व्यंग्य
डॉ. कीर्ति काले
दिल्ली से
पागलपन की हद तक किसी को चाहना क्या होता है ये हमसे पूछिए।जब से वो हमारी जिन्दगी में आया है कसम से दुनिया ही बदल गई है। सोते जागते, उठते बैठते, चारों ओर पगलाए से हम उसी को खोजते हैं। उससे पल भर की दूरी बर्दाश्त नहीं होती। उसकी कमी धड़कनों की गति बढ़ा देती है ।दिल बेचैन हो जाता है, साँसें तेज़ चलने लगती हैं।किसी को इस हद तक चाहना भी क्या ठीक है? लेकिन चाहते हैं तो चाहते हैं।
नज़र बदलते ही नज़ारा बदल जाता है।
जब तक उससे परिचय नहीं था तब तक दुनिया को देखने का नज़रिया अलग था लेकिन जब से उसके इश्क का पागलपन सवार हुआ है तब से हम उसकी आँखों से दुनिया देखते हैं।अब हमारी आँखें केवल आँखें नहीं रहीं ,सूक्ष्मदर्शी हो गई हैं।
उससे इश्क का सिलसिला आज से दस साल पहले अमेरिका में शुरू हुआ। वैसे तो उसके चर्चे यहाँ तक छन छनकर पहुँच रहे थे लेकिन अमेरिका में तो हर कोई उसका दीवाना दिखा। घरों में, सड़कों पर, ट्रैन में,बस में, रेस्टोरेंट्स में,स्कूल में कहाँ नहीं था वो।हर एक की जुबान पर बस उसी का नाम था।हम भी कैसे बच सकते थे।हम भी आ गए चपेट में। और ऐसे जबरदस्त चपेट में आए कि अपनी तो जिन्दगी की लाइफ ही चेंज हो गई। वैसे भी अमेरिका शब्द में ही ऐसी धाक है कि वो नैपकिन से नाक पोंछकर कोट की जेब में रख ले तो भी हम आदतन वाह वाह कर उठें।अब हम दुनिया को सूक्ष्मदर्शी नजरों से निहारते हैं।मर्ज बढता गया ज्यों ज्यों दवा की।
पहले ऐसा नहीं था। मार्किट जाएँ और गोल-गप्पे न खाएँ ऐसा कभी होता है क्या? पूरा मार्किट घूमकर भले ही कुछ खरीदें या न खरीदें पर गोलगप्पे खाने का प्रोग्राम तो हमेशा का फिक्स है।
कितने के खिलाते हो भैया?
दस के पाँच
अरे वा ये क्या बात हुई। पिछली बार तो छै खिलाए थे।
दोना हाथ में पकड़ते हुए हम गोलगप्पे वाले को ऐसी मीठी नज़र से देखते कि वो गोल-गप्पे गिनना ही भूल जाता। सूजी के गोलगप्पे में उबले आलू,छोले चटनी भरकर
मन ही मन मुस्कुराते हुए वो खट्टे तीखे चटपटे पानी में ऐसी मस्ती से हाथ डुबाता जैसे मणिहार किसी गोरी कलाई में धीरे-धीरे चूड़ियाँ चढ़ाता है।हम भी एक के बाद एक ऐसे चाव से चटखारे ले लेकर खाते रहते जैसे हमारे रसीले ओठों का स्पर्श लाभ देकर उन गोल-मटोल गोलगप्पों को कृतार्थ कर रहे हों। गोल-गप्पे वाला तीखे चटपटे पानी में अपना श्यामवर्णी हाथ डुबा डुबाकर एक लय में गोलगप्पे तैयार करके दोने में तब तक रखता जाता जब तक सिर हिलाकर इशारे से हम मना न कर देते। गोलगप्पेबाज ये जानते हैं कि गोलगप्पे खाने का असली मज़ा तो गोलगप्पों के बाद मांगकर अतिरिक्त चटपटा पानी पीने का है। लेकिन
अब ये सब कहाँ।
