कांग्रेस को चाहिए अब पूर्णकालिक प्रदेशाध्यक्ष

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  • सदमे से बाहर निकालने का सामर्थ्य केवल दिग्विजय के पास
  • सिंधिया की छवि अच्छी, लेकिन उन तक कार्यकर्ताओं की पहुंच मुश्किल

भोपाल

लोकसभा चुनाव में भाजपा और एनडीए सहयोगी दलों से मिली शिकस्त के बाद कांग्रेस अभी सदमे से उबरी नहीं है। यह स्वाभाविक भी है। इस चुनाव में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी और उनके चुनिंदा नेताओं ने अपनी तरफ से प्रचार या मेहनत में कोई कमी रख छोड़ी थी, किंतु रणनीतिक मोर्चे और मुद्दों को भुनाने में वे कामयाब नहीं हो सके।

कहा जा रहा है कांग्रेस की डोर नए नेताओं के हाथ में दी जाए। लेकिन इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है कि रातों-रात ये नए नेता कहां से आएंगे ? दूसरी तरफ कुछ कहते हैं आज नेता नहीं, सोच बदलने की जरूरत है। नई सोच के साथ पंचायतों, नगरीय निकायों और सहकारी संस्थाओं के चुनाव लड़े जा सकते हैं। यह काफी हद तक सही है।

मध्यप्रदेश में भी कांग्रेस अभी सामान्य नहीं हो सकी है। किसी को नहीं मालूम कि अब जनता के बीच जाने की शुरूआत कहां से और कैसे की जाए ? पार्टी को अब पूर्णकालिक प्रदेशाध्यक्ष चाहिए। इससे भी बड़ा सवाल है कि किसकी सदारत में अब प्रदेश कांग्रेस काम करेगी ? मुख्यमंत्री कमलनाथ अफसरों के साथ बैठकों के दौर शुरू कर चुके हैं और चुनाव के दौरान मिली शिकवे-शिकायतों के बाद कुछ अफसरों के तबादले भी। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या प्रशासन चलाने का मतलब सिर्फ तबादले करना है ? या अब भी सरकार में हो रहे तबादलों से दलालों का पेट भर रहा है।

मप्र में आज लगभग सभी अंचलों में भारी गर्मी के चलते लोग जलसंकट से परेशान हैं। उस पर बिजली संकट ने लोगों को मुसीबत में डाल रखा है। खरीफ फसल की तैयारियों के लिए खाद और बीजों का प्रबंध किया जाना है, जो किसानों की अपेक्षाओं के मद्देनजर महत्वपूर्ण विषय है। अक्टूबर २०१८ के बाद से लगातार दो चुनावों की व्यस्तताओं ने सड़कों के रखरखाव और मरम्मत को हाशिए पर धकेल दिया है। नए शैक्षिक सत्र के लिए किताबों-गणवेषों का प्रबंध, मानसून के दौरान पौधारोपण, चिकित्सा सेवाएं, ऐसे अनेक मामले हैं, जो आज सरकार के हस्तक्षेप एवं समीक्षा की बाट जोह रहे हैं। और इन सब के लिए सरकारी खजाने में पैसा जुटाने की चुनौती तो है ही।

बहरहाल, इन सबके चलते मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी दूसरी भूमिका यानी बतौर कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष पार्टी के लिए कितना समय निकाल पा रहे हैं, यह समझना मुश्किल नहीं। कांग्रेस की सांगठनिक तैयारियों और उसकी मजबूती की सच्चाई इस लोकसभा चुनाव ने उघाड़ कर रख दी है। उचित तो यह होता कि मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद श्री कमलनाथ स्वेच्छा से कांग्रेस के प्रदेश मुखिया का पद त्याग देते। वजहें जो भी हों, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सके। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद अब वे कांग्रेस हाईकमान के साथ आम कार्यकर्ता की आलोचना का हिस्सा बन रहे हैं। हालांकि यह भी सही है कि मोदी की सुनामी इतनी तेज थी कि चुनाव नतीजों में तब भी ज्यादा कुछ फर्क नहीं होना था। लेकिन प्रदेशाध्यक्ष की कुर्सी को समय से छोड़कर वे काफी हद तक खुद को हार की समीक्षा से बचा सकते थे।

कांग्रेसी हल्कों में अब यह चर्चा जोर पकड़ चुकी है कि अगला प्रदेशाध्यक्ष कौन ? कुछ लोग प्रदेश कांग्रेस की कमान युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को देने की मांग कर रहे हैं। सिंधिया एक सुशिक्षित और साफ-सुथरी जनछवि वाले युवा नेता हैं। लेकिन फिर वही सवाल है कि क्या सिंधिया इस योग्य हैं ? क्या वे पूरे राज्य के जिलों और वहां के कांग्रेस नेताओं से भली भांति परिचित हैं ? ज्यादातर राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि वे अब भी महाराजा हैं। आम कार्यकतार्ओं के लिए उन तक अपनी पहुंच बनाना अक्सर मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, मुख्यमंत्री की कुर्सी दौड़ में वे कमलनाथ के प्रतिद्वंदी रहे हैं। उनके प्रदेशाध्यक्ष बनने पर सरकार और संगठन के बीच समन्वय कितना सुगम होगा ? यदि प्रदेश के अन्य कांग्रेस नेताओं सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, अजय सिंह, अरूण यादव पर नजर डालें, तो पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ही ऐसे अनुभवी और स्वीकार्य नेता के रूप में सामने आते हैं, जो कांग्रेस संगठन और कार्यकतार्ओं को इस मुश्किल दौर में खड़ा कर सकते हैं और अवसाद से बाहर ला सकते हैं।

भोपाल लोकसभा चुनाव के परिणाम भले ही विपरीत रहे हों, वे दिग्विजय सिंह ही थे, जिन्होंने भोपाल में दिखाया कि योजनाबद्ध और मेहनत से चुनाव कैसे लड़ा जाता है। यही वजह थी कि मतगणना के दिन तक कोई भी राजनीति का जानकार प्रज्ञा सिंह ठाकुर की जीत का दावा करने की स्थिति में नहीं था। नर्मदा यात्रा के बाद से दिग्विजय प्रदेश के कई अंचलों के नेताओं से जीवंत संपर्क में रहे हैं। उनके पास अपने समर्थकों की बड़ी फौज है।

इतना नहीं, इस यात्रा और चुनाव के माध्यम से उन्होंने अपनी ह्यहिंदू-विरोधीह्ण छवि से बाहर निकलने के प्रयास भी किए हैं। वे एक इंजीनिअर है। नम्र और चतुर हैं और विरोधी दलों के नेताओं से रिश्ते बनाए रखने में माहिर हैं। भोपाल में वे अपनी इच्छा के विरूद्ध सिर्फ कमलनाथ के कहने पर चुनाव लड़े। वे जानते हैं कि अब नए दौर की राजनीति में अल्पसंख्यकों के साथ बहुसंख्यक मतदाताओं को साधना भी जरूरी है। यही कुछ कारण हैं, जो उन्हें प्रदेश के कांग्रेस के कार्यकतार्ओं के करीब ले जाते हैं। यह देखना अब दिलचस्प होगा कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी मान-मनौव्वल के लिए कितना समय लेते हैं और मध्यप्रदेश में पार्टी की कमान किसे सौंपते हैं ?