सरकार किसानों की मदद वाली योजना की तैयारी में, डायरेक्ट इनकम ट्रांसफर पर कर रही विचार

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नई दिल्ली। आम चुनाव के करीब आने के साथ सरकार किसानों की मदद वाली एक योजना के लिए तैयारी कर रही है। इस योजना का मकसद फसल की कीमत में गिरावट से परेशान किसानों की सहायता करना है। सरकार चाहती है कि केंद्रीय स्तर से कर्ज माफी करने के बजाय कुछ ऐसा किया जाए, जिससे खेती-बाड़ी का संकट दूर हो और इस सेक्टर में निवेश बढ़े। सरकार का मानना है कि कर्ज माफी से वे समस्याएं दूर नहीं होंगी, जिनसे किसान परेशान हैं।
In the preparation of a government-assisted scheme, the direct income transfer idea
सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था में और बदलाव करने पर विचार कर रही है ताकि इसे ज्यादा प्रभावी बनाया जा सके, साथ ही वह खेती से कम आमदनी की भरपाई करने के लिए डायरेक्ट इनकम ट्रांसफर के बारे में भी सोच रही है। एक सरकारी अधिकारी ने कहा, ‘दूसरे विकल्प (डायरेक्ट इनकम ट्रांसफर) के लिए ज्यादा आंकड़े चाहिए।’ उन्होंने कहा कि यह भी देखना होगा कि बेनेफिट्स गरीब किसानों को ही मिलें। केंद्र सितंबर 2018 में संशोधित मिनिमम सपोर्ट प्राइस स्कीम की घोषणा कर चुका है, लेकिन एक ज्यादा लिबरल स्कीम पर भी विचार किया जा रहा है। इसमें तत्कालीन बाजार भाव कम होने पर किसान को वह रकम मिल सकेगी, जो मिनिमम सपॉर्ट प्राइस और बाजार भाव का अंतर होगी।

सरकारी नीतियां बनाने वालों का ज्यादा जोर ऐसी टारगेटेड स्कीम पर है, जो किसानों को तत्काल कुछ राहत दे सके और कृषि अर्थव्यवस्था में निवेश बढ़ा सके। सोशियो इकनॉमिक एंड कास्ट सेंसस के आधार पर गरीब किसानों के लिए इनकम ट्रांसफर स्कीम भी शुरू की जा सकती है। तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की हार और उन राज्यों की कांग्रेस सरकारों के कृषि कर्ज माफी की घोषणाओं को देखते हुए ऐसा कदम राजनीतिक रूप से ज्यादा स्वीकार्य हो सकता है।

इनकम ट्रांसफर पर फोकस वाली योजना से सरकारी खजाने पर दबाव आएगा। फिस्कल डेफिसिट के इस साल जीडीपी के 3.5 प्रतिशत पर रोकने का टारगेट सरकार ने तय किया है और वित्त वर्ष 2021 तक इसे 3 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य है। केंद्र आने वाली वित्तीय लागत की सभी संभावित परिस्थितियों पर विचार कर रहा है, हालांकि अगर इस स्कीम में राज्यों की साझेदारी हो तो लागत कुछ हद तक कम हो जाएगी।

पिछले महीने एसबीआई रिसर्च ने एक नोट में सुझाव दिया था कि 21.6 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को दो किस्तों में हर साल 12 हजार रुपये प्रति परिवार दिए जा सकते हैं। इस तरह सरकारी खजाने से कुल 50000 करोड़ रुपये निकलेंगे। यह रकम मनरेगा पर खर्च होने वाले पैसे के लगभग बराबर है।

इनकम ट्रांसफर स्कीम तेलंगाना की रैयत बंधु योजना की तरह हो सकती है, जिसमें खेत रखने वाले सभी किसानों को 4000 रुपये प्रति एकड़ दिए जाते हैं। झारखंड और ओडिशा ने भी यही राह पकड़ी है, लेकिन यह बहस तेज हो रही है कि किसानों की मदद करने का सबसे अच्छा तरीका क्या हो सकता है।