सिंधिया की सभा से अरूण यादव नदारद

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बाखबर/ राघवेंद्र सिंह
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव चरम पर है सभाएं रैलियां और बैठकों का दौर हर दिन बढ़ता जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों में स्टार प्रचारकों की मांग ज्यादा है और वक्त कम। कांग्रेस में ज्याेतिरादित्य सिंधिया की सबसे ज्यादा डिमांड में है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का क्षेत्र होने के नाते बुदनी में प्रदेश का सबसे चर्चित मुकाबला हो रहा है। यहां सबसे खास बात यह रही कि सिंधिया कांग्रेस प्रत्याशी अरूण यादव के लिए बकतरा में सभा करते हैं और मंच पर नेताओं की भीड़ में शिवराज से टक्कर लेने वाले अरूण यादव नजर नही आते।
Arun Yadav absent from Sindhi’s meeting
इसे लेकर क्ष्ोत्र में चर्चाएं शुरू हो गई है। हालांकि कांग्रेस के स्तर पर यह कोई विशेष बात नही है। खोजबीन के बाद पता चला कि यादव जी प्रचार के लिए कसरवद गए है जहां उनके भाई सचिन यादव चुनाव मैदान में हैं। यह बात छोटी सी लग सकती है मगर इसके बड़े मायने है।
चुनाव में जब गलाकाट संघर्ष चल रहा हो तब छोटी – छोटी चूक बड़े – बड़े शक पैदा करती है। और इसका लाभ इसका लाभ कई बार विरोधी दल बड़ी चतुराई से उठाते हैं। सिंधिया की सभा में अरूण यादव का न होना वहां मौजूद श्रोताओं में अचरज की वजह बना हुआ था।

इसे पार्टी के कमजोर सभा प्रबंधन से भी जोड़कर देखा जा रहा है। असल में बुदनी में अपनी उम्मीदवारी को लेकर भी यादव का एक कथित पत्र  भी भाजपा के प्रचार तंत्र में सुर्खियां पा रहा है। पत्र में लिखा गया है कि उन्हें पार्टी ने बुदनी में फंसा दिया है। इसी बीच सिंधिया की सभा और उसमें अरूण यादव के न होने को वोटर जोड़कर देख रहे हैं। अगर यादव की चिट्टी फर्जी है तब भी उनकी सभा में अनुपस्थित बेवजह ही सही उसकी सच्चाई की पुष्टि करती दिख रही है। अब इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व और प्रबंधन का काम है कि वह इस तरह कि गलतियों को दौहराने से बचने के उपाएं करें।

दूसरी तरफ भाजपा और कांग्रेस में असंतुष्टों को सक्रिय करने की कवायद तेज हो गई है। भाजपा में संघ के प्रचारकों को भी सक्रिय किया जा रहा है। पिछले दिनों राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल का बैरसिया में विधानसभा क्षेत्र में जाना संकेत है कि कमजोर सीट पर पार्टी अपने बड़े से बड़े नेता को भेजने में परहेज नही करेगी। इसके बावजूद कार्यकर्ताओं को विधायक और मंत्रियों के चम्पू ठेकेदारों की सत्ता में भागीदारी नही होने का भरोसा कम लोग ही दे पा रहा है। भाजपा को सबसे ज्यादा दिक्कत अबतक कार्यकर्ताओं के मैदान में पूरी तरह सक्रिय नही होने के कारण हो रही है।

दरअसल जो पक्षपात और दलाली करते थे आज भी वैसे ही छुटभैये उम्मीदवारों के नाक कान बने हुए है। कार्यकर्ताओं को लगता है कि एेसे नेताओं शक्ति केन्द्र या पोलिंग बूथों पर भाजपा को बढ़त मिली तो ये दलाल्ानुमा नेता फिर ताकतवर हाे जायेंगे। भाजपा को दिक्कत यह है कि चुनाव के समय वे बदनाम मेनेजरों से छुटकारा भी नही पा सकते। इसके अलावा प्रचार के मामले में खास बात यह है कांग्रेस नेताओं के मुकाबले अकेले शिवराज सिंह सर्वाधिक सभाएं कर रहे हैं। नतीजे बतायेंगें किसके पसीने ने पार्टी को सरकार बनाने में मदद की।