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हर बच्चा अपने आप में अलग है | भारत में जिस तरह वे कोरोना वायरस का सामना कर रहे हैं, वह कुछ अलग नहीं है | बिते साल से फैले कोरोना संक्रमण के कारण स्कूल बंद है, बच्चे अपने घरो में कैद है ये वो छोटे छोटे बच्चे है जिन्हे ना कोरोना का पता है ना लॉकडाउन का इनको ऐसा लगता है मानो इनको घर में कैद रहने की सजा देदी गई हो बच्चे शारिरिक वा मानसिक रूप से कमजोर हो चूके है
एक रिपोर्ट के अनुसार 6 वर्ष आयु तक के बच्चे में जो समझने की याद करने की शक्ति अधिक होती स्कूल बंद होने कारण ये बच्चे अपने जीवन के दो वर्ष पीछे चले गए है जबकी यही बच्चे हमारे देश वा प्रदेश का भविष्य तय करेंगे लेकिन अब इन बच्चो को अपने शैक्षणिक जीवन में पीछे होने के कारण रोजगार लेने मे भी बहुत समस्या जाऐगी

लंबे वक्त से स्कूल बंद होने के कारण बच्चों का व्यवहार बदलने लगा है। टीवी और मोबाइल गेम से भी मोह भंग हो रहा है। बच्चे कम बोल रहे हैं और चिड़चिड़े होते जा रहे हैं। ऐसे में माता-पिता को इनकी देखभाल का तरीका बदलना होगा। बच्चों के स्वभाव में चिड़चिडापन आ रहा है ऐसा इसलिए हो रहा है कि उनके मन मुताबिक न तो खाने को मिल रहा है और न ही घर से बाहर जाने की उनकी मंशा पूरी हो पा रही है। लगातार एक ही स्थान पर रहने से वे घुटन महसूस करने लगे हैं। हमने बच्चो के अभिभावकों से बात की और बच्चो के बारे में जाना तो पता चला बच्चो का स्वभाव बदल रहा है
बच्चे चंचल होते हैं लेकिन अब वे शैतानी नहीं कर रहे
-सुबह देर तक सोना चाहते हैं, उठाने पर चिड़चिड़ा रहे
-अगर उठ गए तो काम खत्म होते ही फिर सोने का मन,
लॉकडाउन के दौरान घरों के भीतर रहने को मजबूर बच्चे अब ऊबने लगे हैं. बाहर जाने की जिद करने वाले बच्चों को समझाना अभिभावकों के लिए भी आसान नहीं है. लेकिन हमने पाया अगर अभिभावक बच्चो कि इन बातो पर ध्यान दें तो हमें काफी मदद मिल सकती है उनके स्ट्रेस को कम करने में जैसे की
बच्चों से पूछें कि एक सप्ताह में उन्होंने क्या-क्या खाया
-किस दिन का नाश्ता कैसा था, खाने में क्या पसंद आया
-साथ में टीवी देखें, जो भी देखें उसके बारे में बच्चों से पूछें
-बच्चों के साथ ऐसे मुद्दों पर बहस करें, उनका जवाब जानें
-इसी माध्यम से उन्हें सही बात बताएं, मोटीवेट करते रहें
-उनके दोस्तों के बारे में पूछें, बच्चों के मन की बात करें
Honey Dubey
( Councilor Mittal group of institutes)

