BJP broke its own tradition
गुरुवार को विधानसभा में थोड़े से परिवर्तन के साथ फिर वही दृश्य दोहराया गया जो 8 जनवरी दिखाई दिया था। फर्क इतना था कि इस बार नियमों के फेर में उलझी भाजपा ने वॉकआउट नहीं किया बल्कि उसके विधायक सदन में डटे रहे और भरपूर विरोध किया। भाजपा ने पक्षपात का आरोप लगाया और कहा कि सत्ता पक्ष परंपराओं को तोड़ रहा है। सत्ता पक्ष का भी जवाब था कि अध्यक्ष पद पर उम्मीदवार खड़ा कर परंपरा तो भाजपा ने ही तोड़ी है इसलिए उसे उपाध्यक्ष पद गंवा कर इसका खामियाजा भोगना पड़ेगा।
जानकारी के अनुसार 1990 में भाजपा सरकार के दौरान ही यह परंपरा बनाई गई थी जनमत का सम्मान करते हुए सहमति से सत्ता पक्ष का अध्यक्ष और प्रतिपक्ष का उपाध्यक्ष बनाया जाए। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की पहल पर भाजपा विधायक ब्रजमोहन मिश्रा को अध्यक्ष चुना गया था और कांग्रेस विधायक श्रीनिवास तिवारी को उपाध्यक्ष चुना गया था। भाजपा द्वारा बनाई गई यह परंपरा अब तक चली लेकिन इस बार भाजपा ने करीब का बहुमत देख सरकार को उलझाने की दृष्टि से अध्यक्ष पद का उम्मीदवार मैदान में उतार दिया।
कांग्रेस ने भी नियमों के ताने-बाने में उलझा कर भाजपा को शिकस्त दे दी। यह जानते हुए भी कि सदन के निर्णयों पर बाहर से हस्तक्षेप नहीं होता भाजपा विधायक पैदल मार्च करते हुए राज्यपाल के पास गए। यह उनका विरोध प्रदर्शन का तरीका हो सकता था मगर सदन की कार्यवाही के अनुसार यह ‘सेल्फ गोल’ था। जिसके कारण कांग्रेस ने उपाध्यक्ष पद पर हिना कावरे को मैदान में उतार दिया और बहुमत के आधार पर जीत भी पा ली।
पहले चार प्रस्ताव कांग्रेस के, भाजपा फिर पिछड़ी
अध्यक्ष प्रजापति भी यही दोहराते रहे कि कार्यवाही आगे बढ़ जाने के बाद पाइंट ऑफ ऑर्डर सुनना संभव नहीं है। कार्यवाही होने के बाद यह रखने की अनुमति दी जाएगी। भाजपा परंपरा के अनुसार उपाध्यक्ष का पद अपने खाते में चाह रही थी लेकिन कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर चुनाव करवाने के भाजपा के निर्णय के चलते यह पद छिन लिया।

