बात दिल की, शशी कुमार केसवानी
आईये आज हम बात करते है एक ऐसी शख्सियत की जो अपने रोल में इतना रम गए थे कि उन्हें अक्सर एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन व बाजार में भी पुलिस इंस्पेक्टर या पुलिस कमिश्नर मान लिया जाता था। वाकई किसी भी कलाकार के लिए इस तरह से लोगों को सच में उन्हें मान लेना ये एक कलाकार के लिए बड़ी उपलब्धि है। जी हां मैं बात कर रहा हूं सैय्यदना इफ़्तेखार अहमद शरीफ की। यहां उनका असली नाम है पर
आमतौर पर फिल्मों में लोग उन्हें इफ़्तेखार के नाम से जानते है। ये वह दौर था जहां मदद करने वाले बहुत होते थे ऐसे ही मददगार अशोक कुमार ने अपने छोटे भाई अनूप कुमार को एक फिल्म मुकद्दर से हटाकर इफ़्तेखार को काम दिया अनूपकुमार के नाराज होेने पर अशोक कुमार ने कहा अभी इफ़्तेखार को ज्यादा जरूरत है। वो दौर कुछ अलग ही था आज का दौर जो है बदल चुका है। इस पर बात फिर कभी करेंगे लेकिन कमाल की बात देखिए पुलिस की वर्दी उनसे ऐसी चिपकी फिर निकल न सकी क्योंकि अपने अभिनय से उसमें इस तरह से जान फूंक देते थे कि कई बार यह लगता था कि पुलिस अफसर ऐसा ही होना चाहिए। हमारा तो बचपन और जवानी इफ़्तेखार साहब की अफसरी देखते-देखते गुजर गई लेकिन आज की फिल्मी दुनिया ऐसे शख्सियतों को भूलती जा रही है। जो बहुत ही दुखद है पर मैं अपनी तरफ से हरसंभव कोशिश करता हूं कि उनकी याद बनी रहे। तो आइए इफ़्तेखार साहब से जुड़े जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं पर बात दिल की करते हैं।
फिल्मों में आपने ये दमदार डायलॉग तो जरूर सुना होगा…भागने की कोशिश मत करना…हमने तुम्हें चारों तरफ से घेर लिया है…भलाई इसी में है कि तुम अपने आप को कानून के हवाले कर दो…कुछ याद आया…जी हां..हिंदी फिल्मों में लगभग हर पुलिसवाले की जुबान से ये सुनने को मिल ही जाता था…इस डायलॉग को सुनकर एक जो तस्वीर सामने उभरकर आती है वो इफ़्तेखार साहब है…सिने प्रेमी अभिनेता इफ़्तेखार को पुराने जमाने की फिल्मों में पुलिसवाले की अनगिनत भूमिकाओं के लिए बखूबी जानते हैं…लेकिन क्या आप जानते हैं कि इफ़्तेखार एक अच्छे कलाकार होने के साथ-साथ अच्छे गायक और पेंटर भी थे…हम आज इन्हीं की जिंदगी के बारे में बात करेंगे कि कैसे वो एक अच्छी खासी नौकरी छोड़कर मनोरंजन की दुनिया में आगे बढ़े।

इफ़्तेखार के कई करीबी रिश्तेदार माता-पिता और भाई-बहन विभाजन के दौरान पाकिस्तान चले गए। पर इफ़्तेखार ने भारत में रहने का निर्णय किया, लेकिन आजादी के बाद हुए दंगों से उन्हें कोलकाता छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। अपनी पत्नी और बेटियों के साथ, वह बॉम्बे में चले गए। इ्िरफ्तखार का कलकत्ता में अपने समय के दौरान अभिनेता अशोक कुमार से परिचय हुआ था और उन्होंने बॉम्बे टॉकीज की फिल्म मुकद्दर (1950) में एक भूमिका प्राप्त करते हुए बॉम्बे में उनसे संपर्क किया था। इफ़्तेखार ने करियर में 400 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, जो 1940 के दशक से 1990 के दशक तक चली। 