रुस्तम-ए-हिंद ने किंग कांग को रिंग से बाहर ही फेंक दिया था

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शशी कुमार केसवानी
बात दिल की

नमस्कार दोस्तो ! आइए आज बात करते है एक ऐसी शख्सियत की जिसने अनगिनत लोगों को उठा उठा कर पटका। पहलवानों को पटकते-पटकते वे रूस्तमे-ए-हिन्द बन गए। जी हां दोस्तों मैं बात कर रहा हूं मेरे पिता के पसंदीदा पहलवान व फिल्म अभिनेता दारासिंह की। जिनकी लंबाई 6 फुट 2 इंच, सीना 53 इंच, वजन 127 किलो। दिल के अंदर जज्बा इतना कि 200 किलो के पहलवान को उठाकर रिंग से बाहर फेंक दिया। दारा सिंह पहलवान के साथ-साथ एक ऐसे अभिनेता भी थे जिन्होंने पृथ्वीराज से लेकर धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन के साथ फिल्मों में धूम मचाई। मूलत: अपने सरल व मासूमियत भरे स्वभाव से लोगों के दिल को छू जाते थे। अपनी बोलचाल में पंजाबी लहजा अलग ही झलकता था। जिसके चलते लोगों को बहुत आकर्षित करते थे। जब मर्द फिल्म बन रही थी। जब मनमोहन देसाई ने सोचा कि अमिताभ अगर मर्द है तो उसका बाप कौन हो सकता है तो एक दिमाग में नाम आया दारा सिंह का जो उन्होंने बखूबी रोल भी निभाया। वैसे यहां बताता चलूं दादासिंह सुबह 4 बजे से वर्जिश शुरू कर देते थे। जो 8 बजे तक चलती थी। फिर एक घंटा नाश्ता खाते थे फिर आराम करते थे। बाकी बचे हुए समय में अन्य काम करते थे। उनके जीवन का कड़ा संघंर्ष ही उनको दादासिंह बनाता है। वर्ना बचपन में हम एक ही चीज सुनते थे। कोई भी बच्चा अगर कहीं लड़ाई करके या मारपटी करता था तो उनके मां बाप उसे कहते थे। क्या तुम अपने आप को दारासिंह समझते हो। दारासिंह की मिसाल घरों में आमतौर पर चलती थ्ी। इतनी मिसाल तो किसी भी पहलवान की नहीं दी जाती थी। हा जरूर कहीं-कहीं गामा पहलवान का भी नाम लिया जाता था। पर दारासिंह का नाम लोगों के दिलों दिमाग में बसा था क्योंकि उनकी मासूमियत लोगों के दिलों में घर बना लेती थी। तो आइए आज ऐसे मासूमियत भरे पहलवान के जीवन के कुछ बातें दिल से करते है।

दारा सिंह- एक ऐसा नाम, जो सिर्फ पहलवानी तक ही सीमित नहीं रहा। उन्होंने अखाड़े में एक के बाद एक कई जीत हासिल की, सिनेमा में आए तो यहां भी छा गए, राजनीति में कदम रखा तो यहां भी अपनी चमक बिखेर दी और अपनी आत्मकथा तक उन्होंने लिख डाली। 19 नवंबर 1928 को पंजाब के अमृतसर जिले के धरमूचक गांव में जन्मे दीदार सिंह रंधावा उर्फ दारा सिंह का नाम भारतीय इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। दारा सिंह का जन्म एक जाट सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सुरजीत सिंह रंधावा और माता का नाम बलवंत कौर था। उनका परिवार एक सामान्य किसान परिवार था और उनके माता-पिता खेती-बाड़ी करते थे। दारा सिंह का बचपन गांव के माहौल में ही बीता, जहां उन्होंने कम उम्र से ही मेहनत करना शुरू कर दिया। शिक्षा के मामले में उन्होंने स्कूल की पढ़ाई सिर्फ 6वीं कक्षा तक ही की थी। पारिवारिक और आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें आगे की पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वो खेतों में काम करने लगे। बचपन से ही दारा सिंह को कुश्ती का शौक था। उनके शुरूआती दिन अखाड़ों में बीते। देश में कई कुश्तियां लड़ी । जिसमें उन्होंने लगभग सभी कुश्तियां जीती। उस समय पर देशभर में कुश्तियों का आयोजन होता था। उनकी पहली प्रोफेशनल फाइट एक इटैलियन पहलवान के खिलाफ थी। वो मुकाबला ड्रा हुआ। इस फाईट के बाद उनको पचास डॉलर मिले थे। 