कांग्रेस की राजनीति को भाजपा के ‘कामदार’ संजय मसानी भी कुबूल

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सोमदत्त शास्त्री
सचमुच, राजनीति अनंत संभावनाओं का मैदान है। यहां किसी भी क्षण बाजी, किसी भी करवट  बदल सकती है। ताजा उदाहरण संजय मसानी का है। कहते हैं, सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ, लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की धर्मपत्नी साधना सिंह के सगे भाई संजय मसानी टिकट की खातिर अब जीजाजी का साथ छोड़ कर कांग्रेस की डोलती डोंगी में चुनावी चप्पू चलाते नजर आ रहे हैं।
संजय सिंह, कल तक विवादास्पद हुआ करते थे।
BJP’s ‘Kamdar’ to Congress’s politics Sanjay Mashani, Kabul
उनकी नीलाक्ष इंफ्रास्ट्रक्चर नामक कंपनी जो मध्यप्रदेश और  महाराष्ट्र में कई प्रोजेक्ट चला रही है, कांग्रेस के निशाने पर थी। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का आरोप था कि संजय मसानी ने फर्जी और कूट रचित दस्तावेजों के सहारे अपनी कंपनी का पंजीयन कराया था। कांग्रेस उन पर बालाघाट जिले में अवैध खनन करने, फिल्मों में बेनामी धन लगाने जैसे अनर्गल आरोप लगाती रही थी। अब उनके सारे दाग-धब्बे कबूल करते हुए कांग्रेस ने उन्हें वारासिवनी से अपना उम्मीदवार बनाया है।

इस ‘नामदार’ के लिए कांग्रेस के कई ‘कामदार’ ठिकाने लगाए जा चुके हैं।एक और ताज़ा खबर यह है कि भाजपा से नाराज चल रहे सरताज सिंह को कांग्रेस ने  होशंगाबाद से टिकट दिया है।भाजपा से टिकट ना मिलने पर सरताज भावुक हो गए थे। इसके बाद उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन कर ली और कहा- आज कांग्रेस में मेरा पहला दिन है।  मैं घर में बैठकर घुट-घुटकर मरने वालों में से नहीं हूं।

लड़ूंगा तो मैदान में, मरूंगा तो मैदान-ए-जंग में।सरताज सिंह मध्य प्रदेश सरकार में पीडब्ल्यूडी मंत्री थे, लेकिन बढ़ती उम्र का हवाला देकर उन्हें पद से हटा दिया गया था। सरताज होशंगाबाद संसदीय क्षेत्र से 1989 से 1996 तक लगातार तीन चुनाव जीते। 1998 में उन्होंने चौकाने वाले अंदाज़ में अर्जुन सिंह को हराया था। 2004 में फिर लोकसभा के लिए चुने गए। वे अटल बिहारी वाजपेयी की 13 दिन की सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे। उन्होंने 2008 के विधानसभा चुनाव में सिवनी मालवा से कांग्रेस के धाकड़ नेता हजारी लाल रघुवंशी को हराया था । 2013 में फिर इसी सीट से चुनाव जीता और मंत्री बने थे ।

मध्यप्रदेश की राजनीति में मौका परस्ती का यह पहला और अकेला उदाहरण नहीं है। वर्ष 2003 में लक्ष्मण सिंह ने अपने ‘दादा भाई’ अर्थात दिग्विजय सिंह का साथ ऐसे समय पर छोड़ा था जब आम जनता ने उन्हें नकार कर सडक़ पर ला दिया था। लक्ष्मण सिंह तब भाजपा में शामिल हो गए और राजगढ़ चुनाव लडक़र कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर सांसद बने थे। दिग्विजय सिंह  तब राजगढ़ जिले में पार्टी के लिए प्रचार के दौरान कहा करते थे ‘‘जनता तय करे कि वह किसे चुनना चाहेगी’’।

जाहिर है कि वे द्विअर्थी संवाद बोला करते थे। तब भी लोगों का कहना था  कि राजा साहब ने भाजपा में भी अपना आदमी ‘प्लांट’ कर दिया ताकि मुश्किल वक्त में काम आए। बहरहाल, अगले चुनाव तक लक्ष्मण सिंह भाजपा को गरियाकर ‘घर’ लौट आए। दादा भाई के साथ नर्मदा यात्री रहे। कांग्रेस ने उन्हें चाचौड़ा सीट से टिकट देकर नवाजा है। कहने की बात नहीं कि यह टिकट उन्हें दिज्गी राजा की सहमति के बाद ही मिला होगा। दिग्विजय सिंह के परिवार से उनके बेटे जयवर्धन सिंह और उनके कई नजदीकी रिश्तेदार भी विभिन्न सीटों से चुनाव मैदान में हैं।

एक ही परिवार के सदस्यों का अलग-अलग पार्टियों में रहने का चलन अमूमन  पूर्व राजघरानों,जमीदारों में ज्यादा देखा गया। सिंधिया परिवार इसकी मिसाल है। कोई तीन पीढिय़ों से सिंधिया घराना सभी पार्टियों को साधे रखने का खेल बखूबी खेल रहा है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया जब भाजपा में थीं तब माधवराव सिंधिया कांग्रेस में थे। मध्यप्रदेश में जब भाजपा की सरकारें बनीं तब दीर्घ निस्वास लेकर राजमाता अक्सर कहा करती थीं ‘आज  अगर भैइया भाजपा में होते तो निश्चित रूप से सीएम बनते’।

माधव राव सिंधिया के लगातार विपरीत चलने से वे इस  हद तक  मर्माहत थीं कि एक बार तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि ‘ऐसी संतान को तो हाथी के पैरों तले कुचलवा देना चाहिए’। माधवराव सिंधिया के बाद भी उनकी दोनों बहनें वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे भाजपा में बनी रहीं लेकिन ज्योतिरादित्य कांग्रेस में शामिल हुए। यह परिवार कभी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में आमने-सामने नहीं होता। इस घराने की तरह अर्जुन सिंह के राजनीतिक  घराने में मचे घमासान से सभी वाकिफ हैं। अजय सिंह ‘राहुल’ के खिलाफ उनकी सगी बहन वीना सिंह लंबे समय से विद्रोह का झंडा उठाए हुए हैं। राजनीति में इसके रंग दिखाई देंगे।