राघवेंद्र सिंह
सबसे ज्यादा संकट में भारतीय सेवा के अधिकारी नजर आए। पद-प्रतिष्ठा के साथ रंगरैलियां मनाते रंगीन मिजाज अफसरों की आबरू खतरे में पड़ने लगी। बेशक जीतू के सैकड़ों गोरखधंधे चल रहे हैं, मगर हनीट्रैप का जो सच उसके अखबार ने दिखाया वो प्रदेश और देश के स्वनाम धन्य समाचार समूह दिखाने का साहस नहीं कर पाए। धंधा तो सोनी गैंग भी कर रही थी, बावजूद इसके उसने शीर्ष अफसरों के खिलाफ खबर छापने का मोर्चा खोला। कह सकते हैं कि सौ गलत काम में उसका कुछ नहीं बिगड़ा और एक सच दिखाने पर वो नेस्तनाबूद हो गया। इस दरमियान जो कुछ घटित हो रहा है वो मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनकी सरकार के स्वभाव के खिलाफ जा रहा है।
यही कारण है कि कमलनाथ ने भाजपा की सुगठित छवि और सक्रिय टीम जिसके लीडर शिवराज सिंह चौहान जैसे मुखर नेता थे, उनको विधानसभा चुनाव में मात दी और कांग्रेस की सरकार बनाई। सरकार के गठन में भी उन्होेंने सभी गुटों के नेताओं को कैबिनेट मंत्री बनाकर इतिहास रच दिया। इसके बाद प्रशासनिक नियुक्तियों में भी उन्होंने दिग्विजय सिंह समेत साथियों की सलाह को वरीयता दी। ऐसा लगा कि प्रदेश में कमलनाथ सब कुछ ठीक-ठाक कर देंगे। इसी बीच तबादलों में सरकार की फजीहत होना शुरू हुई। नियुक्तियों में कलेक्टर, एसपी स्तर के अधिकारियों से जुड़े भ्रष्टाचार की शिकायतें आने लगीं। यहां तक भी सब ठीक था। सबको लगा कि नई-नई सरकार है, तबादले और रेत खनन की बदनामी कुछ दिनों बाद मुख्यमंत्री की समझ में आएगी और वो सब संभाल लेंगे।
इसी बीच हनीट्रैप कांड बम की तरह फटा। उसमें मंत्री, विधायक और सांसदों के साथ आला अफसरों की बड़ी फौज फंसती नजर आई। बस यहीं से विषकन्याओं से रंगरैलियां मना रहे अफसरों ने कथित सच दिखाने वाले अखबार के मालिक जीतू सोनी को टारगेट किया। मामला अधिकारियों का था और उलझ गई सरकार। हो सकता है इसमें सत्ता पक्ष के कुछ मंत्री और विधायक भी हों मगर उन्हें बचाने के लिए अफसरों ने कमलनाथ के ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया। अब तीर तो कमान से निकल चुका है। जीतू सोनी और उसके साथियों की बैंड-बाजा-बारात निकल चुकी है। लेकिन जनता के साथ सियासी गलियारों में विवादों में नहीं फंसने वाले कमलनाथ ब्यूरोक्रेसी के जाल में उलझ गए हैं। उनकी संजीदगी की एक मिसाल यह रही है कि आयकर टीम ने उनके नाक-कान आरके मिगलानी, प्रवीण कक्कड़ पर जब छापे मारे तब भी वह सहज ही रहे। इसके बाद दूसरा मामला आया जब आर्थिक गड़बड़ी में उनके भांजे को गिरफ्तार किया गया और सगी बहन और जीजाश्री पर भी मुकदमे दर्ज हुए। तब भी कमलनाथ की बॉडीलैंग्वेज में फर्क नहीं आया। न तो उन्होंने असंतुलित बयानबाजी की और न ही कोई जवाबी कार्रवाई।
लेकिन हनीट्रैप के बाद ऐसा लगा जैसे टीआई स्तर के अधिकारी जोश में आकर मुख्यमंत्री के अधिकारों का इस्तेमाल करने लगे हों। कुल मिलाकर कमलनाथ की छवि बदला लेने वाले राजनेता की नहीं है। लेकिन इन दिनों जो हो रहा है इंदौर से लेकर ग्वालियर में एक नर्सिंग होम पर ताबड़तोड़ कार्रवाई, सरकार के संतुलन पर सवाल खड़ा करती है। जितना जल्दी हो कमलनाथ सरकार को जैसे क्रिकेट में स्ट्रैटेजिक टाइमआउट लिया जाता है वैसे ही एक बार कुछ कदम पीछे हटकर अपनी इमेज के मुताबिक रणनीति पर विचार करना चाहिए। अभी तो हनी में फंसे अफसर फायदे में और सरकार घाटे में दिख रही है।

