सबरीमाला मंदिर पर फैसले के बाद अब दूसरे धार्मिक स्थलों में ऐसी प्रथाओं को दी जा सकती है चुनौती

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नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर के दरवाजे अब हर उम्र की महिलाओं के लिए खुल गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए महिला के मासिक धर्म की स्थिति को बिल्कुल निजी और गोपनीयता का आंतरिक हिस्सा बताया है। कोर्ट ने फैसले में कहा कि महिला की जैविक और शारीरिक प्रक्रिया से जुड़े समाजिक भेदभाव की संविधान में कोई जगह नहीं है और इस आधार पर किसी से भी भेदभाव की अनुमति नहीं दी जा सकती है। माना जा रहा है कि 4-1 के बहुमत से दिए गए इस फैसला का व्यापक असर होगा। आनेवाले दिनों में दूसरे धार्मिक/पूजा स्थलों में ऐसी प्रथाओं को चुनौती दी जा सकती है।
After the verdict on Sabarimala temple, the challenge can be given to such practices in other religious places.
परंपरा के नाम पर भेदभाव अब और नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिए अपने फैसले में कहा कि शारीरिक आधार (मासिक धर्म) के कारण महिलाओं को पूजा के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है, यह असंवैधानिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि धर्म के नाम पर ऐसी प्रथाएं जो भेदभाव करती हैं लेकिन परंपरा के कारण इसे स्वीकार किया गया है, संवैधानिक बेंच के फैसले के बाद अब इसे चुनौती दी जा सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस फैसले के बाद पूजा स्थल के लिए एक ही धर्म के कुछ लोगों को दूर रखने का औचित्य साबित करने का स्कोप सीमित हो गया है। वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि यह फैसला धर्म में संप्रदाय की अवधारणा को प्रभावित करेगा, जहां धर्म में एक उपसमूह कोई भी प्रथा का अनुसरण करने के लिए विशेष अधिकार का दावा करता है।

आर्टिकल 17 को दिया गया विस्तार
उन्होंने कहा, ‘इस फैसले के बाद विशिष्ट संप्रदाय विशेष के मंदिरों की अवधारणा को दोबारा लिखने की जरूरत है। आर्टिकल 17, जो छुआछूत को लेकर है, उसे विस्तार दिया गया है। जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने शानदार फैसला सुनाया है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को भी एक अधिकार के तौर पर देखने की जरूरत है। इस स्वतंत्रता में संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है और यह महज समानता को लेकर नहीं है।’

लंबित मामलों पर होगा फैसले का असर
पूर्व सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जिन सिद्धांतों को सामने रखा है, उसका असर लंबित और भविष्य के मामलों पर पड़ेगा। परासरन ने कहा, ‘खासतौर से जहां महिलाओं को अलग किया गया है या धर्म के आधार पर भेदभाव देखा जाता है वहां यह फैसला लागू किया जा सकता है। संदेश साफ है कि परंपरागत अधिकार समानता के मौलिक अधिकारों के खिलाफ नहीं जा सकते हैं।’ उन्होंने कहा कि कई धर्मों में महिलाओं की तुलना में पुरुषों को तवज्जो दी जाती है, अब इसे न्यायिक जांच के दायरे में लाया जा सकेगा।