बिछडे सभी बारी बारी…

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ब्रजेश राजपूत, भोपाल

मौत तो आनी है तो फिर मौत का डर क्यों रखूं,,
जिंदगी आ तेरे कदमों पर मैं अपना सर रखूं,,
कवि कुंवर बैचेन की ये पंक्तियां पढकर थोडी बैचेनी कम होने को ही थी कि खबर मिली कि प्रिय कवि कुंवर बेचैन भी हमें छोड गये। अजीब सा दौर है जो पहले कभी देखा नही कभी सोचा नहीं और कभी भुगता नहीं। जाने क्यों इस अभिशप्त दौर को देखने के लिये हम सब मजबूर हैं। सुबह उठते ही अखबार खोलने से पहले मोबाइल के वाट्सएप पटल पर बुरी खबरें टपकने लगती हैं। ये सूचना मार्का खबरें जो पहले कभी इतनी डरावनी नहीं थीं। एक शोक की खबर पर हम दोस्त हफ्ते भर चर्चा करते थे। अब तो एक दुख भरी खबर को दिल जब्त भी नहीं कर पाता है कि दूसरी खबर सामने आ जाती है। कोरोना त्रासदी के इस दौर में हममें से सभी अपने परिजनों और परिचितों को असमय खो रहे हैं।
अपनी बात करूं तो पिछले एक हफ्ते में ही मेरे परिचितों में फिल्म और कला समीक्षक सुनील मिश्रा, जनसंपर्क के साथी मनोज पाठक, पत्रकार मनोज राजपूत और कवि पत्रकार महेंद्र गगन इस फानी दुनिया से विदा हो चुके हैं। ऐसा गमगीन सप्ताह जिंदगी में पहले कभी नहीं आया। किसी एक मित्र के बारे में सोचने और कुछ लिखने बैठता हूं तो दूसरे की दुखद खबर आ जाती है। थक हार कर अंगुलियां थम जाती हैं दिल बैठ जाता है। मगर इस बार दिल कडा किया है सोचा है मैं नहीं लिखूंगा तो कौन लिखेगा इन प्यारे साथियों के बारे में जिनके साथ भोपाल भोपाल लगता था।
सुनील मिश्रा को भोपाल आने से पहले ही देश भर की पत्रिकाओं में पढकर जान चुका था। फिल्मों पर उन जैसा सीधा और सरल लिखने वाला दूसरा कोई ना था। जितना सरल वो लिखते थे उतने ही सहजता से रिश्ते बनाते और निभाते भी थे। फिल्मों के बारे में कुछ लिखने में यदि आप भटकते थे तो सुनील भाई तुरंत फोन पर पूरी जानकारी कलाकार और उससे जुड़ी घटनाओं की देते थे। बेहद विनम्र और फिल्म से लेकर कला और कलाकार की पूरी कुंडली रखने वाले सुनील जी से भारत भवन और संस्कृति विभाग के कार्यक्रमों में लगातार मुलाकात होती। वो लगातार हमारे लिखने पर नजर रखते और मिलते तो खुशी भी जताते। सुनील भाई इतनी जल्दी साथ छोड जायेंगे ये हमने सोचा ही नहीं था वरना और बहुत सारे किस्से रिकार्ड करवा कर रख लेते उनके जाने के बाद सुनने के लिये।
मनोज पाठक के बिना भोपाल सूना है। वो मेरी नजर में भोपाल के सबसे भले आदमी थे। सबकी भलाई और मदद करने वाले उन जैसे बिरले ही होते हैं। तभी तो भोपाल की पूरी पत्रकार बिरादरी उनके जाने के बाद से ऐसे सदमे में हैं जैसे उनके घर का कोई करीबी ही नहीं रहा। जनसंपर्क कर्मी तो वो नाम के थे दिल से पक्के पत्रकार इसलिये हर पत्रकार के सुख दुख का ख्याल रखने वाले। सन दो हजार में मेरे भोपाल