कौन कहता बुढ़ापे में जिंदगी बोर करती है अगर आप में वो बात नहीं तो इसके लिए जवानी काफी है.

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बात दिल की
शशी कुमार केसवानी

नमस्कार दोस्तो आज एक ऐसी अभिनेत्री की बात करते है जिनकी दंबगाई गजब थी। अपनी बात को खुलकर कहने वाली ये अभिनेत्री इतनी ताकतवर थी किसी के सामने कोई बात कहने में कभी झिझकती नहीं थी। जी हां दोस्तो मैं बात कर रहा जोहरा सहगल की। जो न एक बड़े खानदान में पैदा हुई उनके अंदर भी बड़प्पन था पर साथ ही साथ में अलग रूतबा भी था। शायद आज के जेन-जी को नाम भी याद नहीं होगा । परंतु उनकी फिल्में देखेंगे तो समझ में आएगा कि अभिनय क्या होता है और किस तरह से होता है। अभिनय उनकी सांसों में कुट कुट कर भरा हुआ था। तभी तो गोविन्दा जैसे मस्तीखोर कलाकार को भी साथ काम करने में पसीने निकल आए थे। गोविन्दा को शायद पहली बार समझ में आया था कि किसी बड़े कलाकार के साथ काम करने का क्या अनुभव होता है। अपने जमाने में लोग उन्हें खूब जानते रहे। पर अफसोस ऐसे कलाकारों को समय के साथ लोग भूलते जा रहे है। हमारी कोशिश रहती है कि ऐसे कलाकारों की याद ताजा रखें और समय समय पर कुछ ऐसा करते रहे जिससे इन कलाकारों के होने का अहसास भी होता रहे। तो आइए आज जोहरा सहगल के जीवन से जुड़े कुछ किस्सों पर बात दिल से करते है।

