जबलपुर। मध्यप्रदेश के सियासी शतरंज पर सभी दलों ने अपने-अपने मोहरे तैनात कर दिये हैं. सभी दलों के महारथी सधी हुई चाल से एक दूसरे को मात देने की तैयारी में हैं. इसी चाल से जहां बीजेपी जीत का चौका लगाने के सपने देख रही है, वहीं कांग्रेस सत्ता में वापसी की राह देख रही है. लेकिन, इन सबके बीच सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है.
Camel will sit in great skill, BJP will set up chances of victory or Congress will return to power
नर्मदा की गोद में बसा महाकौशल अंचल बीजेपी-कांग्रेस के लिये अहम माना जा रहा है. सूबे की राजनीति को समझने वाले जानकारों का मानना है कि महाकौशल अंचल का मतदाता हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहता है. लिहाजा बीजेपी इस बार महाकौशल में अपना गढ़ बचाने की लड़ाई लड़ रही है तो कांग्रेस पुरानी जमीन तलाशने में जुटी है. इस अंचल में जबलपुर, नरसिंहपुर, छिंदवाड़ा, कटनी, सिवनी, मंडला, डिंडौरी और बालाघाट सहित आठ जिले शामिल हैं. जिनके अंतर्गत 38 विधानसभा सीटें आती हैं.
कहा जाता है कि ये 38 सीटें ही सूबे में पार्टियों के हार-जीत के गणित में अहम रोल अदा करती हैं, जबकि इस बार के चुनाव में तो महाकौशल बड़ी भूमिका में है क्योंकि बीजेपी-कांग्रेस के सेनापति राकेश सिंह और कमलनाथ इसी अंचल से आते हैं. जिसके चलते इन दोनों को भी अपनी-अपनी पार्टियों को इस अंचल में बढ़त दिलाने की चुनौती है.
समस्याओं से घिरा महाकौशल
खनिज संसाधनों से परिपूर्ण महाकौशल अंचल अनेक समस्यायों से घिरा नजर आता है. बेरोजगारी और किसानों की बदहाली यहां सबसे बड़ा मुद्दा है. जबलपुर, नरसिंहपुर और बालाघाट को छोड़ दिया जाये तो बाकी पांच जिले में उपजाऊ जमीन होने के बाद भी पानी की कमी साल भर बनी रहती है. जिससे किसानों को उनकी फसलों का लाभ तक नहीं मिल पाता, जबकि पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी क्षेत्र में उद्योग धंधे नहीं होने के चलते बेरोजगारों की भरमार है. लिहाजा ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों से लोग रोजगार की तलाश में पलायन कर रहे हैं. इसके अलावा जबलपुर और छिंदवाड़ा को छोड़कर पूरे अंचल में स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क का अभाव साफ तौर पर दिखाई देता है. जिससे यहां के लोग नाराज हैं.
पिछड़ेपन-गरीबी की मार झेल रहा आदिवासी क्षेत्र
महाकौशल अंचल के बालाघाट, सिवनी, मंडला, डिंडौरी और छिंदवाड़ा आदिवासी बाहुल्य माने जाते हैं. जहां की अधिकतर आबादी जंगलों के बीच रहती है क्योंकि महाकौशल क्षेत्र में 50 प्रतिशत से भी ज्यादा जंगल है. लेकिन, यहां रहने वाले आदिवासी बुनियादी सुविधाओं के आभाव में जीवन जीने को मजबूर हैं. यहां पानी सबसे बड़ी समस्या है, जबकि रोजगार की तलाश में यहां के लोग पलायन करते हैं और शोषण का शिकार होते हैं, अकेले डिंडौरी जिले में 2 दर्जन से ज्यादा मानव तस्करी की एफआईआर दर्ज है. जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन भोलेभाले आदिवासियों का शोषण किया जाता है. भले ही सरकारें आदिवासियों के विकास के लाख दावे करे. लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही नजर आती है.
पर्यटन में पिछड़ा महाकौशल
नर्मदा की गोद में बसे और खनिज संपदा से संपन्न महाकौशल अंचल में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. यहां कान्हा और पेंच जैसे दो बड़े बाघ अभयारण्य हैं, जबकि भेड़ाघाट जैसा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन केंद्र है. लेकिन, इसके बावजूद भी यहां पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये कोई विशेष प्रयास नहीं किये गये, जबकि आदिवासी क्षेत्रों में भी पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. इसके अलावा पूरे अंचल में फैली नर्मदा नदी का विकास कागजों पर तो काम हुआ, लेकिन इसकी जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है. नर्मदा के आस पास भी पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, इस दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई, इस अंचल का सबसे बड़ा शहर जबलपुर देश की स्मार्ट सिटी में शामिल है, लेकिन अब तक इस शहर में मेट्रो परियोजना तक लंबित है.
मध्यप्रदेश की सियासत के केंद्र में है महाकौशल
बीजेपी और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष महाकौशल से होने के चलते चुनावी रण में यह अंचल सूबे की सियासत के केंद्र में है. दोनों पार्टियां यहां की 38 सीटों में ज्यादा से ज्यादा सीटों पर जीत दर्ज करने की कोशिश में हैं. बीजेपी कांग्रेस का आला नेतृत्व भी यहां पूरी ताकत के साथ जुटा है, पीएम मोदी जहां कमलनाथ के गढ़ में सभा कर चुके हैं तो संघ की मजबूत पकड़ वाले जबलपुर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी रैली कर चुके हैं, जबकि दोनों पार्टियों का प्रदेश नेतृत्व भी यहां पूरी ताकत झोक रहा है. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि महाकौशल का मतदाता किस पर अपना भरोसा जताता है.