1947 में वो वक पहलवानी प्रतियोगिता में हिस्सा लेने सिंगापुर गए। वहां चैंपियन तारलोक सिंह को हराकर उनने चैंपियन आॅफ मलेशिया का तमगा जीता। फिर कई-कई देश गए, जीते सन 1952 में इंडिया लौटे। 1954 में इंडियन कुश्ती के चैम्पियन बने । वो उस टाइम इतने फेमस थे कि कनाडा के वर्ल्ड चैंपियन जार्ज गाडीर्यांका और न्यूजीलैंड के जॉन डिसिल्वा ने 1959 में कोलकाता में कॉमनवेल्थ कुश्ती चैंपियनशिप में उनको ओपन चैलेंज दे डाला। दारा सिंह ने दोनों को उठा उठा कर पटका। 1968 में इन्होंने अमेरिका के वर्ल्ड चैंपियन को हराया और फ्रीस्टाइल कुश्ती के वर्ल्ड चैंपियन बन गए। एक बार एक अफवाह उड़ी, जो पहलवान लड़ा करता है। माने दारा सिंह, वो असली दारा सिंह है ही नहीं। उनकी जगह कोई असली दारा सिंह आ गया। उसने बताया कि मैं तो जेल में बंद था। मेरे नाम का फायदा ये नकली दारा सिंह उठा रहा है। उसने दारा सिंह को लड़ने की चुनौती दी। दोनों लड़े, खूब कमाई हुई, खूब टिकट बिके। ये सारी अफवाहें और प्रचार प्रसार इसलिए किया गया था कि ज्यादा से ज्यादा टिकट बिके और मोटी कमाई आर्गेनाइजर के साथ-साथ पहलवानों की भी हो। यह बात तो बाद में पता लगी कि वो कोई असली-नकली नहीं दारा सिंह के ही छोटे भाई रंधावा थे। जिन्होंने पहलवानी में तो अपना नाम भी किया । वे हमेशा कहते थे दारासिंह से लड़ने से पहले मुझसे लड़ना पड़ेगा। कुछ कुश्तियां लड़ी भी। पर पैसे की चमक उन्हें भी फिल्मों की ओर खेंच कर ले गई। अब उनके बच्चे भी फिल्मों में काम करते है। रंधावा अपने स्टंट व फाइट के लिए फिल्मों में काफी फेमस रहे।
दारा सिंह ने किंग कांग को कुश्ती में पटककर कुश्ती के इतिहास में अपना नाम इस तरह दर्ज कर दिया कि आज भी लोग उसकी मिसाल देते है। और दारा सिंह को हमेशा किंग कॉन्ग के साथ हुए उनके मुकाबले के लिए जाना जाता रहेगा। इतिहास के सबसे हैरतअंगेज मुकाबलों में से एक इस मुकाबले में दारा सिंह ने आॅस्ट्रेलिया के 200 किलो वजनी किंग कॉग को सर से ऊपर उठाया और घुमा के फेंक दिया था। महज 130 किलो के दारा सिंह द्वारा लगाया गया ये दांव देखकर दर्शकों ने दांतो तले उंगलियां दबा ली थी। दारा के इस दांव के बाद किंग कॉन्ग रेफरी पर चिल्लाने लगा था। किंग के अनुसार यह नियमों के खिलाफ था। जब रेफरी ने दारा को ऐसा करने से रोका तो दारा ने किंग कॉन्ग को उठाकर रिंग से बाहर फेंक दिया था और किंग दर्शकों से महज कुछ ही कदम की दूरी पर जा कर गिरे थे। दारा सिंह, किंग कॉन्ग और फ्लैश गॉर्डन ऐसे खिलाड़ी थे जिन्होंने 50 के दशक में कुश्ती की दुनिया में राज किया था। दारा और किंग का मैच देखने के लिए दर्शकों का भारी हुजूम उमड़ पड़ता था। दारा सिंह ने 1983 में उन्होंने अपना आखिरी मुकाबला खेला और जीत के बाद संन्यास ले लिया था। ये टूर्नामेंट दिल्ली में हुआ था। अपराजित रहने वाले और कुश्ती के कई दिग्गज नामों को धूल चटाने वाले दारा सिंह ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत 1952 में फिल्म संगदिल से की थी। उन्होंने आगे जाकर कई फिल्मों में अभिनय किया और कुछ फिल्में प्रोड्यूस भी कीं। दारा सिंह का फिल्मी