शिवराज को घेरने में चूक गई कांग्रेस

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बाखबर
राघवेंद्र सिंह
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने प्रत्याशियों के चयन में खूब एहतियात बरता। इसके चलते सबसे ज्यादा निगाहें लगी थीं मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र बुधनी पर। यहां से कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के अघोषित दावेदार नेताओं में से किसी को भी मैदान में नहीं उतारा। इतना अलबत्ता है कि 2013 की तुलना में इस बार पूर्व केंद्रीय मंत्री, प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और मध्यप्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव के ज्येष्ठ पुत्र अरुण यादव को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ मैदान में उतारा है।
Congress lost to Shivraj
तुलनात्मक रूप से पिछले चुनाव में महेंद्र सिंह चौहान के मुकाबले अरुण यादव बेहतर उम्मीदवार हैं। मगर जिताऊ होंगे इस पर सबको संदेह हैं, शायद कांग्रेस को भी। इसकी वजह यह है कि अरुण यादव को बुधनी से खड़ा करने से पहले न तो कांग्रेस ने होमवर्क किया और न अरुण यादव ने कभी इस क्षेत्र का पूरा दौरा किया। मतलब इस उम्मीदवारी में रणनीति कम, बलि का बकरा ढूंढने की कवायद ज्यादा।

हॉकी, फुटबॉल और क्रिकेट जैसे खेलों की तरह राजनीति भी एक खेल है। इसलिए लीडर कहते हैं कि इसे खेल भावना से लेना चाहिए, निजी दुश्मनी के रूप में नहीं। खेलों में जिस तरह लोग विराट कोहली या एमएस धोनी जैसे खिलाड़ियों की कमजोरी को पकड़कर उन्हें आउट करते हैं वैसे ही राजनीति में भी नेताओं की कमजोरी को पकड़कर उन्हें घेरा जाता है। हॉकी, फुटबॉल में भी ज्यादा गोल मारने वाले खिलाड़ी को चार-चार खिलाड़ी मार्क करते हैं। जैसे मैसी की इतनी घेराबंदी की कि वर्ल्ड कप में वो कुछ कर ही नहीं पाए।

ऐसे ही अगर भाजपा के बड़े प्लेयर शिवराज सिंह चौहान को रणनीति के तहत कांग्रेस घेरती बुधनी विधानसभा चुनाव में अरुण यादव को 2 साल पहले से सक्रिय करती तो आज वे कड़ा मुकाबला करते नजर आते। नर्मदा परिक्रमा के नाम पर सक्रिय रहे दिग्विजय सिंह और टिकट दे दिया अरुण यादव को। हालांकि यह पार्टी की अपनी रणनीति हो सकती है। लेकिन बहुमत की स्थिति में मुख्यमंत्री के दावेदार की सूची में चुनाव मैदान से बाहर रहने के कारण प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योितरादित्य सिंधिया का नैतिक रूप से दावा कमजोर पड़ गया है।

अब इस दौड़ में भोजपुर से चुनाव लड़ रहे सुरेश पचौरी, चुरहट से अजय सिंह राहुल के साथ अरुण यादव का नाम जुड़ गया है। मगर शिवराज सिंह चौहान को बुधनी में ही घेरने की कमजोर रणनीति के कारण मुख्यमंत्री को भाजपा उम्मीदवार जिताने के लिए प्रचार करने का ज्यादा मौका मिलेगा। अगर बुधनी से सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में से कोई एक भाग्य आजमाते तो लाजमी है कि शिवराज अपने क्षेत्र में ज्यादा सभाएं करते जिसका लाभ कांग्रेस को मलता।

क्योंकि कांग्रेस की कड़े मुकाबले में फंसी सीटें शिवराज की अनुपस्थिति के कारण जीत के नजदीक पहुंचती। अभी तो अरुण यादव शिवराज सिंह के लिए ज्यादा आसान उम्मीदवार नजर आते हैं।  हालांकि अरुण यादव प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से रुखसत किए जाने के पूर्व प्रदेश में चार उपचुनाव जिताकर सफलता के शिखर पर पहुंच रहे थे। इसी बीच कांग्रेस ने नए अध्यक्ष के रूप में कमलनाथ की ताजपोशी कर दी। इसके पीछे चुनाव के लिए आर्थिक प्रबंधन और पार्टी में गुटबाजी को काबू में करना बड़ी वजह बताई जा रही है।

कहा जा रहा था कि यादव दिग्विजय, सिंधिया, पचौरी की तुलना में छोटे कद के लीडर हैं इसलिए उनका नेताओं पर ज्यादा असर नहीं है। लेकिन चुनाव लड़ने के नाम पर पार्टी ने इस दिग्गजों को दिल्ली से उतारने की बजाय अरुण यादव को चुना। नतीजा आने पर भले ही यादव सफल न हों, मगर आज तो वे कांग्रेस में चुनाव जीत गए हैं। कम से कम चुनाव तक वे सुर्खियों में रहेंगे और कोई भी नेता गुमनामी में जाना पसंद नहीं करता। अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद वे चर्चाओं के बाहर थे। फिलहाल तो शिवराज को घेरने में चूक गई कांग्रेस…