 और भाजपा के 12 उम्मीदवारों की लुटिया डुबा दी थी और अब सपाक्स द्वारा नोटा का बटन दबाने की अपील कइयों का खेल बिगाड़ सकती है। पिछले विस चुनाव से पहले प्रत्याशियों की हार-जीत वोटरों की पसंद और नापसंद का ही एक पैमाना हुआ करता था, लेकिन नवंबर 2013 में पांच राज्यों में हुए चुनावों में जब नोटा का प्रयोग शुरू हुआ था। तब से अब तक प्रत्याशियों की जीत हार में नोटा भी अपनी भूमिका निभाने लगा है।
वहीं, राजनीतिक दलों की बात करें तो भाजपा का साफ तौर पर कहना है कि नोटा का उपयोग हमेशा सत्ता के खिलाफ होता है, भाजपा का वो कार्यकर्ता नोटा का बटन दबाता है, जो पार्टी की दादगीरी से दुखी है, ऐसे ही लोग नोटा को वोट देते हैं। वहीं पार्टियों के अपने-अपने मत हैं और विजय फतह करने की दावेदारी कर रही हैं। हालांकि, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
साल 2013 में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और दिल्ली विधानसभा चुनाव में कुल 1.85 फीसदी मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था, जबकि इससे अगले साल 2014 में आठ राज्यों के विधानसभा चुनावों में यह आंकड़ा गिरकर 0।95 फीसदी रह गया। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में 1.1 फीसदी लोगों ने नोटा का प्रयोग किया था।
सन 2015 में दिल्ली विस चुनाव में सबसे कम 0.40 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना, जबकि बिहार में सर्वाधिक 2.49 प्रतिशत वोटरों ने इसे अपनाया। साल 2016 में असम, पश्चिम बंगाल, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में 1.1 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। अब नजर मध्यप्रदेश में नोटा के उपयोग पर।

