कानून क्या सबकी भौजाई है…

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बाखबर
राघवेन्द्र सिंह

बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण से लेकर प्रमोशन में आरक्षण, एट्रोसिटी एक्ट, सबरीमाला मंदिर और दीपावली पर सिर्फ दो घंटे रात 8 से 10 बजे तक पटाखे चलाए जाएंगे जैसे सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर सिर झुकाकर अमल होना चाहिए क्योंकि अदालतें कानून की किताब के आधार पर निर्णय करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के बाद पुनर्विचार याचिका ही मुख्य विकल्प बचता है।
What is the law of all …
मगर लोग इसे छोड़ सड़क पर उतरते हैं और देश की संसद विरोध करने वाली भीड़ पर कानून का राज कायम करने की बजाए संसद में कानून को ही बदल दिया जाता है। यह बात अब इसलिए उठ रही है क्योंकि मध्यप्रदेश में भाजपा के एक सांसद ने कहा है कि वे कोर्ट के निर्णय के खिलाफ रात दस बजे के बाद पटाखे चलाएंगे भले ही उन्हें अवमानना पर गिरफ्तार कर लिया जाए।

दरअसल दीपावली के बाद विधानसभा के लिए प्रदेश में मतदान होगा। हो सकता है माननीय सांसद के दुस्साहस से पार्टी के वोट बढ़ जाएं और चुनाव में भारी जीत भी संभव है। दल तो चुनाव जीत जाएगा लेकिन कानून चुनाव हार जाएगा। अदालतें जीतें और कानून का राज हो इसकी चिंता वैसे तो सभी को करनी चाहिए लेकिन जो राजनैतिक दल हैं वो कानून का सम्मान न करें ये स्वीकार करना सबके लिए मुश्किल है। लेकिन हो ऐसा ही रहा है।

प्रमोशन में आरक्षण और एट्रोसिटी एक्ट के मामले में सत्ताधारी दल के साथ सभी पार्टियों ने सुप्रीम कोर्ट और संविधान पीठ के फैसले को भी दरकिनार कर बिना चू चपड़ के संसद में नए कानून के रूप में पास कर दिया। मसला संविधान और कानून से जुड़ा है। दोनों के प्रति पूरे सम्मान के साथ जो हालात हैं उसमें ये कहा जा सकता है कोर्ट और कानून को हम देसी कहावत के मुताबिक गरीब की लुगाई बना रहे हैं जो सबकी भौजाई बन गया है। भीड़ जिस फैसले के खिलाफ होती है हमारी संसद उसके मनमाफिक कानून बना देती है।

एक तरह से हम जिसका डंडा यानि जिसका बहुमत उसी की भैंस और बदलते संदर्भ में जिसके डंडे में दम कानून उसके हिसाब से चलेगा और जरूरत पड़ी तो उसी के हिसाब से बनेगा। भले ही ऐसा पूरी तरह न हो रहा हो मगर हेलमेट नहीं पहनने, सीट बैल्ट नहीं बांधने और रांग साईट गाड़ी चलाने व पार्किंग करने वाले जो जुमार्ना अदा करते हैं वो भोले भाले, सीधे-साधे कमजोर लोगों में यही संदेश जा रहा है कि जिसमे दम है अक्सर उसका बाल बांका नहीं होता। यह खतरनाक संदेश है।

मध्यप्रदेश समेत चार राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं और दिसम्बर में वहां नई सरकार बन जाएंगी। कुछ महीने बाद अगले साल लोकसभा के चुनाव भी हैं अगर कानून के खिलाफ सड़क पर उतरकर वोट बढ़ते हैं, अगर सड़क पर भीड़ देखकर संसद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ भीड़ के हिसाब से कानून बनाती है तो अभी भले ही वोट से सरकारें बन जाएं मगर कल भी ऐसा होगा इस पर लोग सवाल करेंगे। कानून को भौजाई बनाने से रोकना होगा। राजनीतिक दलों को भी कानून का बैंड बजाने वाले सदस्यों पर नकेल कसनी चाहिए।