ऐसे ही ट्रैन के स्लीपर क्लास डिब्बे में टॉयलेट के पास बैठे चने वाले से प्याज टमाटर,हरी मिर्च मसाला डलवाकर चने के पत्ते भी खूब चाटे हैं। थोड़ी प्याज और डालो, मसाला तेज़ करो।नीबू तो ऐसे बचाए ले जा रहे हो भैया जैसे इसी के पैसों से घर का प्लास्टर करवा लोगे। भुजिया नेंक और डाल दोगे तो लुट नहीं जाओगे।तुम तो भैया किश्तों में सब चीज ऐसे डाल रहे हो जैसे बजट मंत्री शोर मचाने पे आधा आधा टुकड़ा और सरका देती है।ऐसी चटपटी नोंक-झोंक के साथ बिन्दास खाने का स्वाद आहा।चने के पत्ते के साथ उंगलियाँ भी चाट पोंछकर धुली धुलाई सी कर लेते।कहाँ का पेपर नेपकिन,कहाँ का सेनीटाइजर।ज्यादा ही सफाई का बुखार हो तो दुपट्टे की किनारी से ऐसी सफ़ाई से हाथ पोंछते कि कोई देख भी नहीं पाता।
लेकिन अब नहीं।
कवि सम्मेलन के बाद जब आयोजक लिफ़ाफा पकड़वाकर हाथ जोड़ लेता तब लौटते हुए रात में दो,तीन बजे हाई वे के किनारों पर बने टपरीनुमा ढ़ाबों के बाहर बिछी खरारी खाट पर बैठकर सैकड़ों बार जो तड़के वाली दाल में डुबोकर करारी तन्दूरी रोटी खाई है उसके तो क्या कहने। ढाबे का छोटू प्लास्टिक की बाल्टी में से स्टील के गिलासों में पानी भरकर अपनी उंगलियों की करामात से जिस स्टाइल में एक साथ छै छै गिलास उठाकर रखता उसके आगे तो अच्छे अच्छे हाथ की सफाई दिखाने वाले पानी भर जाएं।आज भी वो खुला आसमान,वो ठण्डी आवारा बिन्दास हवा ,वो खरारी खाट पर बिछा दस्तरखान,याद आता है। ये तब की बातें हैं।
लेकिन अब हम ऐसा नहीं कर सकते?कर ही नहीं सकते? कैसे कर सकते हैं?
जब से उसके इश्क की गिरफ्त में आए हैं तब से हमारी सूक्ष्मदर्शी नजरों को हर तरफ कीटाणुओं की झालरें लटकी हुई दिखाई देती हैं।वाईरस और बैक्टीरिया बिलबिलाते हुए नजर आते हैं।साँस लेते हुए डर लगता है।साँस खींचते हैं तो लगता है असंख्य बैक्टीरिया नासापुटों से होते हुए लंग्स में प्रवेश कर रहे हैं।अब तो शर्तिया संक्रमण होना ही है। खाने का कौर मुँह में लेने से पहले उसे सन्देहास्पद नजरों से घूरते हैं कि कहीं इसमें जीवाणु विषाणु तो नहीं। धुली हुई चादरें दुबारा धोते हैं,मांझे गए बर्तन दुबारा मांजते हैं। पोंछा लगने पर भी दिन में चार बार अतिरिक्त पोंछा मारते हैं।पोंछे लगे फर्श पर गलती से कभी नंगे पैर चल लें तो डेटॉल के पानी में सेंधा नमक डालकर तब तक पाँव धोते हैं जब तक वो ताजमहल न हो जाएँ।उबला हुआ पानी दुबारा उबालते हैं और तब तक उबालते हैं जब तक वो मोक्ष प्राप्त न कर ले। हाथ धोने के तो हम हाथ धोकर पीछे पड़ गए हैं।किसी से हाथ मिलाने से पहले हाथ धोते हैं ।किसी से हाथ मिलाकर हाथ धोते हैं।खाने के पहले, खाने के बाद, और खाने के बीच में हाथ धोते हैं। हाथ धोने से पहले हाथ धोते हैं,हाथ धोने के बाद हाथ धोते हैं।ये मुंआ तो हाथ धोकर ऐसे हमारे पीछे पड़ा है कि उसके सिवा अब कुछ भी नहीं सूझता। हमें पता है कि हम पगला गए हैं ।अब आप ही बताएं हम क्या करें?कहाँ जाएं?कैसे इस सूक्ष्मदर्शी पागलाए इश्क से पीछा छुड़ाएं?

लेखिका जानी मानी कवियत्री है

