मध्यप्रदेश अभी नहीं है भाजपा हाईकमान के राडार पर !

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राघवेंद्र सिंह

 पिछले लगभग पांच सालों से मध्यप्रदेश में भाजपा संगठन और तत्कालीन शिवराज सरकार की कई मुद्दों को लेकर किरकिरी होती रही है। सत्ता के चलते भाजपा मुख्यमंत्री की दासी बनी हुई थी इसलिए संगठन और सरकार से जुड़े खांटी कार्यकर्ता व नेता ज्यादातर हाशिए पर थे। जो मुख्यधारा में थे वे मुंह बंद कर समय की प्रतिक्षा में थे। चुनाव हुआ प्रदेश से भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। लोकसभा में पहले से ज्यादा बहुमत से सांसद जीते। पिछली दफा 26 थे और अब 29 में से 28 सांसद। पूरा श्रेय नरेन्द्र मोदी के खाते में।

 विधानसभा में हार के बाद अनुमान था कि लोकसभा के नतीजे आने पर भाजपा संगठन पर हाईकमान सर्जिकल स्ट्राइक करेगा। मगर ऐसा हो न सका क्योंकि अभी हाईकमान के राडार पर प्रदेश भाजपा और उसके नेता नहीं हैं। थोड़ा सा जरूर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को सदस्यता अभियान का राष्ट्रीय प्रभारी बनाकर आलपिन चुभाने की कोशिश की है। दरअसल इसके पीछे चौहान को राज्य की राजनीति से दूर रखना भी एक मकसद माना जा रहा है। यहां शिवराज और हाईकमान के बीच इस बात की जोर आजमाईश है कि राज्य से रुखसती के मामले में कौन कामयाब होता है। इस मुद्दे पर एक कहावत याद आ रही है जंगल में अगर शेर मिल जाए तो क्या करेंगे। जवाब है जो कुछ करेगा शेर ही करेगा। इस समय मोदी शाह की जोड़ी संगठन और सरकार में शेर की तरह है इसलिए संसद में तीन तलाक से लेकर जम्मू कश्मीर तक जो शेर चाहेगा वही होगा।
संसद में कांग्रेस नेतृत्व शून्यता के दौर से गुजर रही है। ऐसे में चुनौतियों का मैदान खाली है। हो ये रहा है कि चुनौति भी ये पैदा कर रहे हैं और उसका हल भी हाईकमान ही ढ़ूढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में बजट सत्र के दौरान भाजपा के दो विधायकों का कांग्रेस के पाले में जाना और उसे लेकर हाईकमान का नहीं तिलमिलाना भी बताता है कि अभी यहां की सरकार और भाजपा की सियासत उसके एजेंडे में नहीं है। जब तक हाईकमान राज्य की तरफ से आंखें फेरे हुए है तब तक सभी गधे घोड़े खच्चर मजे करते रहेंगे। यह ठीक वैसे ही है जैसे बकरीद के पहले बकरों को खूब खिलाया पिलाया जाता है और उसके बाद तय तारीख पर उसकी कुर्बानी दे दी जाती है।

प्रदेश संगठन के मामले में पिछले दिनों भाजपा विधायकों की बैठक का किस्सा याद आता है। जिसमें दो बागी नारायण त्रिपाठी और शरद कोल समेत आधा दर्जन से अधिक विधायक बैठक से गैर हाजिर रहे। मजे की बात ये है कि बैठक में उपस्थिति के लिए संगठन ने संकेत दिए थे कि राष्ट्रीय अध्यक्ष इसमें शामिल होंगे। अब इतनी अक्ल तो भाजपा विधायकों को भी है कि वे पता कर लें कि अमित शाह और कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा में से कौन आ रहा है। संगठन जितना सीधा अपने विधायकों को समझता है दरअसल वे उतने सीधे नहीं हैं।

उनमें इतनी चतुराई तो है कि वे संगठन को ही सीधा साबित कर दें। 2003 के बाद भाजपा का संगठन सीधा ही साबित होता जा रहा है। इसलिए तो विपक्षी दलों की विधायकों को रातों रात अपनी पार्टी में लाकर दूसरे दिन उनको चुनाव लड़ाने का निर्णय भी कर लेते थे। ऐसें ही सीधे पन के कारण जिसमें वफादारों को दरकिनार कर नारायण त्रिपाठी,संजय पाठक और सांसदों में राव उदय प्रताप,भागीरथ प्रसाद आदि के नाम टिकट पाने वालों में शामिल हैं। यही वजह है कि अब गच्चा खाने के बाद भाजपा में मौकापरस्ती के बजाए वफादारी याद की जा रही है।

ऐसा नहीं है कि हाईकमान को यहां जो गुड़ गोबर हो रहा है उसकी जानकारी नहीं है। संगठन मंत्रियों की बिगड़ैल आदतें,पदाधिकारियों की सत्ता की दलाली में लिप्तता का लेखा जोखा ऊपर तक है। राष्ट्रीय संगठन महामंत्री पद से श्री रामलाल की विदाई इसी का धमाकेदार संदेश था। बदलाव की बात आगे बढ़ती उसके पहले ऐजेंडे में तीन तलाक और जम्मू कश्मीर आ गया। ऐसे माहौल में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अभी सब गुनाहगार जमानत पर हैं। इस पर एक शेर बड़ा मौजूं है – इस सिरे से उस सिरे तक, सब शरीक ए जुर्म है। कोई जमानत पर है तो कोई फरार…

भाजपा की गुटीय राजनीति पर भी आला नेताओं की कड़ी नजर है। यहां के कद्दावर नेताओं के विरुद्ध  कमलनाथ सरकार की जांच को भी प्याज की परतों की तरह बारीकी से देखा जा रहा है। फीडबैक बराबर लिया जा रहा है और ऐसे में सब कुछ हाईकमान के राडार पर आएगा तो नतीजे सियासत और संगठन के लिहाज से धमाकेदार ही होंगे। भाजपा के जानकार वक्त आने तक पूरा खेल दम साध कर देख रहे हैं।

शाह और दिग्गी में तनातनी….
राज्यसभा में आतंकवाद के खिलाफ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान दिग्विजय सिंह ने कहा कि हमें इस सरकार की मंशा पर भरोसा नहीं है। गृह मंत्री अभी भी भाजपा के अध्यक्ष हैं और उनकी मंशा देश को बांटने के की है। वे हमारे खिलाफ भी इस एक्ट के तहत कार्यवाही कर सकते हैं क्योंकि अरबन नक्सलाइट में मेरा भी नाम जोड़ दिया था । इसके जवाब में शाह ने कहा कि मैं सभापति के माध्यम से बोल रहा हूं और आप को मेरी बात सुनना पड़ेगी। यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपका नाम नहीं आएगा। संदेश साफ था कि सरकार को लगेगा तो नेताओं के नाम भी आतंकवादियों की सूची में जुड़ सकते हैं। असल में यह बिल आतंक से जुड़ी संस्थाओं पर रोक के अलावा उनसे जुड़े व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगाने के प्रावधान के साथ प्रस्तुत किया गया था। शाह का कहना था कि संस्था बैन होने पर उसका जिम्मेदार व्यक्ति दूसरी संस्था बना लेता है। इसलिए प्रतिबंध व्यक्तियों पर भी लगाया जाना चाहिए। दिग्विजय समेत विपक्ष ने इसका विरोध किया था बाद में यह बिल पास हो गया। लेकिन चर्चा के दौरान शाह और दिग्विजय में तल्खी साफ नजर आई।
लेखक IND24 के प्रबंध संपादक हैं