हमारे साथ रहोगे तो ऐसे ही ऐश करोगे…

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बाखबर
राघवेंद्र सिंह

सियासत में जो चल रहा है उसे समझने की कोशिश में दो किस्से याद आ रहे हैं। चुनावी साल है इसलिए ये और भी जरूरी है। एक किस्सा फिल्मी है और दूसरा राजनीति की सच्चाई से बहुत निकट। पाठक माईबाप अपने हिसाब से उसे समझें और आनंद लें। वैसे मध्यप्रदेश सरकार ने आम लोगों की खुशी के वास्ते आनंद महकमा भी इजाद कर रखा है। हालांकि उसका अभी पता नहीं है कि वो कितना कामयाब हो रहा है या नहीं। लेकिन हम जिन दो किस्सों का आपसे जिक्र कर रहे हैं उम्मीद है आपको आनंदरस में वे भिगोएंगे और राजनीतिक जालों को भी थोड़ा साफ करेंगे।

फिल्म का एक सीन है, जिसे पुराने जमाने के लोग पढ़कर याद कर पाएंगे। फिलहाल फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा है इसलिए पाठकों से माफी के साथ इसका जिक्र कर रहे हैं। असल में हीरो कार को लेकर सड़क पर खड़ा है । इसे आज के जमाने में लीडर भी मान सकते हैं और वो भी सत्ता दल का। वो अपने साथी को कार में बैठने का आग्रह करता है लेकिन गाड़ी के स्टार्ट नहीं होने पर उससे धक्का लगाने के लिए कहते हैं। कुछ किलोमीटर धकियाने के बाद (5 साल) भी जब स्टार्ट नहीं होती है तब हीरो कार का वॉनिट खोलता है, फिर कॉबोर्रेटर पर पेट्रोल सप्लाई करने वाले पाइप में फंसाई गई मूंगफली को निकालते हैं। इसके बाद उसे छीलकर एक दाना खुद खाते हैं और दूसरा धक्का लगाने वाले कार्यकर्ता को खिलाते हुए कहते हैं, हमारे साथ रहोगे तो ऐसे ही ऐश करोगे।

सियासत, सत्ता और सरकार की स्टेयरिंग संभालने वाले राजनेता ऐसे ही कुछ करते नजर आ रहे हैं जिनमें अब मंत्री, विधायक, सांसद, संगठन के पदाधिकारी और कार्यकर्ता भी शामिल हैं, जो सियासत की कार में बैठाए तो जाते हैं लेकिन आराम से मंजिल तक पहुंचने के लिए नहीं बल्कि पार्टी को धक्का लगाकर सत्ता तक पहुंचाने के लिए। बदले में उन्हें मिलती पॉवर सप्लाई के पाइप में फंसी बेलगाम कहलाने वाले अफसरों की मूंगफली जिन्हें सत्ताधारी चुनावी साल में अपने कार्यकतार्ओं को खुश करने के लिए निकाल देते हैं। फिर कार्यकतार्ओं से कहा जाता है कि हमें और पार्टी को जिताते रहो, सत्ता है तो सब है, नहीं तो न कार है और न उसे धकाने का मौका। 2018 के अंत में विधानसभा चुनाव और 2019 मई तक लोकसभा के चुनाव होना है। सो थके-हारे, नाराज, गुटीय, उपेक्षित और बागी तैवर अपनाने वाले कार्यकतार्ओं को राजनीतिक दल मूंगफली खिलाकर मौज करवाने में जुटे हैं।

अब दूसरा किस्सा है, मध्यप्रदेश में कैबिनेट की बैठक के बाद मंत्री और मुख्यमंत्री के बीच हो रही एक ज्ञानवर्धक चर्चा का। इसमें मुद्दा था, कर्मचारी, मजदूरों और किसानों के संबंध में बड़े फैसले करने से आने वाले आर्थिक बोझ से जुड़ा। मंत्रियों का कहना था कि कर्ज में डूबा प्रदेश आखिर ये सब कैसा करेगा। इस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक किस्सा सुनाया। उन्होंने कहा कि एक राज्य में दुर्भिक्ष पड़ा। लोग भूख-प्यास से परेशान होकर पलायन करने लगे। साधु-महात्माओं को भिक्षा मिलनी भी बंद हो गई। त्राहि-त्राहि मच गई और लोग मरने भी लगे। साधु-संन्यासी और ऋिष-मुनि भी परेशान हो गए। ऐसे में ऋषि-मुनियों को एक मरा हुआ कुत्ता मिलता है। भूख-प्यास से मौत के मुंह में जा रहे मुनिगण उसका मांस भक्षण करने लगते हैं।

