पंकज शुक्ला
प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड (पीईबी) ने नायब तहसीलदार पद के लिए आयोजित की गई विभागीय प्रतियोगिता परीक्षा निरस्त कर दी गई है। यह परीक्षा किसी तकनीकी या मानवीय त्रुटि के कारण नहीं बल्कि इरादतन नकल करवानें, पेपर सेट करने में गड़बड़ी करने जैसे तमाम कारणों की शिकायतों के सच पाए जाने के बाद की गई हैं। जहां एक और मप्र को बीमारू राज्य की छवि से बाहर ला कर विकसित राज्य बनाने के प्रयास हो रहे हैं। स्वच्छता के पैमानों पर यहां के दो शहर रिकार्ड तोड़ कार्य कर देश में पहले और दूसरे नंबर पर बने हुए हैं। सात से अधिक शहरों को स्मार्ट सिटी बनाया जा रहा है। वहीं, शिक्षा के गिरते स्तर के बीच परीक्षाओं खासकर भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी सारे प्रयासों पर दाग ही है जो सरकारी तंत्र का अक्षम्य अपराध है।
Duplicate examination canceled: Dangnama Government Strips among efforts to polish MP
मप्र का ग्वालियर-भिंड क्षेत्र खुलेआम नकल के कारण कुख्यात रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद कहा नहीं जा सकता कि वहां सारी परीक्षाएं बिना नकल के सम्पन्न होती हैं। ग्वालियर में मुख्यालय वाले सरकारी विभाग भू अभिलेख एवं बंदोबस्त से जुड़ी नायब तहसीलदार परीक्षा ने उसकी इस कुख्याति में इजाफा किया है। इस विभाग के पटवारियों को नायब तहसीलदार बनाने के लिए पीईबी ने 30 जून को विभागीय परीक्षा आयोजित की थी। 1694 पदों के लिए पांच हजार से अधिक राजस्व निरीक्षकों, पटवारियों व लिपिकों ने विभागीय परीक्षा में भाग लिया था। सभी 18 परीक्षा केन्द्र भोपाल में ही बनाए गए थे। लेकिन परीक्षा आरंभ होते ही विवादों से घिर गई। उम्मीदवारों ने परीक्षा के दौरान भारी गड़बडियों की शिकायत कीं।
परीक्षा केंद्र वैष्णवी इंजीनियरिंग कॉलेज में सर्वर ठप होने से 70 उम्मीदवार परीक्षा देने से वंचित रह गए। इनसे शाम को अन्य केन्द्र में परीक्षा दिलवाई गई। इसी केन्द्र में सामूहिक नकल का वीडियो वायरल हुआ था। इतना ही नहीं आरोप लगा कि दूसरे प्रश्न पत्र में 100 में से 78 प्रश्न ग्वालियर के तारक प्रकाशन द्वारा छापी गई गाइड में से पूछे गए हैं। इस गाइडके लेखक इसी विभाग के रिटायर्ड एसएलआर बीके शर्मा व रिटायर्ड डिप्टी कमिश्नर आरके शर्मा हैं। नियम के अनुसार पेपर में पूछे गए प्रश्न अलग-अलग 5 किताबों से लिए जाने चाहिए। किसी एक किताब में से 30 फीसदी से अधिक प्रश्न नहीं लिए जा सकते। पीईबी ने सफाई में कहा कि प्रश्न पत्र बनाने का काम आउट सोर्स किया गया था।
कहना कुछ भी हो, परीक्षा में भारी घोटाला सिद्ध हुआ और अंतत: इसे निरस्त कर दिया गया। इस परीक्षा में पास करवाने के नाम पर 20 से 25 लाख रुपए मांगे जाने की शिकायतें भी हैं। उम्मीदवार यह पैसा देते क्योंकि उनकी नौकरी की शुरूआत ही भ्रष्टाचार से होती है। असल में, पटवारी पद के लिए चयन के बाद आयुक्त भू अभिलेख एवं बंदोबस्त कार्यालय चयनित उम्मीदवारों को प्रशिक्षण दे कर पांच प्रश्नपत्रों वाली विभागीय परीक्षा लेता है। इस परीक्षा में पास होने के बाद ही पटवारी के पद पर नियुक्ति मिलती। इसमें पास करने के लिए खुल कर पैसे लिए जाते। वजह यह कि यदि चयनित युवा एक भी पेपर में अटक जाता है तो उसे अगले साल तक परीक्षा का इंतजार करना होता और उसकी पदस्थापना में एक साल की देरी हो जाती। एक साल की वरिष्ठता खोन से बचने के लिए चयनित पटवारी दलालों के चंगुल में फंसते हैं।
इसलिए, जब नायब तहसीलदार पद के लिए विभागीय परीक्षा की बात हुई तो कुछ उम्मीदवारों ने भ्रष्टाचार को ही शिष्टाचार मान लिया। शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर सवालों में घिरे रहने वाले मप्र में सरकारी विभागों खास कर परीक्षा की केन्द्रीय इकाई प्रोफेशनल एग्जामिनेशन बोर्ड का यूं दागदार होना स्वीकार नहीं किया जा सकता। यहां अध्यक्ष रहते हुए पूर्व एसीएस एमएम उपाध्याय ने परीक्षा में गड़बड़ी रोकने तकनीकी सुदृढ़ता के साथ आॅनलाइन परीक्षा जैसे कई अन्य कदम उठाए थे। मगर, ऐसे उदाहरणों से इन प्रयासों पर विश्वास घटने लगता है। साथ ही, प्रदेश को विकसित और भ्रष्टाचार मुक्त बनाने की कोशिशों पर भी पलीता लगता है। परीक्षा निरस्त होने के बाद पीईबी दोषियों पर जो भी कार्रवाई करे, उसकी कार्यप्रणाली पर तो संदेह हुआ ही है। उसके लिए यह साबित करना मुश्किल है कि ह्यपूरे कुएं में भांग नहीं घुली है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

