कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

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TIO पुस्तक समीक्षा

मीर तक़ी मीर की ग़ज़लों पर केंद्रित शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के शाहकार ‘शेर-ए शोरअंगेज़’ का हिंदी अनुवाद। जिसे पढ़ते हुए यह अहसास होता है कि शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने चार जिल्दों में ‘शेर-ए शोरअंगेज़’ लिखते हुए बीसवीं सदी के आख़िरी दशक में कितना बड़ा कारनामा अंजाम दिया था। दस वर्षों में मुकम्मल हुई यह किताब सचमुच भारतीय साहित्य की एक धरोहर है। एक किताब जो मीर के हवाले से कविता की बारीकियों, उसकी बुनावट के साथ-साथ हिंदुस्तान में शेरो-शायरी की रिवायत से हमें रूबरू कराती है।

यह किताब लिखने की ज़रूरत क्यों महसूस हुई इसके बाबत फ़ारूक़ी ने लिखा है कि वे मीर की ग़ज़लों का ऐसा स्तरीय प्रतिनिधि संकलन तैयार करना चाहते हैं जो दुनिया की बेहतरीन शायरी के सामने बेझिझक रखा जा सके। इस किताब में वे उर्दू के क्लासिकी ग़ज़लकारों ख़ासतौर से मीर के हवाले से क्लासिकी ग़ज़ल की काव्यकला की पुनर्व्याख्या करते हैं। प्राच्य और पाश्चात्य काव्यकला के सिद्धांतों को ज़ेहन में रखते हुए वे मीर के शेरों की समीक्षा, व्याख्या करते हैं। क्लासिकी उर्दू ग़ज़ल, फ़ारसी ग़ज़ल (ख़ास तौर से भारतीय शैली की फ़ारसी ग़ज़ल) के परिप्रेक्ष्य में मीर की हैसियत और उनकी जगह तय करते हैं। मीर की भाषागत विशेषताओं की पड़ताल करते हैं।

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी पाश्चात्य चिन्तन का प्रभाव तो स्वीकार करते हैं, लेकिन उससे कहीं भी आतंकित होते नज़र नहीं आते। बक़ौल फ़ारूक़ी ‘मैं अपने प्राच्य काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों को पहले जानता हूँ। यानी अपने क्लासिकी साहित्य में अच्छाई-बुराई का निर्धारण करने के लिए प्राच्य काव्यशास्त्र का मतावलम्बन पहले करता हूँ।’ मानीआफ्रीनी (अर्थ-सौन्दर्य) और मज़्मूनआफ्रीनी (विषय-सौन्दर्य) को वे भारतीय काव्यशास्त्र की बुनियाद मानते हैं। और इसी बुनियादी कसौटी के आधार पर वे मीर की शायरी को परखते हैं।

इंतिज़ार हुसैन ने मीर की शायरी की दुनिया की तुलना किसी बड़े उपन्यास की दुनिया से की थी। उनसे सहमत होते हुए फ़ारूक़ी लिखते हैं कि सचमुच मीर की दुनिया अपनी व्यापकता, घटनाओं-परिघटनाओं की अधिकता, ग़ज़ल के पारम्परिक चरित्रों-किरदारों को वाक़िआती सतह पर बरतने की विशेषताएँ और आम ज़िन्दगी के मामलों पर विचार-विमर्श के कारण किसी बड़े उपन्यासकार की दुनिया मालूम होती है।

किताब के शुरुआती अध्यायों में फ़ारूक़ी साहब ने मिर्ज़ा ग़ालिब पर मीर की शायरी के प्रभाव की बड़े विस्तार से चर्चा की है। उनके मुताबिक़ ‘ग़ालिब मीर से दिल खोकर लाभान्वित हुए और ग़ालिब का मीर से लाभान्वित होना अनुकरणात्मक नहीं बल्कि सृजनात्मक है।’

इसी क्रम में मीर द्वारा रोज़मर्रा की ज़बान को शायरी की ज़बान बना देने के कारनामे का ज़िक्र करते हैं। और लिखते हैं कि इस काम में जितनी कामयाबी मीर को मिली वह मीर के अलावा और किसी शायर से संभव न हुई। शायरी में मीर के इस कमाल के बाबत मुहम्मद हसन असकरी ने ठीक ही लिखा था कि ‘ये शख़्स (यानी मीर) जब खुद को ‘मीर जी’ या ‘मीर साहब’ कहता है तो इस मामूली से लफ़्ज़ में ख़ुदा जाने कितनी बिजलियाँ भर देता है।’

इस किताब का एक बड़ा हिस्सा तो मीर की ग़ज़लों के संकलन और बेहद बारीकी से उनकी पड़ताल पर केंद्रित है। जहाँ मीर के काव्य-संसार की बनावट और उसके विस्तार, भारतीय और फ़ारसी परम्परा से उसके गहरे जुड़ाव को शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी पाठकों के सामने लाते हैं। मीर के शेरों में मिलने वाली अर्थबहुलता, उनकी पेचदारी और अर्थ की विभिन्न सम्भावनाएँ होने यानी शेर के तहदार होने की चर्चा वे करते हैं।

हिंदी में इस किताब को संभव बनाने के लिए प्रो. कृष्णमोहन और इसके अनुवादकों सुरेंद्र राही और दीपक रूहानी का शुक्रिय! यह किताब भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित है।