राजेश बादल
अमेरिका जल रहा है और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की आग बुझाने का दावा कर रहे हैं । इस विराट मुल्क़ के इतिहास में संभवतया पहली बार ऐसी स्थिति बनी है । अमेरिका का रोम रोम क़र्ज़ से बिंधा हुआ है और किसी नियंता के माथे पर उसकी फ़िक़्र तक नहीं दिखाई देती। ऋण की रफ़्तार इतनी तेज़ी से बढ़ी है कि सारे अर्थशास्त्री हैरत में हैं।दिसंबर 2024 मै अमेरिका का कुल क़र्ज़ बढ़कर 3061 लाख करोड़ रुपए हो चुका था ।ठीक पांच साल पहले यानी 2025 में यह क़र्ज़ 2212 लाख करोड़ रुपए और उससे केवल 3 साल पहले 2017 में यह 2016लाख करोड़ रुपए था । दिलचस्प यह कि 2008 में यह आंकड़ा 826 लाख करोड़ और 2001 में 429 लाख करोड़ रुपए मात्र था।ज़ाहिर है कि अमेरिका की वित्तीय हालत लगातार बिगड़ती रही है। बराक ओबामा के राष्ट्रपति शासन तक तो फिर भी गनीमत थी। उनके बाद तो हालात बद से बदतर होते गए हैं। डोनाल्ड ट्रंप तो अमेरिकी धन को जिस तरह उड़ा रहे हैं ,वह चौंकाता है। एक अमेरिकी अर्थशास्त्री ने तो चेतावनी देते हुए कहा है कि अमेरिका बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है। यदि तत्काल उपाय नहीं किए गए तो वित्तीय मोर्चे पर मुल्क़ में हाहाकार मच जाएगा।
हम केवल अमेरिका के अर्थतंत्र की बात ही नहीं करना चाहते। यह इस सभ्य लोकतंत्र में पहली बार हुआ है जब 2700 शहरों में लगभग एक करोड़ लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया है। इससे कुछ समय पहले भी एक साथ हज़ारों शहरों में ट्रंप के रवैये के ख़िलाफ़ लाखों लोग सड़कों पर आ गए थे।इन आंदोलनों के ज़रिए अमेरिका की साक्षर और जम्हूरियत प्रेमी अवाम डोनाल्ड ट्रंप के सामंती स्वभाव और कार्यशैली का बार बार विरोध कर रही है। वह राष्ट्रपति के रूप में उनके निर्णयों को अहंकारी और तानाशाही मानती है। डोनाल्ड ट्रंप ने अनेक राज्यों में अपने गवर्नर्स के रार मोल ली है। यह गवर्नर्स डोनाल्ड ट्रंप को फूटी आँखों नहीं सुहाते।मीडिया के साथ इस डोनाल्ड ट्रंप के इस दूसरे कार्य काल में भी तलवारें तनी हैं। उनके झूठ बोलने की आदत और अधिनायकवादी रूख के ख़िलाफ़ पिछले कार्यकाल में पत्रकारों और संपादकों से उनके रिश्ते बेहद कड़वे थे।मगर , इस बार तो चुनाव जीतने के बाद उनकी लोकप्रियता का ग्राफ़ तेज़ी से गिरा है।अमेरिकी इतिहास में कभी कोई राष्ट्रपति इतनी जल्दी इतना अधिक बदनाम नहीं हुआ।
क्या यह हैरान करने वाली बात नहीं है कि डोनाल्ड ट्रंप को प्रतिपक्ष का इतना सशक्त विरोध का सामना करना पड़ रहा है कि लाखों कर्मचारियों के भूखों मरने की नौबत आ गई है। क़रीब साढ़े सात लाख कर्मचारी छोटी छोटी दैनिक वेतन वाली नौकरियाँ कर रहे हैं या घर घर भोजन के डिब्बे पहुँचा रहे हैं। एक अक्टूबर से देश में शट डाउन चल रहा है और यह इतिहास का दूसरा सबसे लंबा शट डाउन है। बीस अक्टूबर को डोनाल्ड ट्रंप का फंडिंग प्रस्ताव सीनेट में ग्यारह बार मतदान खारिज हो गया।इससे पहले दिसंबर 2018 में सबसे लंबा 35 दिन का शट डाउन हुआ था।सन्दर्भ के तौर पर बता दूँ कि भारत में जिस तरह एक अप्रैल से नया वित्तीय साल प्रारंभ होता है ,उसी तरह अमेरिका में एक अक्टूबर से यह सिलसिला शुरू होता है। अगर एक अक्टूबर तक सरकार का बनाया बजट मंज़ूर नहीं होता तो सारे सरकारी कामकाज बंद हो जाते हैं। इस बार भी ऐसा ही हुआ है।रिपब्लिकन सरकार के प्रतिपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी से ओबामा स्वास्थ्य देखभाल कार्यक्रम में सब्सिडी पर गंभीर मतभेद हैं। डेमोक्रेट स्वास्थ्य बीमा की राशि बढ़ाना चाहते हैं ,पर ट्रंप सरकार का ख़ज़ाना खाली है।अगर वह सब्सिडी बढ़ाती है तो ट्रंप सरकार के बहुत से खर्चों पर पहाड़ टूट पड़ेगा। इसलिए वह बच रही है।स्थिति इतनी खराब है कि दो दिन पहले क़रीब 8000 से अधिक हवाई उड़ानें अस्त व्यस्त हो गईं और लगभग डेढ़ सौ उड़ानें रद्द करनी पड़ी हैं। अब तक कुल 24000 से अधिक विमानों का संचालन लड़खड़ा गया है। यह एक सभ्य और दुनिया के सांसे अमीर मुल्क़ का दृश्य है। सेना ,पुलिस , बॉर्डर सिक्योरिटी और एयर ट्रैफिक कण्ट्रोल के लोग वेतन नहीं मिलने से अवकाश पर हैं। परमाणु हथियारों से जुड़े कोई 1500 अधिकारी और कर्मचारी छुट्टी पर भेज दिए गए हैं।सोचिए कभी भारत में ऐसा दृश्य उपस्थित हो तो क्या हो ? बारह साल पहले जब अमेरिका में 16 दिन का शटडाउन हुआ था तो कनाडा के साथ लगती 8891 किलोमीटर लंबी सीमा पर रक्षा के लिए सिर्फ़ एक व्यक्ति तैनात था।वह भी साफ़ -सफाई के लिए।
यह दिलचस्प है कि डोनाल्ड ट्रंप अपने देश की इस दुर्दशा से रत्ती भर परेशान नज़र नहीं आते। वे अपने ख़र्चों में कोई कटौती नहीं कर रहे हैं।अपने प्रतिपक्ष के साथ संवाद करने के बजाय वे अपनी प्रचार एजेंसियों को निर्देश दे रहे हैं कि डेमोक्रेट के खिलाफ प्रोपेगंडा जंग छेड़ दें और लोगों को बताएँ कि शट डाउन के लिए डेमोक्रेट ही ज़िम्मेदार हैं। वे भारत को धमकाने पर उतारू हैं ,रूस के राष्ट्रपति पुतिन के विरुद्ध आग उगलते हैं और चीन को टैरिफ की चेतावनी देते हैं। यह विचित्र है कि एक अधिनायक अपने देश की आवाज़ नहीं सुन रहा है और सारी दुनिया उस पर हंस रही है।


