स्त्रीत्व के विरुद्ध पाशविकता

0
735

प्रमिला कुमार

मंदसौर की घटना एक जहर बुझे खंजर की तरह दिल, दिमाग में धँस गई । जी चाह रहा है दीवारों पर सर पटक के रोऊँ। उस मासूम बच्ची की तकलीफ की कल्पना से भी दहशत होती है। समझ नही आ रहा उसकी जिंदगी की दुआ करूं या उसके लिये मौत मांगू? बच जाती है तो तन मन ही नही आत्मा के घावों के साथ क्या वाकई वो जिंदगी है? मौत से भी बदतर….
Brutality against femininity
मौत तो एक बार मारेगी पर जिंदगी हर पल, हर आती जाती साँस पर मारेगी। पर ये भी सच है की मौत भी नही मांगी जा रही। कैसी विडम्बना है ये जिंदगी की ना मरने में हैं ना जीने में। ठउफइ के ताजा आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में महिलाओं की वास्तविक स्थिती स्पष्ट हुई हैं । आंकड़ों के अनुसार साल 2015-16 में देशभर में रेप की सबसे ज्यादा घटनाएं मध्य प्रदेश में हुई हैं।मध्य प्रदेश ही इकलौता ऐसा राज्य बन चुका है, जिसमें साल दर साल रेप की घटनाएं घटने के बजाए बढ़ती जा रही हैं। एक ओर जहां पिछले कुछ सालों से मध्य प्रदेश में रेप की सबसे ज्यादा घटनाएं दर्ज की जा रही हैं, वहीं ताजा आंकड़ों के मुताबिक, पिछली बार से प्रदेश में रेप के मामलों में 12.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

साल 2015-16 में देशभर में रेप के कुल 38 हजार 947 मामले दर्ज किए गए, जिनमें अकेले मध्य प्रदेश में ही 4 हजार 882 मामले सामने आए हैं। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में 4 हजार 816 मामले दर्ज किए गए हैं, वहीं महाराष्ट्र में 4 हजार 189 मामले दर्ज किए गए। आज समाज तेजी से भौतिकतावाद की और बढ़ रहा है। समाज का हर तबका चाहे किसी भी आय वर्ग का क्यों ना हो भौतिक संसाधन जुटाने में किसी भी हद तक जाने के लिये तैय्यार है। व्यक्ति सामाजिक स्तर,जीवनयापन के लिये भौतिक सुविधाओं को जुटाने की होड़ मे नैतिक और सामाजिक दायित्वों को भुला चुका है।

इंसानियत को शर्मसार करने वाली गैंग रेप की घटनाओं को लेकर इन दिनों देश में बेहद गुस्से और आक्रोश का माहौल बना हुआ है। सोशल मीडिया में कैंपेन चल रहे हैं, सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, और दोषियों को मौत की सजा देने की मांग उठ रही है. ऐसे में, अगर देश में होने वाले रेप की वारदातों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि कड़े कानूनों के बावजूद रेप की वारदातें कम नहीं हो रही हैं. ये आंकड़े कानून का मखौल उड़ा रहे हैं और महिला सुरक्षा को लेकर किये जाने वाले तमाम दावों की पोल भी खोलते हैं।

सन2012 में दिल्ली के चर्चित निर्भया गैंगरेप मामले के बाद वर्मा कमिशन की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने नया एंटी रेप लॉ बनाया। इसके लिए आईपीसी और सीआरपीसी में तमाम बदलाव किए गए, और इसके तहत सख्त कानून बनाए गए, साथ ही रेप को लेकर कई नए कानूनी प्रावधान भी शामिल किए गए लेकिन आंकड़े बताते हैं की इतनी सख्ती और इतने आक्रोश के बावजूद रेप के मामले नहीं रुक रहे ।

मंदसौर की घटना से एक बार फिर इंसानियत दहल गई है, हमारी नसों में आग भर गई है जिसके ताप से हमारी नसें फटी जा रही हैं, अपनी बेबसी हमारा ही दम घोंट रही है, हम असहाय हैं, अपनी बेटियों को खींचकर हम बार-बार अपनी छाती से लगा रहे हैं। मासूम अधकचरे स्त्रीत्व के प्रति हमारा अपराधबोध फिर बढ़ गया है। हम एक बार फिर अपनी ही बेटियों को बचा पाने में नाकाम रहे हैं। बार बार हर बार हम नाकाम हो रहे हैं।

हम सड़कों पर उतर आए हैं, हमारे हाथों में जलती मोमबत्तियों हैं, हमारे अंदर का हाहाकार, क्रंदन और विरोध नारों की शक्ल में धीरे-धीरे बाहर आ रहा है, हम उस दुनिया को नेस्तनाबूत कर देना चाहते हैं जो हमारी बेटियों को खुशनुमा और सुरक्षित जिंदगी नहीं दे पा रहा।  आज दिल और दिमाग में ये सवाल रह रह के उठा रहा है … क्या इसी डर, दहशत और असुरक्षा के कारण ही भूतकाल में बेटियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था ? बेटियों के माता पिता क्या हमेशा से ही इतने ही अशक्त रहे है?
भविष्य के गर्त में और क्या लिखा है?

इस तरह की घटनाओं को रोकने की दिशा में कुछ ठोस काम किये जाने की आवश्यकता है। लड़कियों को आत्म सुरक्षा का प्रशिक्षण और सभी के लिए नैतिक शिक्षा भी अति आवश्यक है, विशेषकर लड़कों के लिए माँ बाप का सामूहिक दायित्व है कि बच्चों के हार्मोनल बदलावों के मनोवैज्ञानिक असर का विश्लेषण कर मार्गदर्शन करते रहें ताकि समय रहते उनको गलत रास्ते पर जाने से बचाया जा सके।

पिछले कुछ वर्षों में देश में ऐसी घटनायें हुईं जो समाज की स्थिति के बारे में सोचने को विवश करतीं हैं पर क्या कोई सोच भी रहा है?  समाज के लिए अब इस तरह की घटनायें खबरें मात्र ही रह गईं हैं।सवाल उठता है कि ऐसा होता क्यों है? आदमी-औरत के बीच का रिश्ता शरीर पर आकर ही क्यों रुकता है? अकेली लड़की या औरत क्यों अपने शरीर की कीमत चुकाती है? बलात्कार किसी भी स्थिति में हुआ है वह एक महिला के शरीर से, उसके मानसिक और सामाजिक स्तर से गम्भीर आपराधिक छेड़छाड़ है, इसे किसी भी कीमत पर स्वीकारा नहीं जाना चाहिए।