1960 और 1970 के दशक के बॉलीवुड ब्रह्मांड को आबाद करने वाले कई पुराने चरित्र अभिनेताओं की तरह, इफ़्तेखार 1940 और 1950 के दशक में बॉलीवुड के “स्वर्ण युग” के दौरान अपने युवावस्था में एक प्रमुख अभिनेता थे। उनकी भूमिकाएं पिता, चाचा, महान-चाचा, दादा, पुलिस अधिकारी, पुलिस कमिश्नर, कोर्ट रूम जज और डॉक्टर आदि की थीं। उन्होंने बंदिनी, सावन भादों, खेल खिलाड़ी में और एजेंट विनोद में आमतौर पर उन्होंने “सहानुभूतिपूर्ण” किरदार निभाए थे, लेकिन ऐन मौके पर उन्होंने भारी भूमिका निभाई। भारी के रूप में उनकी सबसे यादगार भूमिकाओं में से एक अमिताभ बच्चन का भ्रष्ट उद्योगपति में यश चोपड़ा का क्लासिक देवर (1975) था। इफ़्तेखार की एक अन्य भूमिका पुलिस निरीक्षक के रूप में प्रकाश मेहरा की जंजीर थी। यह एक छोटा सा हिस्सा था, लेकिन इफ़्तेखार ने निकट-हिस्टेरिक अमिताभ बच्चन को कानून को अपने हाथों में लेने के लिए फटकार लगाई, जो अविश्वसनीय रूप से शक्तिशाली है। पुलिस अधिकारी के रूप में एक और महत्वपूर्ण भूमिका 1978 की हिट फिल्म डॉन में उनके द्वारा निभाई गई थी। डॉन की भूमिका लोग आज भी याद करते है। मुॐक्के आज भी याद है कई लोग कई पुलिस अफसर इफ़्तेखार की तरह अपने आॅफिस में चाय पीते थे और अपने सबआर्डिनेट अफसरों से उसी अंदाज में बोला करते थे। उन दिनों में एक दिल्ली के अखबार के लिए रिपोर्टिंग करता था तो कई पुलिस अफसरों के आॅफिस में जाया करता था जब उनसे बात करता था तो उनका अंदाज इफ़्तेखार जैसा महसूस होता था और बाहर निकलकर हंसी भी आती थी और अच्छा भी लगता था। एक कलाकार की कला में इतना दम तो है जो असली पुलिस अफसर को भी अपनी कापी करने पर मजबूर कर दिया। तकनीकी दिक्कतों से इफ़्तेखार लिखा हुआ
कुछ प्रमुख भूमिकाएँ
उनकी कुछ प्रमुख भूमिकाएँ राजेश खन्ना की फिल्मों में आईं जैसे जोरू का गुलाम, महबूब की मेहंदी, ट्रेन, खामोशी / 76, सफर , राजा रानी, इत्तेफाक, राजपूत और आवाम के अलावा देवर और जंजीर, 1960, 1970, 1980 के दशक की बॉलीवुड सिनेमा की कई क्लास्कि में चरित्र भूमिकाएं थीं: बिमल रॉय की बंदिनी, राज कपूर की संगम, मनोज कुमार की शहीद , तीसरी मंजिÞल, तीसरी कसम, जॉनी मेरा नाम, हरे रामा हरे कृष्णा, डॉन, द गैम्बलर (1971 फिल्म) और शोले, लेकिन कुछ नाम हिंदी फिल्मों के अलावा, वह 1967 में अमेरिकी टीवी श्रृंखला माया के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा की फिल्मों बॉम्बे टॉकी के दो एपिसोड में दिखाई दिए।
दूसरी शादी यहूदी लडक़ी से की, दिल की गइराइयों में बसा था संगीत