इतने में एक चांडाल आता है। वो कहता है, घोर पापम। इससे तो अधोगति को प्राप्त होगे। मुनिवर ये आम क्या कर रहे हैं इस पर मुनि कहते हैं, हम अपनी तपस्या और ज्ञान से लोगों का जीवन प्रकाशित करते हैं। अगर हम भूख-प्यास से मर गए तो हमारे ज्ञान और तपस्या का क्या होगा देह नहीं, तो फिर क्या अगर हम बचे तो इस पाप का भी प्रायश्चित कर लेंगे। इसी तरह घोषणाओं से भारी धन खर्च करने और कर्ज में डूबे राज्य में फिर से सत्ता प्राप्त करने में सफल हो गए तो कर्ज उतारने का रास्ता भी खोज लेंगे।

लेकिन सत्ता में नहीं आए तो फिर इस बचत का या इस धर्म का क्या मतलब रह जाएगा अर्थात पहले सत्ता हासिल करें और इसके लिए जो घोषणाएं और जो भी उपाय करने हों वो सब किए जाएं, चाहे इसमें कितना ही धन और श्रम ही क्यों न लगाना पड़े। मुख्यमंत्री से इस कथा को सुनने के लिए प्रश्नकतार्ओं की जिज्ञासा शांत हो गई। अब जनआशीर्वाद यात्रा और करोड़ों-अरबों की लोकलुभावन घोषणाओं के पीछे के मर्म को समझा जा सकता है। क्योंकि सत्ता है तो सब है। ऋषि-मुनियों की मानें तो जीवन है तो तपस्या है और ज्ञान है…

जनआशीर्वाद पर कितना खर्च
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनावी साल में अपने काम-काज का लेखा-जोखा लेकर जनता से आशीर्वाद लेने के लिए जाते हैं। 15 जुलाई को उज्जैन से शुरू हुई जनाआशीर्वाद यात्रा 25 सितंबर को संपन्न हो जाएगी। इस यात्रा में बड़ा सवाल शुरू होने से पहले से लेकर उसके समापन तक इस पर आ रहे खर्च से जुड़ा रहेगा। हालांकि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह ने कहा है कि संगठन सारा खर्च वहन कर रहा है। लेकिन उज्जैन की सभा में उपयोग की गई बसों और संसाधनों का बिल किसके खाते में जाएगा, इसका अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। गौरतलब है कि इस मौके पर राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी मौजूद थे। खबर ये है कि नीमच, मंदसौर तरफ से आने वाले बसें ज्यादातर खाली आईं। इसे राजस्थान सीमा से लगे मालवा क्षेत्र में भाजपा के प्रति आक्रोश के रूप में देखा जा रहा है।

कांग्रेस बनाएगी उम्मीदवार घोषित करने का रिकॉर्ड
हार से डरी हुई कांग्रेस अबकी बार 30 अगस्त तक लगभग 70 प्रत्याशियों की सूची घोषित करने वाली है। हालांकि प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ से लेकर नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के इस ऐलान पर कोई भरोसा नहीं कर पा रहा है। अक्सर कांग्रेस में नामांकन वापसी के आखिर दिन तक प्रत्याशी चयन का सिलसिला चलता रहता था। कहा जा रहा है कि पहले उम्मीदवार तय करने से उसे नाराज पार्टी नेताओं और कार्यकतार्ओं को मनाने का अवसर मिलेगा और उधर सबको साथ लेकर प्रचार के लिए भी वक्त निकाल पाएगा। हालांकि एक संकट भी है। अगर जल्दी उम्मीदवार तय हो गए तो भाजपा, कांग्रेस के मजबूत उम्मीदवारों का काट भी खोज लेगी। कांग्रेस इसे लेकर ज्यादा चिंतित नहीं है क्योंकि उसका मानना है कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं। इसलिए जल्दी उम्मीदवारी पार्टी को लाभकारी ही रहेगी।

(लेखक IND24 समूह के प्रबंध संपादक हैं)