डैमेज कंट्रोल में भाजपा फेल…

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बाख़बर/
राघवेंद्र सिंह
चुनाव में बगावत और भितरघात आम बात है लेकिन ये भाजपा में ज्यादा हो तो थोड़ा हजम नहीं होता लेकिन इस बार भाजपा में  बगावत भी खूब है और भितरघात भी  भरोसे के साथ होने के आसार है। इसकी वजह संगठन की कमजोर कडि़यां जो एक-दो नहीं कई सारी हैं। इसी के चलते चुनाव में नतीजे जो भी आएं प्रदेश में भाजपा अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है। प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे से लेकर प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह संगठन महामंत्री सुहास भगत और उनकी टीम सब शरीक-ए-जुर्म है। चुनाव में संगठन का महत्व सबसे ज्यादा होता है मगर पिछले 10 सालों में सबसे ज्यादा संगठन, विचार और उसके वफादारों की उपेक्षा हुई है।
BJP fails in damages control …
हमने पहले भी चर्चा की है कि कांग्रेस में शामिल हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता सरताज सिंह और अब बात कर रहे हैं पार्टी से निष्कासित हुए रामकृष्ण कुसमारिया की। दरअसल बुन्देलखंड में बाबा के नाम से मशहूर कुसमरिया पुराने लीडर होने के बाद भी बागी क्यों हो गये इस पर अभी ध्यान नहीं दिया तो विद्रोह के झंडे लोकसभा चुनाव में भी खूब देखने को मिलेंगे। इस तरह के किस्से कांग्रेस में भी हुआ करते थे। मगर इस बार समन्वय करने का झंडा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने उठाया और उसका असर ये हुआ कि बगावत उम्मीद से कम हुई लेकिन भाजपा में एेसा नहीं हो सका। कारण है संघ से भेजे गये संगठन मंत्री और हाईकमान की तरफ से संगठन और सरकार को सुधारने के साथ समझाने वाले प्रभारी का कमजोर होना।हम बार-बार इसका उल्लेख इसलिए भी कर रहे हैं क्योंकि मध्यप्रदेश भाजपा  संगठन में लगातार कमजोर नेताओं के कारण पहले अपने कार्यकर्ताओं से कटी और अब जनता से दूर हो रही है। जो असर देखने को मिलता है उसके पीछे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और जनता व कार्यकर्ताओं के लिए काम करने वाले मंत्री और कुछ विधायकगण खास है। पिछले कई सालों से पार्टी में हर चीज को आउटसोर्स करने की बीमारी लग गई जो बाद में इवेंट मैनेजरों के हवाले हो गई। सरकार में आते ही जिन विधायक और मंत्रियों को कार्यकर्ता मुसीबत और जनता की समस्याएं बोझ लगीं उनके लिए इवेंट मैनेजमेंट सबसे अच्छा फंडा था।

बस यहीं से कार्यकर्ताओं की उपेक्षा शुरू हुई जो बाद में संगठन और फिर सरकार में बैठे लोगों के प्रति अविश्वास में तब्दील हुई। यह सब धीमे जहर की तरह हुआ जिसे संगठन अब बगावत के रूप में झेल रहा है। उम्मीदवारी में नेता चयन को लेकर असहमति और नाराजी पहले भी होती थी लेकिन दावेदारों से संगठन मंत्री, प्रदेश के पदाधिकारी, प्रदेश अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और प्रदेश प्रभारी के निजी संबंध भी होते थे जिनका लिहाज और पार्टी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रख मान-मनौव्वल सफल हो जाती थी। जब इसमें कमी आई तो संगठन धीरे-धीरे लकवाग्रस्त होता गया।

2008 और फिर 2013 के विधानसभा चुनाव में भी लोग टिकटों को लेकर नाराज थे लेकिन नेता और कार्यकर्ताओं के बीच अविश्वास इतना गहरा नहीं था जितना आज हो गया है। पहले वादे होते थे तो नेतृत्व कार्यकर्ताओं की चिंता कर उनके कैरियर को आगे बढ़ाता था। अब जमाना मौका पड़ने पर गधे को बाप बनाने का आ गया है और खास बात यह है कि कार्यकर्ता  इस बात को समझ गया है। चुनाव में मतलब निकल जाने के बाद उन्हें पता है न तो सरकार उन्हें पूछेगी न ही संगठन। इसके चलते विनय सहस्त्रबुद्धे, प्रभात झा, राकेश सिंह, सुहास भगत यहां तक कि राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल भी बागियों को मनाने में फेल हो गये।

एेसा पहले कभी कांग्रेस में हुआ करता था। नतीजा सामने है कांग्रेस की हालत किसी से छुपी नहीं है। अब भाजपा इस फिसलन पर लुड़कती दिख रही है। रामकृष्ण कुसमरिया दो जगह से चुनाव लड़ रहे हैं। दमोह से उनकी उम्मीदवारी वित्तमंत्री जयंत मलैया के लिए खतरे का घंटा बजा रही है। वे पथरिया से मैदान में है और यहां भाजपा के लखन पटेल मुश्किल में है। इसी तरह जबलपुर उत्तर से भाजपा के शरद जैन तेज-तर्रार युवा नेता धीरज पटैरिया की बगावत से परेशानी में है। पटैरिया पार्टी के लिए 24 कैरेट वाले कार्यकर्ता हैं लेकिन युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे इस नेता की लगातार उपेक्षा ने उन्हें अपनी पार्टी के खिलाफ मैदान में उतरने के लिए मजबूर कर दिया।

बागियों की सूची तो लंबी है लेकिन भोपाल के बैरसिया से खड़े बागी हुए पूर्व विधायक ब्रह्मानंद रत्नाकर संगठन के फेल होने के बड़े प्रमाण है।  एक खास बात और जो बागी मान भी गये हैं वे भितरघात नहीं करेंगे इसकी कोई गारंटी किसी के पास नहीं है। मतलब संगठन कार्यकर्ताओं की अनदेखी करता रहा तो अविश्वास की यह दरार लोकसभा के चुनाव तक और गहरी हो जाएगी। एक वाक्य में मतलब यह है कि जिनसे जो वादे किये गये हैं अगर वो पूरे नहीं हुए तो लोकसभा में भैंस पानी में जाएगी और ये सब देखते रहेंगे।­