उनकी पहली पत्नी का नाम सहीदा था। जब इफ़्तेखार जब घर से जाने के बाद कलकत्ता गए तो उसी बिल्डिंग में बहुत ही खूबसूरत यहूदी लड़की हिना जोसफ रहती थी। जिससे उन्हें प्यार हो गया और हिना को भी इफ़्तेखार से प्यार हो गया। शादी से पहले अपनी पुरानी पत्नी सहीदा से उन्होंने सारे रिश्ते तोड़ दिए। हिना ने अपना धर्म बदलकर इस्लाम कबूल लिया। बाद में उनका नाम रिहाना अहमद हुआ। उनकी दो बेटियां थी। एक सलमा और सहीदा। दुर्भाग्य से सहीदा को कैंसर हो गया था। जिसका दुख इफ़्तेखार भी बर्दाश्त न कर सके। उनकी तबीयत बराबर खराब होती चली गई इसी दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा जिसके बाद वे एक माह भी नहीं गुजार पाए और उनका इंतकाल हो गया। उनकी दूसरी बेटी सहीदा बेहद ही खूबसूरत है जो पाकिस्तान की कई फिल्मों में काम कर चुकी है वो अब अपने पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान में ही रहती है। इफ़्तेखार हमेशा कहते थे कि अशोककुमार ने मुझे इस ऊंचाई तक पहुंचाया वरना मैं एक सूखे पत्ते की तरह हवा में ही उड़ता रहता। मेरा कोई मुकाम नहीं बन पाता। अशोककुमार ने पहला काम तो लेकर ही किया लेकिन बाद में भी लगातार मेरे लिए कई निर्माताओं को काम के लिए बोलते रहते थे। उन्हीें के कहने पर मैंने कई पुलिस इंस्पेक्टर, कमिश्नर से हटकर रोल भी किए।
इफ़्तेखार एक बहुत अच्छे पेंटर थे उन्होंने लखनऊ आॅर्ट आॅफ कॉलेज से पेंटिंग में डिप्लोमा किया। उन्हें पेंटिंग और संगीत का बहुत शौक था पेटिंग का शौक तो उनका कॉलेज में पेंटिंग करते-करते ही पूरा हो गया था। हालांकि जब भी समय मिलता पेटिंग वो जरूर किया करते थे। अपने कई चाहने वाले को तो उन्हें कई बार पेंटिंग बनाकर गिफ्ट भी की। पेटिंग में हाथ इतना सधा हुआ था कि उन्हें कोई भी पेटिंग बनाने में लंबा समय नहीं लगता था पर उनका रूझान एक्टिंग और संगीत में रहा। संगीत से भी साथ छूटता चला गया जो सीमित एक्टिंग में रह गया।
संगीत का शौक : इफ़्तेखार सन 1944 में जब कोलकाता पहुंचे तो एचएमवी में म्यूजिÞक कम्पोजर कमल दासगुप्ता से मुलाकात हुई। कमलदास गुप्ता उनकी आवाज सुनकर उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें काम भी दे दिया। एक प्राइवेट एलबम निकाला जिसमें दो गाने थे जो खूब चला। इफ़्तेखार केएल सहगल साहब के बड़े मुरीद थे। और गायकी भी उसी अंदाज में करते थे। ऊपर से आवाज भी उन जैसी ही लगती थी। इसी कारण से लोगों के दिलों मे ंउनकी आवाज में घर कर लिया पर केवल गायकी से जिंदगी गुजारना मुश्किल था उसी दौरान हिंदुस्तान-पाक का बंटवारा होने के बाद कमलदास गुप्ता मुंबई शिफ्ट हो गए और उन्होंने इफ़्तेखार को मुंबई आने की सलाह दी और इफ़्तेखार मुंबई आ गए। लेकिन इनके दिल के अंदर संगीत जो बसा था वो उनकी ख्वाहिश अधूरी सी रही। इसकी भरपाई वे संगीत सुनकर कर लेते थे। कई बार अक्सर अपने घर पर गाकर अपना शौक पूरा कर लेते थे। या दोस्तों की महफिल में गाना सुनाकर सबका दिल जीत लेते थे। गायकी का अंदाज इतना सधा हुआ था मानो लगता था कि सहगल साहब के हाथ के नीचे से निकला हुआ गायक है।