सफर – दारा सिंह की सोच बहुत आगे तक की रहती थी हमेशा। उन्होंने ये सोच कर निर्णय लिया कि पहलवानी से और कुश्ती से बुढ़ापे में पैसा नहीं रहता उन्होंने गामा पहलवान की जिंदगी बहुत करीब से देखी थी। इसलिए उन्होंने निर्णय किया कि फिल्मों में काम करके अपने बुढ़ापे के लिए पैसा बचाकर रखेंगे ताकि आराम से बुढ़ापा जी सके। साल 1952 में फिल्म संगदिल से उन्होंने बॉलीवुड में एंट्री की। शुरूआत धीमी रही, लेकिन 1962 में आई किंग कॉन्ग फिल्म ने उन्हें स्टार बना दिया। इसके बाद उन्होंने फौलाद, शेर दिल, रुस्तम-ए-हिंद, बजरंगबली, मर्द, धर्मात्मा, राम भरोसे, और मेरा नाम जोकर जैसी हिट फिल्मों में अभिनय किया। उन्होंने करीब 146 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। 16 फिल्में मुमताज के साथ कीं, जिनमें से 10 सुपरहिट रहीं। इन दोनों के अफेयर की भी खूब चर्चा रही, लेकिन समय के साथ ये रिश्ता फीका पड़ गया।
हनुमान बन घर-घर में पूजे गए, दारा सिंह को रामानंद सागर के पौराणिक धारावाहिक रामायण में हनुमान जी का किरदार निभाकर ऐसी लोकप्रियता मिली कि उन्हें लोग पूजने लगे। इस किरदार के लिए उन्होंने मांसाहार तक छोड़ दिया था। ये रोल भारतीय टेलीविजन इतिहास में अमर हो गया और हनुमान के रोल में हमेशा दारा सिंह को ही देखा जाने लगा।


पर्दे के पीछे भी दिखाया हुनर – बहुत कम लोग जानते हैं कि एक्टर होने के साथ-साथ दारा सिंह एक सफल निर्देशक और लेखक भी रहे। उन्होंने पंजाबी और हिंदी में कई फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें नानक दुखिया सब संसार, मेरा देश मेरा धर्म, रुस्तम, सवा लाख से एक लड़ाऊं जैसी फिल्में शामिल हैं। साल 1989 में उन्होंने मेरी आत्मकथा नामक आत्मकथा लिखी, जो 1993 में हिंदी में प्रकाशित हुई।
राजनीति में भी रखा कदम : साल 1998 में दारा सिंह ने बीजेपी जॉइन की और 2003 से 2009 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। वो पहले खिलाड़ी थे, जिन्हें राज्यसभा के लिए नामांकित किया गया था। इसके अलावा वे जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे हैं।
दारा सिंह की शादी : दारा सिंह की पहली शादी महज 14 साल की उम्र में बचनो कौर से हुई थीं। गांव में थे तो खेतों में काम करते थे। कम ही उमर थी। जब घरवालों ने जबरिया ब्याह दिया। दुनिया जीतने वाले की घरवालों के आगे हारे। जो लड़की ब्याहकर घर आई। वो उमर में उनसे कहीं बड़ी थी। घरवालों को चिंता हुई। पट्ठा कमजोर न निकल जाए। उनने खुराक पर ध्यान दिया। दूध-दही खांड़ के अलावा दिन में 100-100 बादाम के साथ-साथ अंडे व अन्य शक्तिवर्धक जड़ी बुटियां खिलाई जाती थी। घरवालों ने ऐसा-ऐसा खाना खिलाया कि सत्रह बरस के होते तक उनकी गोदी में एक बालक खेल रहा था। वो 17 साल की उम्र में ही पिता बन गए थे। बचनो के साथ दारा सिंह के एक बेटे प्रद्युमन सिंह रंधावा ने जन्म लिया। उनके कुल 6 बच्चे थे- इनमें तीन बेटे और तीन बेटियां शामिल हैं। दारा सिंह की दूसरी शादी साल 1961 में सुरजीत कौर से हुई थी। ये एक पारंपरिक अरेंज मैरिज थी। इसी शादी से उनके बेटे विंदू दारा सिंह भी हुए, जो कि एक मशहूर अभिनेता हैं और उन्होंने भी रेसलिंग और अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
