यमुना के बाढ़ के पानी को सुरक्षित कर लिया जाए तो गर्मियों में नहीं होगी दिल्ली में पानी की किल्लत

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नई दिल्ली। यमुना में आने वाली बाढ़ दिल्ली की प्यास बुझा सकती है। अभी यह बाढ़ यमुना के आसपास रहने वाले लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इस बाढ़ के पानी को स्टोर किया जाए तो दिल्ली में गर्मियों के दौरान पानी की कोई किल्लत नहीं रहेगी। लैटिन अमेरिका के कुछ देश और गुजरात में इस तरह के मॉडल पर सफल काम हो रहा है।
If Yamuna floods water is safe then there will be no water in Delhi due to shortage of water
बाढ़ के पानी से जहां ग्राउंड वॉटर रिचार्ज किया जा सकता है, वहीं दिल्ली में बढ़ते जमीनी खारे पानी की समस्या को भी दूर किया जा सकता है। अभी तक यमुना में करीब 15 लाख क्यूसेक से ज्यादा पानी दिल्ली बहकर आ चुका है। इस पानी को स्टोर करने की कोई प्लानिंग ना हो पाने के कारण यह दिल्ली के लिए मुसीबत बनता है और बहकर यूपी और हरियाणा की ओर चला जाता है। बाढ़ के इस पानी से अगर 5 लाख क्यूसेक पानी भी स्टोर कर लिया जाए तो राजधानी की पानी की किल्लत पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।

सिटी और पॉलिसी प्लानर व डीडीए के अडिशनल कमिश्नर प्लानिंग रहे आर जी गुप्ता के मुताबिक बरसात से पहले वजीराबाद बैराज से 8 किलोमीटर दूर यमुना में हरियाणा बॉर्डर तक खुदाई की जाए। यहां पर एक रिजरवॉयर बनाया जाए। जब बाढ़ का पानी आएगा तो इस रिजरवॉयर में स्टोर हो जाएगा। इससे ग्राउंड वॉटर रीचार्ज होगा और पानी की समस्या भी हल होगी। 1979 में डीडीए, जल बोर्ड और बाढ़ एवं सिंचाई विभाग ने एक प्रस्ताव तैयार किया था लेकिन उस पर आज तक अमल नहीं हो पाया।

पेरिफिरल नहर बनाकर स्टोर हो पानी
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के पूर्व चेयरमैन डॉ. डीके चड्ढा के मुताबिक पल्ला से लेकर अशोक विहार, रोहिणी, मंगोलपुरी, द्वारका, वसंत कुंज होते हुए ओखला तक नहर बनाई जाए। ओखला के करीब नहर को यमुना में जोड़ दिया जाए। नहर में जगह-जगह करीब 100 इंजेक्शन वेल बनाए जाएं। इन इंजेक्शन वेल के जरिए पानी जमीन के अंदर छोड़ा जाएगा।

राजधानी में जमीनी पानी 20 मीटर से लेकर 50 मीटर की गहराई पर मिलता है। इसलिए अलग-अलग जगह के मुताबिक इनकी गहराई तय की जाएगी। बाढ़ का पानी इस नहर में छोड़ दिया जाए। गुजरात में ऐसी ही एक योजना के तहत करीब 337 किलोमीटर लंबी नहर बनाई गई है, जो सात जिलों से होकर गुजर रही है। मुसीबत बनने वाली बाढ़ से अब वहां फायदा हो रहा है। इसी तकनीक को महाराष्ट्र में भी अपनाया जा रहा है।