पंकज शुक्ला
उनके प्रतिस्पर्धियों को उनकी किस्मत से रश्क होता है। कई लोग हद की सीमा तक ईर्ष्या कर सकते हैं। वे कई राजनेताओं की आंखों में खटकते हैं मगर उनका कुछ बिगाड़ पाने में स्वयं को असहाय ही पाते हैं। 75 वर्ष पार की उम्र के राजनेताओं को ‘आराम’ देने के कथित फार्मूले के आधार पर उन्हें रिटायर्ड करने की कोशिश की गई लेकिन अखिलाड़ी कप्तान की तरह मैदान में मौजूद हैं। केवल मौजूद ही नहीं हैं बल्कि पूरी तरह चर्चा में बने हुए हैं। इसे किस्मत कहिए या हुनर लेकिन मप्र के बुजुर्ग नेता बाबूलाल गौर और उनकी राजनीति को नजरअंदाज करना मुमकिन नहीं होता। उन्हें येनकेन प्रकारेण प्रासंगिक बने रहना आता है। फिलहाल, वे भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस की ओर से मिले प्रस्ताव के कारण चर्चा में हैं।
Babulal Gaur comes to be relevant …
बाबूलाल गौर के कई परिचय हैं। वे श्रमिक नेता हैं। वे अतिक्रमण हटाने की सख्ती के कारण ‘बूलडोजर लाल’ कहलाए। वे मप्र के भाजपा संगठन को खड़ा करने वाले आरंभिक कार्यकर्ताओं में से एक हैं। वे अपने बयानों के कारण विवादों में घिर जाते हैं मगर उसका लाभ उठाना भी बखूब जानते हैं। कई बार लगता है कि विवाद भी जानबूझ कर खड़े किए जाते हैं। उनकी राजनीति का अपना तरीका है। ऐसा तरीका कि उनके समर्थक रहे नेता आज उनके मुकाबले खड़े हैं मगर ‘गुरु’ को खारिज करना आसान नहीं होता। उन्हें एकतरफ करने, हाशिए पर धकलने की बहुतेरी कोशिशें हुईं। एक ऐसा समय भी आया जब उन्हें रोकने के लिए पूरी किलेबंदी कर दी गई थी मगर अटलजी का ऐसा साथ मिला कि टिकट ही नहीं मिला बल्कि मंत्री भी बने और किस्मत का ऐसा फेर हुआ कि मुख्यमंत्री बनाए गए। 2018 चुनाव में उनका टिकट कटा लेकिन टिकट तो उनकी बहू कृष्णा गौर को ही दिया गया। उन्हें और कितना चाहिए? उनकी इस बात के लिए भी आलोचना होती है कि जिस पार्टी ने उन्हें सबकुछ दिया वे उसके खिलाफ ही हो जाते हैं। पार्टी ने उन्हें छोटे से लेकर मुख्यमंत्री तक हर पद का सुख दिया। फिर वानप्रस्थ की उम्र में उन्हें मोह-माया की तर्ज पर पद लालसा भी त्याग देना चाहिए।
गौर के पास इसका भी जवाब है। वे कहते हैं कि मैं पार्टी ने मुझे बनाया उसके साथ दगा नहीं करूंगा। लेकिन, मैं राजनीति में हूं। मेरा मुकाबला कीजिए। परास्त कर सकें तो बाहर कीजिए या मुझसे हार कर अधीनता स्वीकार कीजिए। मुझे काटा जाएगा तो मैं भी चुप न रहूंगा। यानि, जिस तरह प्रेम और युद्ध में सब जायज माना जाता है वैसे ही अंदाज में राजनीति की जा रही है तो गौर का भी राजनीति का अपना अंदाज है। वे यादव हैं मगर जाति का उपयोग तभी करते हैं जब उसका ‘लाभ’ हो अन्यथा तो ‘सभी’ के बने रहते हैं। वे संघ के मैदानी कार्यकर्ता हैं और संघ व भोपाल के गोविंदपुरा क्षेत्र में उनका अपना समर्थक वर्ग है जो एक ‘कुटुंब’ की तरह है। लगभग हर बार वे साफगोई से वादे करते हैं। छोटा हो या बड़ा, जो काम न हो पाएगा उसे सिरे से इंकार करते हैं और जो हो सकता है उसके बारे में उन्हें एकबार से अधिक कहना नहीं पड़ता। मैदानी ताकत बना कर रखना, ऊपर तक सम्पर्कों को सदैव जीवंत रखना, समर्थकों की टीम को सक्रिय बनाए रखना और सहज उपलब्धता जैसे कुछ हुनर गौर की ताकत हैं। इसके साथ ही राजनीति के अन्य ‘टूल्स’ का भी गौर ने प्रयोग किया ही है। इस तरह, उनकी आलोचना, निंदा या प्रशंसा के कई सिरे हैं जिस भी राह पर निकलेंगे दूर तक जाया जा सकते हैं।
फिलहाल, वे चर्चा में हैं क्योंकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने एक मुलाकात में प्रस्ताव दिया है कि गौर भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ लें। मजाकिया अंदाज में दिए गए इस प्रस्ताव की गंभीरता का पता नहीं लेकिन गौर ने इसे भी ‘टूल’ बना लिया और वे सुर्खियों में आ गए। वे अपने समकालीनों तो ठीक वर्तमान के अन्य राजनेताओं से अधिक सक्रिय और चर्चा में रहते हैं। और चर्चा में रहना राजनीति की चंद अनिवार्यताओं में से एक है। गौर राजनीति की ऐसी ‘पाठशाला’ की तरह हो गए हैं, जिनके पास सीखने-सिखाने के लिए बहुत कुछ है।

