नतीजे घोषित होने के बाद मीनाक्षी नटराजन मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई, अब उठ रहे ये सवाल

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TIO नई दिल्ली

राज्यसभा के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद अब विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीनों सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार तरुण चुघ, रजनीश अग्रवाल और महेश केवट निर्वाचित हो चुके हैं. कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किए जाने के बाद बीजेपी के तीसरे उम्मीदवार की जीत भी तय मानी जा रही थी.
कांग्रेस इस फ़ैसले को चुनौती देते हुए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट दोनों का दरवाज़ा खटखटा चुकी है. सुप्रीम कोर्ट इस मामले में आज सुनवाई करने वाला है. वहीं कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग से शिकायत किए जाने के बावजूद उन्हें कोई राहत नहीं मिली. केंद्रीय चुनाव आयोग को कांग्रेस ने 10 जून की सुबह ही शिकायत की थी, लेकिन चुनाव की पूरी प्रक्रिया हो जाने के बाद भी आयोग ने कोई दख़ल नहीं दिया. बीजेपी उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने के बाद दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े और राहुल गांधी की मौजूदगी में हुई बैठक में पार्टी नेताओं ने चुनाव आयोग और बीजेपी दोनों पर सवाल उठाए.
राहुल गांधी ने कहा, बीजेपी और चुनाव आयोग की जुगलबंदी ने सीट चोरी की है.
कांग्रेस का कहना है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन बिना पर्याप्त क़ानूनी आधार के और राजनीतिक कारणों से रद्द किया गया. पार्टी का आरोप है कि रिटर्निंग अधिकारी का फ़ैसला मनमाना और पक्षपातपूर्ण था.
वहीं बीजेपी का कहना है कि नामांकन पत्र के साथ दाख़िल हलफऩामे में ज़रूरी जानकारी नहीं दी गई थी, जिसके आधार पर यह कारवाई की गई.
गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मीनाक्षी नटराजन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि उनका नामांकन ग़लत क़ानूनी आधार पर और बिना पर्याप्त विचार किए ख़ारिज कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर शुक्रवार को सुनवाई करने पर सहमति जताई, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि ऐसे मामलों में चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद चुनाव याचिका दायर करना ही असल क़ानूनी उपाय होता है.
कांग्रेस ने अदालत से तत्काल दख़ल की मांग की थी क्योंकि गुरुवार को नामांकन वापसी की समय सीमा समाप्त हो रही थी.
हालांकि सुनवाई शुक्रवार तक टल गई और इस बीच नामांकन वापसी की अवधि समाप्त होने के बाद बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए.
नौ जून की रात नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस पार्टी के केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, सचिन पायलट और भूपेश बघेल सहित कई नेता नई दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचे.
कांग्रेस नेताओं का कहना था कि वे आयोग को अपना पक्ष बताना चाहते हैं. कुछ समय तक नेताओं को आयोग के दफ़्तर में प्रवेश नहीं मिला, जिसके बाद वे बाहर ही धरने पर बैठ गए.
केसी वेणुगोपाल ने कहा था, यह लोकतंत्र के बुनियादी ढांचे पर संकट का सवाल है.
बाद में कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग को अपना ज्ञापन सौंपा और मामले में हस्तक्षेप की मांग की.
इस मामले में चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव आयोग ने कोई फ़ैसला नहीं सुनाया था. वहीं बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों को निर्वाचन प्रमाण पत्र जारी कर दिया गया.
ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं.
मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व प्रमुख सचिव अवधेश प्रताप सिंह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, नामांकन वापसी की समय सीमा समाप्त होने के बाद और उम्मीदवारों के निर्वाचित घोषित हो जाने के कारण मामला पहले की तुलना में अधिक जटिल हो गया है.
हालांकि उन्होंने आगे कहा कि इससे सुप्रीम कोर्ट के अधिकार समाप्त नहीं हो जाते. अगर अदालत यह पाती है कि नामांकन रद्द करने की प्रक्रिया में कोई गंभीर क़ानूनी त्रुटि हुई है, तो वह उपयुक्त आदेश दे सकती है.
लेकिन अगर सुप्रीम कोर्ट रिटर्निंग अफ़सर के फ़ैसले को सही ठहराता है या हस्तक्षेप से इनकार करता है, तो मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए बीजेपी के तीनों उम्मीदवारों का निर्वाचन बरकरार रहेगा.
इसलिए शुक्रवार की सुनवाई का सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या अदालत इस स्तर पर हस्तक्षेप को उचित मानती है या फिर कांग्रेस को चुनाव याचिका जैसे अन्य क़ानूनी विकल्प अपनाने होंगे.
वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक्स पर लिखा, चुनाव आयोग चुप्पी साधे हुए है और मध्य प्रदेश से राज्यसभा के लिए मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पर पुनर्विचार करने की कांग्रेस की मांग का जवाब नहीं दे रहा है, जबकि उपलब्ध सभी सबूत पहली नजऱ में यह संकेत देते हैं कि यह ऐसा मामला नहीं था जिसमें नामांकन ख़ारिज किया जाना चाहिए था.
कम से कम देश की एक शीर्ष संवैधानिक संस्था से स्पष्टता की उम्मीद की जा सकती थी. इस बीच बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिए गए हैं. अब इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में होगी और उम्मीद है कि ‘तारीख़ पर तारीख़’ का सिलसिला और लंबी सुनवाई देखने को मिलेगी. यह उस संस्था के ताबूत में एक और कील की तरह है, जिसे कभी निष्पक्ष निर्णायक के रूप में देखा जाता था.
एआईएमआईएम के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, चुनाव आयोग का कहना है कि अगर किसी उम्मीदवार के ख़िलाफ़ कोई एफ़आईआर दर्ज है, तो उसके बारे में नामांकन पत्र में बताना अनिवार्य है. अब वे कह रहे हैं कि कोई एफ़आईआर थी ही नहीं.
तेलंगाना से राज्यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि यह एक निजी शिकायत (प्राइवेट कंप्लेंट) का मामला था. बीएनएसएस के तहत प्रक्रिया इसी तरह काम करती है. अगर कोई निजी शिकायत दर्ज की जाती है, तो अदालत आपको नोटिस जारी कर यह जानकारी देती है कि आपके ख़िलाफ़ एक शिकायत की गई है.
अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने 12 जून को इस मुद्दे पर संपादकीय प्रकाशित किया है.
इस संपादकीय में कई अहम सवाल उठाए गए हैं.
द हिन्दू ने अपने संपादकीय में लिखा है, मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द किया जाना, अब केवल एक उम्मीदवार का मामला नहीं रह गया है. इसने संस्थागत निष्पक्षता और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई शुक्रवार को करने पर सहमति जताई है. इस बीच बीजेपी के तीनों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित घोषित किए जा चुके हैं, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता और तटस्थता पर बहस तेज़ हो गई है.
रिटर्निंग अफ़सर ने मीनाक्षी नटराजन का नामांकन इस आधार पर ख़ारिज किया कि उन्होंने अपने चुनावी हलफऩामे में हैदराबाद में लंबित एक मामले का जिक़्र नहीं किया था. यह शिकायत सीधे तौर पर मीनाक्षी नटराजन के खिलाफ़ नहीं थी.
शिकायत एक अन्य कांग्रेस नेता के कथित अनुचित व्यवहार और आपराधिक धमकी से संबंधित थी. याचिका में मीनाक्षी नटराजन का नाम इस आरोप के साथ जोड़ा गया था कि उन्होंने संबंधित नेता के खिलाफ़ उचित कार्रवाई नहीं की.
द हिन्दू ने लिखा है, महत्वपूर्ण बात यह है कि मीनाक्षी नटराजन के ख़िलाफ़ तेलंगाना पुलिस ने कोई आपराधिक एफ़आईआर दर्ज नहीं की थी. सामान्य पुलिस मामलों के उलट, निजी शिकायत सीधे अदालत में दायर की जाती है.
इस मामले में अदालत ने शिकायत में नामित सभी व्यक्तियों, जिनमें मीनाक्षी नटराजन भी शामिल थीं, को नोटिस जारी किया था. रिटर्निंग अफ़सर की ओर से इस मामले को नामांकन रद्द करने का आधार बनाना मनमाना फ़ैसला प्रतीत होता है और इससे साजि़श की आशंका तक पैदा होती है.
द हिन्दू ने लिखा है, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33ए के तहत केवल उन्हीं मामलों का उल्लेख करना अनिवार्य है, जिनमें दो साल या उससे अधिक की सज़ा का प्रावधान हो और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जिन मामलों में अदालत आरोप तय कर चुकी हो.
आरोप तय किया जाना एक न्यायिक प्रक्रिया है, जो आरोप पत्र दाखिल होने के बाद होती है. ऐसे में रिटर्निंग अफ़सर का यह कहना कि महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए और नामांकन पत्र अधूरा था, केवल क़ानून की ग़लत व्याख्या नहीं बल्कि सामान्य समझ के भी उलट है.