2013 में यूपीए ने अर्बन नक्सलियों से बताया था बड़ा खबरा, अब कर रही है विरोध

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नई दिल्ली। नक्सल लिंक को लेकर ऐक्टिविस्टों की गिरफ्तारी पर भले ही राहुल गांधी समेत तमाम विपक्षी दलों ने सरकार को घेरा है, लेकिन 2013 में यूपीए सरकार की ही राय मौजूदा कांग्रेस से उलट थी। तब यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनाया दायर कर कहा था कि शहरी केंद्रों में अकादमिक जगत से जुड़े कुछ लोग और ऐक्टिविस्ट ह्यूमन राइट्स की आड़ में ऐसे संगठनों को संचालित कर रहे हैं, जिनका लिंक माओवादियों से है। यही नहीं यूपीए सरकार ने इन लोगों को जंगलों में सक्रिय माओवादी संगठन पीपल्स लिबरेशन गरिल्ला आर्मी से भी खतरनाक बताया था।
In 2013, the UPA had told the Naxalites, the big news, is now protesting
यूपीए सरकार ने अपने ऐफिडेविट में कहा था कि ये अर्बन नक्सल बड़ा खतरा हैं और सीपीआई माओवादी से जुड़े हैं। यही नहीं सरकार ने कहा था कि कई मायनों में ये काडर गुरिल्ला आर्मी से भी अधिक खतरनाक हैं। बता दें कि पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी सीपीआई माओवादी की ही एक सशस्त्र विंग है। 2001 से लेकर अब तक माओवादियों ने 5,969 नागरिकों का कत्ल किया है, 2,147 सुरक्षार्मियों की हत्याएं की हैं और पुलिस एवं केंद्रीय अर्धसैनिक बलों से 3,567 हथियारों की लूट को अंजाम दिया है।

उस दौरान सुशील कुमार शिंदे के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय ने यह भी कहा था कि यदि इन लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाती है तो इससे सरकार की नकारात्मक छवि बनेगी। इसकी वजह यह है कि इन अकादमिशियनों और ऐक्टिविस्ट्स की प्रॉपेगेंडा मशीनरी खासी प्रभावशाली है। यदि इनके खिलाफ कोई ऐक्शन लिया जाता है तो एजेंसियों के खिलाफ नकारात्मक प्रचार को बल मिलेगा।

‘किशोर समरीत बनाम भारत सरकार एवं अन्य’ के मामले में सरकार ने विस्तार से यह बताया था कि कैसे ऐक्टिविस्ट्स का संपर्क माओवादियों से है और किस तरह से अपनी अलग पहचान रखते हुए भी इन लोगों की ओर से उन्हें मदद की जाती है।