जोहरा सहगल को भारत की पहली महिला अभिनेत्री माना जाता है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली। दरअसल, 29 सितंबर 1946 को जोहरा सहगल की फिल्म ‘नीचा नगर’ कान्स फिल्म फेस्टिवल में रिलीज हुई थी। ‘नीचा नगर’ फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल का सबसे बड़ा अवॉर्ड पाल्मे डी ओर जीता था। जोहरा सहगल हिंदी सिनेमा की एक ऐसी अभिनेत्री थीं जो अपनी जिंदादिली से कभी बूढ़ी नहीं हुईं। जोहरा सहगल 27 अप्रैल 1912 को रामपुर रियासत के नवाबी खानदान में पैदा हुईं। उनका पूरा नाम साहिबजादी जोहरा मुमताजुल्ला खान बेगम था। रामपुर की रोहिल्ला पठान फैमिली के दो बच्चों जकुल्लाह और हजराह की पैदाइश के बाद तीसरे नंबर पर पैदा हुईं मुमताजुल्लाह ने अपने बाद पैदा हुए इकरामुल्लाह, उजरा, एना और साबिरा के साथ अपना बचपन उत्तराखंड के चकराता में गुजारा। पेड़ों पर कूदना, उधम मचाना, बागों से फल तोड़कर खाना और आसपास गुजरते लोगों को परेशान करना जोहरा के बचपन की आदतों में शुमार रहा। ़मां ने बिलकुल सही नाम दिया था – जोहरा। जोहरा का मतलब होता है एक हुनरमंद लड़की। लेकिन यह हुनरमंद लड़की एक खुशकिस्मत लड़की नहीं थी। बहुत छोटी उम्र में उन्होंने अपनी मां खो दिया था। जोहरा इजाडोरा डंकन से न सिर्फ प्रभावित थीं उनकी जिंदगी के कई किस्से भी इजाडोरा की जिंदगी से मेल खाते हैं। जैसे इजाडोरा की तरह उन्होंने भी दुनियाभर में अपने नृत्य का लोहा मनवाया था जोरेश डांस इंस्टिट्यूट जल्दी ही बंद हो गया क्योंकि विभाजन के चलते जोहरा और कामेश्वर सहगल को लाहौर छोड़ मुंबई में बसना पड़ा। भारत को आजादी मिलने की घटना से जोहरा सहगल की जिंदगी का एक बड़ा ही दिलचस्प वाकया जुड़ा हुआ है। हुआ ये कि जब देश को आजादी मिलने की खबर मुंबई में फैली तो जोहरा सब भूलकर आजादी के जुलूस के साथ सारी रात नाची थीं। यही देखकर फिल्म निर्देशक ख्वाजा अहमद अब्बास ने कहा था कि जोहरा सहगल हिंदुस्तान की इजाडोरा डंकन है। मुंबई आकर जोहरा सहगल इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) का हिस्सा बन गई थीं। मुंबई में उस समय थिएटर और सिनेमा साथ-साथ तरक्की कर रहे थे। इप्टा के बाद जोहरा पृथ्वी थिएटर से भी जुड़ीं। पृथ्वीराज कपूर को गुरू मानकर जोहरा सहगल ने अभिनय में कदम रखा। 1946 में उन्होंने इप्टा की मदद से बनी चेतन आनंद की फिल्म नीचा नगर में अभिनय किया था। कान फिल्म महोत्सव में पुरस्कार जीतकर अंतर्राष्ट्रीय पहचान बनाने वाली यह पहली भारतीय फिल्म थी। इसके बाद जोहरा सहगल ने इप्टा और पृथ्वी थिएटर के साथ कई नाटक किए साथ ही कई हिंदी फिल्मों के लिए कोरियोग्राफी भी की। हालांकि किस्मत से जोहरा की आंख-मिचौली अभी जारी थी। कामेश्वर सहगल कला-विज्ञान के जानकार और प्रतिभावान व्यक्ति थे लेकिन उनकी प्रतिभा ने कभी सफलता का स्वाद नहीं चखा। इस बात से कामेश्वर अवसाद में रहने लगे और आखिरकार उन्होंने 1959 में आत्महत्या कर ली। अब जोहरा सहगल अकेली रह गईं। यह अकेलापन भी उनकी और इजाडोरा डंकन की कहानी में एक जैसा है। एक साक्षात्कार के दौरान जब जोहरा से पति की आत्महत्या की वजह पूछी गई तो उन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में जवाब दिया कि जो आदमी उनके जैसी लड़की से शादी करेगा वो आत्महत्या नहीं तो और क्या करेगा। जोहरा की यही जिन्दादिली थी और इसमें वे इजाडोरा से भी आगे रहीं। जोहरा सहगल ने 80 बरस का यह सफर कितनी गर्मजोशी से पूरा किया था इसे महसूस करने के लिए आप उनके सौवें जन्मदिन की एक तस्वीर याद कर सकते हैं जिसमें वे हाथ में एक चाकू लिए हुए, केक के सामने बैठी हैं पति के जाने के बाद जोहरा 1962 में लंदन चली गईं। यहां उन्होंने फिल्म, टीवी और रेडियो के लिए जमकर काम किया। इस दौरान उन्होंने कुछ उल्लेखनीय अंग्रेजी फिल्मों जैसे नेवर से डाई, रेड बिंदी, पार्टीशन, और तंदूरी नाइट्स में काम किया। 1990 के दशक में जोहरा एक बार फिर हिंदी सिनेमा के परदे पर उसी ठसक के साथ लौटीं। दिल से, हम दिल दे चुके सनम, वीर जारा, चीनी कम और सांवरिया इसी दौर की फिल्में हैं।

