कांग्रेसियों के हमले से लहूलुहान कमलनाथ…

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 राघवेनदर

मध्यप्रदेश में राजनीतिक माहौल बहुत अजीबोगरीब हो चला है। ना तो कांग्रेस सुकून में है और ना भाजपा चेन से है। मुख्यमंत्री कमलनाथ को ही देख लें। भाजपा से ज्यादा अपनों से परेशान हैं। इतने भाजपाई नहीं कर रहे हैं उससे ज्यादा तो कांग्रेसियों के हमलों से लहूलुहान हैं। इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा।

कैबिनेट की बैठक में एक मंत्री द्वारा सीधा कमलनाथ पर हमला ऐसा पहली बार हुआ बचाव में कमलनाथ समर्थक मंत्री आए और बाद में मामला रफा-दफा हो गया लेकिन इसके बाद पिछले कुछ दिनों की हम चर्चा करें तो इमरती देवी से लेकर बैरिस्टर विवेक तंखा तक ने कमलनाथ सरकार के बारे में जो कुछ कहा वह अच्छा शगुन नहीं है। विवेक तंखा सोशल मीडिया में कहते हैं, मध्यप्रदेश में अवैध रेत खनन में 70 फ़ीसदी कांग्रेसी शामिल हैं।

इसके बाद लगे लगाए वरिष्ठ मंत्री डॉक्टर गोविंद सिंह का बयान बहुत चौकाने वाला है। राजनीति में डॉक्टर गोविंद सिंह एक दबंग लीडर के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा, अवैध खनन के मामले में हम असफल हो गए हैं और ऐसा कहकर उन्होंने जनता से माफी मांगी, साथ ही वह यह भी कहते हैं कि इन मुद्दों को मैं कैबिनेट की बैठक में कमलनाथ के सामने उठाऊंगा।  मंत्री इमरती देवी ने जलेबी टाइप की बात की है। उन्होंने कहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को मध्यप्रदेश में कोई जवाबदारी देनी चाहिए।

महाराज को महाराष्ट्र में कौन जानता है। हम सिंधिया जी को महाराष्ट्र की जिम्मेदारी देने से संतुष्ट नहीं हैं। उनकी यह बात जलेबी की तरह कांग्रेस के लिए कड़क है तो चशनी की तरह िसंधिया गुट के लिए मीठी भी है। इसी तरह मंत्री बनने की कतार में लगे केपी सिंह ने कहा है िक ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार बताती है कि कांग्रेस का जनाधार घट रहा है। यह आधार तब घटा है जब प्रदेश में कमलनाथ की सरकार है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेठी में राहुल गांधी की हार भी बताती है कि पार्टी का जनाधार कम हो रहा है। रेत खनन के मामले में शिवराज सरकार से ज्यादा कमलनाथ की सरकार बदनाम हो गई है।

अबे तेरी तो हम के मामले में नर्मदा जी से लेकर बेतवा और चंबल तक इस कदर रेत के डंपर अवैध धुलाई कर रहे हैं कि बारिश में सड़कें जवाब देंगी और हालत यह है कि जो जमीनी कांग्रेसी हैं वह पहले भी अवैध खनन को देखते रहते थे और आज भी उनकी इसमें कोई हिस्सेदारी नहीं है, बल्कि जो माफिया शिवराज सरकार में था अब वह दुगनी ताकत से काम कर रहा है। खबरें तो यहां तक हैं कि रेत खनन के मामले में सरकार के मंत्री शामिल हैं। इसमें प्रभारी मंत्रियों की भी हिस्सेदारी की खबरें आ रही हैं। कमलनाथ की नई-नई सरकार जो बनी थी रायसेन व होशंगाबाद जिले के एक विधायक यह कहते-कहते थक गए थे कि अवैध खनन तवा और नर्मदा जी से पहले से ज्यादा है। इसे रोका जाए।

जब उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई और लोगों ने इस मुद्दे पर पागल करार करने लगे तब पता यह भी चला है कि इस धंधे में अब उनके परिवार के लोग भी शामिल हो गए हैं। इस तरह के गंभीर मुद्दों पर सरकार के भीतर ही जूतम पैजार की नौबत आ रही है। रेत माफिया जूतों में दाल की करें अधिकारी और नेताओं को पैसे बांट रहे हैं। कई लोग कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं। जिलों में प्रभारी मंत्री और संगठन के लोगों में खटपट अब सड़क पर आने लगी है।

