उज्जैन। टिकट बंटवारे के बाद घमासान और बागियों को मनाने की सफल-असफल कोशिशों के बाद अब चुनावी मैदान में प्रत्याशियों की तस्वीरें साफ हो गई हैं। जिले की तीन विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के बागी भी मैदान में हैं। इतिहास रहा है कि जब-जब ‘बड़े’ बागी मैदान में उतरे तब-तब कई सियासी समीकरण बिगड़ गए। खास बात यह है कि चुनाव परिणामों के बाद इन बागियों को फिर से पार्टी में वापसी हो जाती है।
‘Sports’ gets spoiled after the spoils ‘home’ returns
अनुशासन और सुशासन की बात करने वाले दोनों राजनीतिक दलों में बीते कुछ चुनावों से ये मौकापरस्ती तेजी से बढ़ी है। उज्जैन जिले की बात करें तो शहर की दोनों सीटों उत्तर, दक्षिण और महिदपुर से कांग्रेस के बागी प्रत्याशी मैदान में हैं। माया त्रिवेदी उत्तर से, जयसिंह दरबार दक्षिण से और दिनेश जैन बोस महिदपुर से चुनावी समर में हैं।
खास बात यह है कि ये निर्दलीय प्रत्याशी दोनों ही प्रमुख पार्टियों भाजपा-कांग्रेस के जीत- हार के समीकरण बना-बिगाड़ सकते हैं, इसलिए दोनों ही दलों के स्थानीय नेताओं की इन पर नजर है। कांग्रेस अध्यक्ष ने तीनों बागियों को पार्टी से निष्कासित करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को पत्र लिखा है।
2003 से असर डालने लगे बागी
जिले की खाचरौद-नागदा विधानसभा सीट पर कांग्रेस का टिकट नहीं मिलने से नाराज दिलीपसिंह गुर्जर अपनी ही पार्टी के रणछोड़लाल आंजना के सामने खड़े हो गए। गुर्जर ने आंजना और भाजपा के प्रत्याशी को हराकर चुनाव जीता। इसके बाद पूर्व सीएम दिग्विजयसिंह उन्हें फिर से पार्टी में ले आए। 2003 के ही चुनावों में पूर्व कांग्रेस विधायक कल्पना परूलेकर ने एनसीपी से चुनाव लड़ा और 11 हजार से अधिक वोट लाईं। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार प्रतापसिंह गुर को हार का सामना करना पड़ा।
सभी की ‘घर” वापसी
बगावत करने वालों को पार्टी से निष्कासन आदि की कोई फिक्र नहीं रहती। इतिहास बताता है कि दिलीप गुर्जर, कल्पना परूलेकर, सुकमाल जैन, दिनेश जैन बोस, जयसिंह दरबार, राजेंद्र वशिष्ठ, सुरेंद्रसिंह सिसौदिया आदि सभी की पार्टी में वापसी हुई।
समीकरण फिर रोचक
इस बार के चुनाव में जिले की तीन सीटों पर बागी फिर नए समीकरण तय कर सकते हैं। किस पार्टी को ज्यादा नुकसान होगा, इस पर सभी की नजरें हैं। दोनों प्रमुख दलों के नेता भी स्थिति और प्रत्याशियों की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं।

