राकेश अचल
पिछले छह साल से देश में अनेक चुनाव देख रहा हूँ। अधिकाँश चुनावों में कांग्रेस की मात हो रही है। पिछले साल हुए तीन राज्यों के चुनाव अपवाद थे ।आम चुनावों के अलावा उप चुनावों में भी कांग्रेस के दांव उलटे पड़ रहे हैं ,इसके लिए कांग्रेस खुद जिम्मेदार है ।कांग्रेस ने समय के अनुसार अपने यहां कोई मोदी पैदा नहीं किया ,फलस्वरूप कांग्रेस अब भाजपा के मोदी और अहंशाह का मुकाबला नहीं कर पा रही है ।
आप विश्लेषण करें तो पाएंगे कि हर चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को अपने पाले में खींच कर परास्त किया है। भाजपा जनता से जुड़े मुद्दों पर चुनाव लड़ने के बजाय अपने गढ़े हुए मुद्दों पर चुनाव लड़ती जा रही है ।कांग्रेस भाजपा के इस मकड़जाल में उलझकर रह जाती है और इस अप्रत्याशित प्रहार का मुकाबला नहीं कर पाती ।कांग्रेस के पास जैसे 1971 में गरीबी हटाओ जैसा मुद्दा था वैसा भाजपा के पास हर चुनाव में अलग मुद्दा है ।भाजपा मेहनत कर पहले मुद्दे पैदा करती है फिर उन्हीं पर दांव लगाती है
पीछे मुड़कर देखिये तो 2014 में ‘अच्छे दिन आएंगे ‘ जैसा नारा देकर भाजपा ने कांग्रेस का तख्तापलट दिया था ।कांग्रेस भाजपा के इस नारे का सामना नहीं कर पाई थी।भाजपा ने बाद में बालाकोट काण्ड को अपना हथियार बनाया ,एयरस्ट्राइक के जरिये भाजपा ने आतंकियों के ठिकाने ध्वस्त किये हों या न किये हों लेकिन कांग्रेस के तमाम गढ़ ढहा दिए थे ।भाजपा की इस रणनीति के शिकार दुसरे दल भी हुए लेकिन तृमूकां जैसे दल बचकर निकल भी गए ,आप ने भी भाजपा के इस पैंतरे का जमकर मुकाबला किया था ,लेकिन कांग्रेस को अब भी भाजपा के पैंतरे समझ में नहीं आये हैं ।
महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के चुनावों में भाजपा ने अपनी सुविधा से क्रमश:विनायक दामोदर सावरकर और धारा 370 को ज़िंदा किया और कांग्रेस हक्की-बक्की रह गयी ।राजनीति के दंगलों के हम जैसे तमाम पुराने दर्शक आसानी से कह सकते हैं की इन दोनों राज्यों में कांग्रेस की वापसी असम्भव है क्योंकि कांग्रेस भाजपा से लड़ना तो दूर मुकाबले में भी कहीं खड़ी नजर नहीं आई । महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस चुनाव से पहले ही बिखर गयी , हरियाणा में तंवर गए तो महाराष्ट्र में निरुपम ।महाराष्ट्र के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया उस तरिके से महाराष्ट्र में खड़े नजर नहीं आये जैसे बंगाल चुनाव के समय भाजपा की और से कैलाश विजयवर्गीय खड़े नजर आये थे ।
सियासी खेल में विजय के लिए अपने दांव-पेंच होना चाहिए जो दुर्भाग्य से इस समय कांग्रेस के पास नहीं हैं। कांग्रेस के पास न नरेंद्र मोदी जैसा आक्रामक नेता है और न अमित शाह जैसा अहंशाह । ऐसी जोड़ी के बिना कांग्रेस अगले पांच क्या दस साल तक भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती ।मौजूदा केंद्र सरकार की असंख्य विफलताओं के बावजूद कांग्रेस जनता के बीच इन विफलताओं को ले जाने में नाकाम रही है । भाजपा महाराष्ट्र और हरियाणा से निबटने के बाद अगले विधानसभा चुनावों में राम मंदिर जन्मभूमि के मुद्दे के सहारे अपनी बढ़त बढ़ाएगी और इसमें कोई बुराई भी नहीं है क्योंकि भाजपा ने दूरदृष्टि से मुद्दों को गढ़ा है ।
मजे की बात ये है की सत्ता में रहने की अभ्यस्त कांग्रेस अभी न विपक्ष में बैठने की आदत डाल पायी है और न ही सत्ता में वापसी लायक शक्ति संचित कर पा रही है ।कांग्रेस का नेतृत्व बूढ़ा और उत्साहहीन हो चुका है ।इससे कांग्रेस का तो नुकसान हो ही रहा है देश के लोकतंत्र का भी नुक्सान हो रहा है। लोकतंत्र के स्वास्थ्य केलिए एक सबल विपक्ष की जरूरत है लेकिन विपक्ष केंद्र में ही नहीं राज्यों में भी सिरे से नदारद है । जहां भाजपा की सरकारें हैं वहां तो विपक्ष है ही नहीं और जहां कांग्रेस की सरकारें हैं वहां संयोग से कांग्रेस ही दोनों पक्षों में खड़ी, बैठी दिखाई देती है ।
देश की राजनीति से विरोध का लापता होना केवल संयोग नहीं है।ये एक साजिश है और इसका सामना करने वाले शतुरमुर्ग की तरह मुद्रा अपनाये हुए तूफ़ान गुजरने का इन्तजार कर रहे हैं ।जनता की प्रतिकार शक्ति को पहले ही कुंद किया जा चुका है।इस अनूठे माहौल में आप जो चाहे सो प्रयोग कर सकते हिन् और ऐसा हो रहा है,होता रहेगा ।आप इसे एक लेखक का ‘अरण्यरोदन’ भले ही कहें लेकिन हकीकत तो हकीकत है और ऐसी कड़वी हकीकत है जिसे आसानी से स्वीकार किया जाना चाहिए ।सत्ता में कौन रहे और कौन नहीं ,ये तय हालांकि जनता करती है लेकिन जनता को जगाये रखने का काम सभी राजनीतिक दलों को करना पड़ता है ।भाजपा अपनी भूमिका में कामयाब है और दुसरे दल नाकाम ।इसमें न आप कुछ कर सकते हैं और न हम ।जो होगा सो देखा जाएगा ।देश ने इससे भी ज्यादा बुरे दौर देखे हैं ।