1945 में जोहरा सहगल ने पृथ्वी थिएटर ज्वॉइन कर लिया। उस वक्त उन्हें 400 रुपये महीने के मिलते थे। पृथ्वी थिएटर के अलावा जोहरा इप्टा की भी सक्रिय सदस्य रहीं। इप्टा ने जब ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में अपनी पहली फिल्म बनाई, ‘धरती के लाल’ तो वह इसकी भी हीरोइन बनीं। इप्टा की वजह से ही जोहरा को चेतन आनंद की ‘नीचा नगर’ में भी काम मिला। वो फिल्मों में कोरियोग्राफी करने लगीं। राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ का मशहूर स्वप्न गीत जोहरा सहगल का ही सजाया हुआ है। इसके बाद से लेकर ऋषि कपूर के बेटे रणबीर कपूर की पहली फिल्म ‘सांवरिया’ तक जोहरा सहगल लगातार दर्शकों के चेहरों पर अपनी खास अदाओं से मुस्कुराहट लाती रहीं। इस तरह उन्होंने कपूर परिवार की चार पीढ़ियों के साथ काम किया। फिल्म इंडस्ट्री में दो दशक बिता चुकी करीना कपूर ने कुछ समय पहले कहा था कि वे जोहरा सहगल जैसा फिल्मी कैरियर चाहती हैं। जोहरा सहगल का यही करिश्मा है कि आज की सफलतम अभिनेत्रियों में शुमार करीना भी उनसे प्रेरित हैं और 80 साल की उम्र में उनकी तरह कैमरे के सामने खड़े होने का ख्वाब देखती हैं। जोहरा सहगल के करिश्माई होने की शायद एक सबसे महत्वपूर्ण वजह यह थी कि 102 साल की उमर में जब उन्होंने दुनियावी मुश्किलों को अलविदा कहा तब भी वे उतनी ही खुशदिल और जीवंत थीं, जितनी अपने 80 बरस के कैरियर में रहीं। जिंदगी के पूरे 80 साल जोहरा सहगल ने अभिनय और नृत्य किया। नृत्य के प्रति उनकी दीवानगी 19वीं शताब्दी की प्रसिद्ध अमेरिकी डांसर इजाडोरा डंकन से प्रेरणा पाकर बढ़ी और बाद में जोहरा हिंदुस्तान की इजाडोरा कहलाईं।

जोहरा सहगल जर्मनी पहुंचीं डांस सीखने

जोहरा सहगल की जिंदगी बचपन में संघर्षों भरी रही। छोटी उम्र में ही उनकी मां का निधन हो गया। उनकी मां चाहती थीं कि जोहरा लाहौर जाकर पढ़ें तो अपनी बहन के साथ वह चली गईं क्वीन मैरी कॉलेज में दाखिला लेने। कॉलेज में सख्त पर्दा होता था। उन्हें डांस का शौक था। एडिनबर्ग में रहने वाले मामा ने उनका इंतजाम कर दिया। इस तरह वो जर्मनी के मैरी विगमैन बैले स्कूल में एडमिशन पाने वालीं पहली भारतीय महिला बनीं। तीन साल तक यहां जोहरा ने नए जमाने का डांस सीखा और इसी दौरान किस्मत से उन्हें मौका मिला वह नृत्य नाटिका देखने का जिसने उनका जीवन बदल दिया। इस दौरान उनकी मुलाकात भारत के मशहूर नर्तक उदय शंकर से हुई। विदेश में इतनी खूबसूरत भारतीय युवती की पारंपरिक नृत्य में दिलचस्पी देख उदय शंकर बहुत खुश हुए और कहा कि वतन पहुंचते ही वह उनके लिए काम देखेंगे। 1935 में जोहरा सहगल ने उदय शंकर को जापान में ज्वॉइन कर लिया। जापान के बाद मिस्र, यूरोप और अमेरिका होते हुए जोहरा ने उदय शंकर के साथ खूब दुनिया देखी। वापस देश लौटकर जोहरा ने उदय शंकर के साथ अल्मोड़ा स्थित स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। यहीं उनकी मुलाकात हुई कमलेश्वर सहगल से। जो कि इंदौर के रहने वैज्ञानिक थे। उन्हें पेटिंग, और भारतीय नृत्य का भी शौक था। जोहरा और कमलेश्वर ने शादी कर ली। जोहरा और कमलेश्वर की शादी तमाम लोगों को रास न आई। हालात दंगे जैसे बन गए थे लेकिन, बाद में सब मान गए। हिंदुस्तान के बंटवारे की आग इनके घर तक भी आई। दोनों लाहौर पहुंचे और यहीं डांस इंस्टीट्यूट खोल लिया था लेकिन जल्दी ही लगने लगा कि इंस्टीट्यूट चलाना तो दूर, लाहौर में जिंदा बचना मुश्किल हो जाएगा। साल भर की बच्ची किरण को लेकर दोनों बंबई भाग आए, जहां जोहरा की बहन उजरा पृथ्वी थिएटर की नामी हीरोइन थी। जोहरा सहगल को 1998 में पद्मश्री, 2001 में कालीदास सम्मान, 2004 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान मिले। संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के तौर पर अपनी फेलोशिप भी दी। देश का सबसे बड़ा दूसरा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण जोहरा सहगल को साल 2010 में मिला। 10 जुलाई 2014 में उन्हें दिल का दौरा पड़ा और 102 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।