राजनीति के लिहाज से सीहोर सबसे संवेदनशील जिला है। वजह पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह इसी जिले से आते हैं और यहां कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेताओं की सबसे ज्यादा फजीहत है। प्रभारी मंत्री संगठन की भी सुन रहे हैं और संगठन प्रभारी मंत्री को कोसने में लगे हैं। अब इसका दूसरा पक्ष भी सुन लीजिए। चंबल क्षेत्र में एक प्रभारी मंत्री पुलिस अधीक्षक से परेशान हैं। उन्होंने यहां तक कह डाला है कि अगर एसपी को नहीं हटाया गया तो वो अपने प्रभार के जिले का दौरा नहीं करेंगे। एक तरफ प्रभारी मंत्री से कार्यकर्ता परेशान दूसरी तरफ प्रभारी मंत्री अफसरों से परेशान और उसमें कोई किसी की सुनने वाला नहीं है। कमलनाथ सरकार में राजनैतिक और प्रशासनिक अराजकता के ढेरों किस्से हैं।

मिसाल के तौर पर प्रदेश कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष का किस्सा पूरी हकीकत बयां करता है। दरअसल एक सिपाही के तबादले का मामला था। माननीय नेता जी ने सब जगह चिट्ठी लिखी लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। बाद में एक पत्रकार साथी की मदद से वो तबादला हो पाया। अब इस घटना से क्या अर्थ निकाले जाएं। सियासत के अब दूसरे सीन की तरफ आते हैं। 8 महीने पहले शिवराज सिंह की सरकार थी और उनसे मिलना बहुत आसान था। कांग्रेस सरकार में हालत यह है कि कार्यकर्ता तो छोड़िए मंत्रियों का सीएम से मिलना भी मुश्किल होता है इसलिए अब कार्यकर्ता से लेकर आम जनता हर दिन भाजपा सरकार की तुलना कमलनाथ सरकार से करती है। मैदानी हकीकत यह है कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की अब जनता में हंसी उड़ने लगी है।

कार्यकर्ता तो क्या पदाधिकारियों की भी अधिकारी सुनते नहीं हैं और जो दुर्गति भाजपा शासन में कांग्रेसियों की थी अब पहले से ज्यादा उनका उपहास और रहा है लेकिन यह भी ना कोई सुनने वाला है और ना कोई देखने वाला ग्राउंड जीरो पर कांग्रेसजनों की हालत अच्छी नहीं है। यदि अभी कोई चुनाव हो जाएं चाहे मंडी कमेटी के या नगरीय निकायों के कांग्रेस के नतीजे बहुत कमजोर आने के संकेत हैं।

भाजपा पर यम का साया…
भाजपा में प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेताओं पर लगता है यम का साया पड़ा हुआ है। पिछले दिनों दिल्ली के दो पूर्व मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना और सुषमा स्वराज के बाद मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन हो गया था।

अभी पार्टी इन नेताओं के सदमे से उबरी भी नहीं थी कि एक और बड़े नेता अरुण जेटली का निधन हो गया। इस पूरे मामले में कह सकते हैं कि सुषमा स्वराज और जेटली भाजपा का भविष्य थे लेकिन बीमारियों ने उन्हें ऐसा घेरा कि वो असमय ही दुनिया से कूच कर गए। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्रियों में दिल्ली की कांग्रेस नेता शीला दीक्षित भी हैं।

उनका अचानक देहावसान भारतीय राजनीति के लिए सदमे वाली खबर है। वैसे तो पूर्व केंद्रीय मंत्रियों में कांग्रेस के माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट और भाजपा के प्रमोद महाजन इनका भी असामयिक निधन हुआ था और तब भी देश ने माना था कि यह किसी पार्टी की नहीं, बल्कि राष्ट्र की क्षति है। कांग्रेस के लीडर हंसी-मजाक में कहते हैं, भाजपा पर यम और कांग्रेस पर कमलनाथ का साया… दोनों भारी पड़ रहे हैं।

लेखक IND24 के प्रबंध संपादक हैं