बाखबर /राघवेंद्र सिंह
चुनाव का मौसम है और नामांकन परचा दाखिल करने का वक्त भी निकल चुका है। अब समय है उम्मीदवारी परचों की वापसी का, बागियों को मनाने का और जिनको शायद उनकी पत्नी भी वोट न करे एेसे नेताओं को जननेता मानकर फार्म वापस कराने का। जो पार्टी और उनके प्रत्याशी छुटभैये नेता और बागियों से नाम वापसी के लिए जो प्रयास करेंगे उसे ही कहा जायेगा गधों को बाप बनाने का मौसम आ गया है। हालांकि कई एेसे दिग्गज भी होंगे जो अधिकृत उम्मीदवारों को हराने का माद्दा रखते हैं या यूं कहें खुद भले ही न जीतें मगर खेल तो बिगाड़ ही सकते हैं। एेसे नेताओं को मनाने के लिए उम्मीदवार और दल साम-दाम-दंड-भेद की चाणक्य नीति अपनाते हुए नजर आएंगे।
gadhon ko baap banaane ka mausam…
कुछ उदाहरण के तौर पर हम रायसेन जिले की भोजपुर सीट को भी ले सकते हैं। यहां से भाजपा के उम्मीदवार और पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा के भतीजे सुरेन्द्र पटवा फिर मैदान में है। पटवा जी के बिना उनका यह पहला चुनाव है इसमें भोजपुर के कई दिलजले भाजपाई भतीजे पटवा की विदाई की कोशिश कर रहे हैं। मगर इस प्रयास में वक्त निकल चुका है। बगावत करने वाले मंडीदीप और बाड़ी-बरेली के नेता भी फार्म भर चुके हंै। कुछ संजीदा किस्म के लीडर सुरेन्द्र पटवा के लिए विकल्प के तौर पर मनासा सीट से लड़ने का इशारा भी कर रहे हैं। यहां से पटवा टिकट भी चाहते थे।
लगता है किस्मत टिकट मांगने वालों के साथ भी नहीं है और पटवा जी के लिए भी अच्छे संकेत नहीं मिल रहे हैं। अब यह दौर मान-मनौव्वल का है और इसमें चुनाव लड़ने वाले जिनकी जमानत भी शायद न बचे उन्हें मनाने में पार्टियां और उम्मीदवार कई किस्म के हथकंडे अपनाएंगे। इसमें लोभ-लालच, दबाव और भयाक्रांत भी किए जाएंगे। कांग्रेस में दिग्विजय सिंह को समन्वय का काम दिया गया था। उन्हें सत्यव्रत चतुर्वेदी के पुत्र नितिन को बागी होने से रोकने में कामयाबी नहीं मिली।
इस मामले में दिग्विजय सिंह इतने दुखी नजर आये कि उनकी आंख से आंसू छलक पड़े। एक वीडियो में तो दिग्विजय को उनके समर्थक यह कहते भी दिखे कि रथयात्रा मैं निकालू और आप गोली बिस्किट की तरह टिकट बांट दे। दूसरी तरफ भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि हमारे कार्यकर्ता अपने घर लौट आएंगे। केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, सुहास भगत और प्रभात झा को मान-मनौव्वल का जिम्मा प्रमुख रूप से सौंपा गया है। कई मामलों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह भी बागी और नाराज हुए लोगों से संपर्क कर रहे हैं।
भाजपा और कांग्रेस में बगावत के मामले रोकना कठिन हो रहा है। मानपुर से तिलकराज सिंह का टिकट कटने से वे बागी हो रहे हैं। शाहपुरा से पूर्व विधायक गंगाबाई की बेटी कृष्णा उरैती भी नाराज है। सीहोरा की कमल गोटिया, जमुना मरावी बरगी से राजेश सिंह राजपूत, जबलपुर पूर्व से राजेश सोनकर, मुडवारा से रमाकांत, विजयराघवगढ़ से श्याम तिवारी, मलहरा से तिलक लोधी, मुलताई से पूर्व विधायक पी.आर. बोड़खे, बंडा से पूर्व विधायक नारायण प्रजापति बागी होकर नामांकन पर्चा भर चुके हैं। कुल मिलाकर बगावत करने वाले और टिकट मांगने वालों में एेसे की हैं जिनकी हैसियत न के बराबर है मगर चुनाव का बुखार है और मौसम भी सियासत का एेसा है कि ये कहावत सटीक लगती है “वक्त पड़े बाका तो गधे को कहे काका”।