एक अमिट छवि जो दिलों में आज भी जिंदा है : दारा सिंह एक ऐसे विरले व्यक्तित्व थे जिन्होंने खेल, सिनेमा, साहित्य और राजनीति- चारों क्षेत्रों में सफलता पाई। उनकी जीवनगाथा आज भी प्रेरणा देती है कि सच्ची मेहनत और लगन से कोई भी इंसान हर मुकाम हासिल कर सकता है।

पहलवानी के बाद फिल्मों में मुमताज के साथ खूब रोमांस भी किया

दारा सिंह ने एंटरटेनमेंट इडंस्ट्री में भी अपनी जबरदस्त पहचान बनाई. विश्व स्तर पर बड़े-बड़े पहलवानों को चित कर दारा सिंह भारत का नाम दुनियाभर में रोशन किया. भारत में दारा सिंह एक ऐसे शख्सियत हुए जिन्होंने पहलवानी के अलावा, एक्टिंग भी की. उन्हें रामांनद सागर के शो रामायण में हनुमान के किरदार के लिए जाना जाता है. दारा सिंह का यह किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है. दारा सिंह भारत के ऐसे पहलवान हुए जिनकी तुलना गामा पहलवान से होती रही. उन्होंने लगभग 500 कुश्ती मुकाबले लड़े और कभी हार नहीं मानी. 1968 में उन्होंने अमेरिकी पहलवान लाऊ थेज को हराकर विश्व फ्रीस्टाइल चैंपियनशिप जीती, जिसने उन्हें पहला भारतीय विश्व चैंपियन बनाया. गामा पहलवान अपने करियर में कभी कोई मुकाबला नहीं हारे. दोनों को अजेयता और विश्व स्तर पर विदेशी पहलवानों को हराने की उपलब्धियां उन्हें समान बनाती हैं. दोनों ने भारतीय कुश्ती की ताकत को साबित किया. दोनों ने विदेशी धरती पर भारत का नाम रोशन किया और कुश्ती को एक सम्मानजनक खेल के रूप में स्थापित किया. संन्यास के बाद उन्होंने बॉलीवुड इंडस्ट्री में दस्तक दी. उन्होंने हिंदी सिनेमा में साल 1952 में फिल्म संगदिल से बॉलीवुड में डेब्यू किया, जिसमें दिलीप कुमार और मधुबाला जैसे सितारे थे. दारा सिंह ने मुमताज के साथ 16 फिल्मों में काम किया, जिनमें से 10 सुपरहिट रहीं. उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब पसंद किया. उनके बीच अफेयर की अफवाहें भी उड़ी थीं. उनकी आखिरी फिल्म जब वी मेट (2007) थी, जिसमें उन्होंने करीना कपूर के दादाजी का किरदार निभाया. दारा सिंह संसद भी पहुंचे. वह पहले स्पोर्ट्सपर्सन थे, जिन्हें 2003-2009 तक राज्यसभा सदस्य के लिए नामित किया गया. वे जाट महासभा के अध्यक्ष भी रहे. दारा सिंह को उनकी कुश्ती, एक्टिंग और देशभक्ति के लिए हमेशा याद किया जाता है। लेकिन उनके स्वभाव में राजनीति थी ही नहीं यही कारण था कि वे राजनीति में कुछ ऐसा कर न सके। एक बार दिल्ली में मुलाकात हुई थी। मैनें पुछ लिया कि पहलवानी बेहतर थी या फिल्मों में एक्टिंग। हंसते हुए पंजाबी लहजे में बोले पहलवानी तो मेहनत लेती थी फिल्में मनोरंजन देती थी। राजनीति दिमाग ही खराब कर देती है बहुत सी चीजें तो मुझे समझ ही नहीं पड़ती। अंदर कुछ बातें होती है बाहर कुछ और होता है। अब आ गया हुं तो समझने की कोशिश करता हूं पर मुझे लगता है ये मेरी समझ से परे की चीज है। कुछ मित्र है जो राजनीति जानते है। वे बताते है तब जाकर समझ पाता हूं। पहवानी में मुझे किसी से पुछना नहीं पड़ता था। फिल्मों में जल्दी ही समझ में आ जाता था। ये ऐसा जाल है पता ही नहीं पड़ता कहां से बुनना शुरू हुआ और कहां खत्म हुआ। आप एक बात तो मानते हो कि पहलवान दिमागी तौर सीधे लोग होते है। तो मैंने ठहाका लगाते हुए कहा गुरुजी आपकी सादगी की हम बचपन से कसमें ही खाते आ रहे है। ऐसी कई मजेदार बातें मेरी उनसे हो चुकी है।