आने के बाद से ही उनसे ऐसे संबंध बने कि वो शहर में मेरे सबसे बडे हितचिंतक थे। अभी पिछले दिनों वो विधानसभा में मिले तो मनोज शर्मा को ताना मारा कि ब्रजेश की नयी किताब आयी है और हम कुछ जश्न ही नहीं मना पा रहे तो चलो लस्सी ही पी लो। और फिर क्या था विधानसभा के गेट पर सांची पार्लर पर वो मुझे और मनोज को लस्सी पिलाने लाये मगर जब तक वो वहां से हटते मनोज भाई पंद्रह बीस पत्रकार और कैमरामैन को लस्सी पिला चुके थे । कोरोना में बीमार पड़ने की खबर करीबियों को ही मालुम थी और जब तक सबको खबर आती लोग प्रयास करते वो किसी की मदद लिये बिना ही अंतहीन सफर पर निकल पडे। और हम कहते ही रह गये कि भगवान भले आदमियों को क्यों बुलाने में इतनी जल्दी करता है।
मनोज राजपूत भी कम ना थे। खासे दबंग और तीखे सवाल पूछने वाले पत्रकार। पिछले सालों में उन्होंने ढेर सारे संस्थानों में काम किया तो एक दिन मैंने बिना मांगे की सलाह दे डाली। भाई जहां जाओ थोडा टिक कर काम किया करो। क्यों संस्थान में जाते ही निकलने की उतावली करने लगते हो। इस पर मनोज ने जो जवाब दिया वो आज के जमाने की कड़वी सच्चाई हैं मनोज ने कहा एक तो सबको आप जैसी सुरक्षित नौकरी नहीं मिलती दूसरी हम जैसों को जो मिलती है तो मालिक पत्रकारिता छोड दूसरे सारे काम करने को कहता है। हालांकि पिछले कुछ दिनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती ही जा रही थी उस पर बेरोजगारी की मार लगने लगा था कि ये पत्रकार अब अपने अच्छे दिनों में नहीं है। ऐसे में कोरोना ने मनोज को हमसे जल्दी छीन ही लिया।
महेंद्र गगन भी भोपाल में पत्रकारों की उस परंपरा को निभा रहे थे जो पत्रकारिता के साथ लेखन और प्रकाशन में सक्रिय रही है। पहले पहल साप्ताहिक और उससे अलग उनकी कवि की छवि। मेरी एक किताब उनके प्रेस में छपी जिस वजह से लंबा आना जाना उनके प्रेस में रहा और उनको करीब से जाना तो लगा कि जितने सहज इनका व्यवहार है उतना सरल ही उनका लेखन भी है। दुर्भाग्य देखिये कि कोरोना से बचने के लिये उन्होने सुंदर कविता लिखी थी अपने घर में रहो। इस कविता की कुछ पंक्तियां देखिये
इधर उधर न रहो,
न किसी सफर में रहो,
वक्त का तकाजा है,
अपने घर में रहो,
वक्त के तकाजे से लोगों को आगाह करते करते महेंद्र गगन जी हम सबको छोड गये। अपने इन सभी अग्रजों को विनम्र श्रद्धांजलि,,,
ये लेख दो दिन पहले लिखा था सोचा था कुछ फेरबदल करूंगा मगर आज सुबह फिर एक अपने करीबी पवन सिंह की मौत की खबर आ गयी और दिल कांप गया।एबीपी न्यूज भोपाल में मेरे साथ रहे हंसमुख और जिंदादिल पवन को भी कोरोना ने छीन लिया। प्रिय पवन ये भी कोई उम्र होती है जाने की ? अब मैं इस कड़ी को लंबा नहीं करना चाहता..
विचारक अर्सेनी तर्कोवस्की ने सच ही कहा था कि ,,
जीवन चल रहा है हमारी इच्छाओं से अलग ..
मगर कब तक ?