किस्सा ए अच्छे ख़ां उर्फ़ बेगम की दावत

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श्रुति कुशवाहा

बेगम की तबियत कुछ दिनों से नासाज लग रही है… भले बेगम कुछ कह नहीं रहीं लेकिन अच्छे मियां गौर कर रहे हैं कि कुछ वक्त से वो उखड़ी-उखड़ी सी रहने लगी हैं। खाने बैठती हैं तो डेढ़ रोटी के बाद ही हाथ खींच लेती हैं, उनके खाने की शक्ल भी आजकल बड़ी रूखी सी हो गई है..न तो घी चुपड़ी रोटी होती है उनकी थाली में न ही शोरबे की तरी।

इतना ही नहीं, मीठे की खतरनाक शौकीन बेगम साहिबा ने खाने के बाद मीठा तक खाना छोड़ दिया है। और सबसे बड़ा झटका तो मियांजी को ये देखकर लगा कि उन्होने अपने सबसे बड़े शौक़ को भी आजकल परे सरका दिया है, अब वो दोपहर में झपकी तक नहीं लेतीं, जबकि पहले इस दुपहरी की नींद के लिए वो बड़े से बड़ा काम छोड़ देती थीं…

अच्छे मियां ने पहले तो खुद टोह ली..बेगम का हाथ पकड़ देखा कहीं बुखार तो नहीं, कान लगाकर सुना कहीं खांसी-ज़ुकाम तो नहीं, आंखें खोलकर देखने की कोशिश की कि कोई खून की कमी या कमज़ोरी वाले लक्षण तो नहीं दिखाई दे रहे..लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। सारी जासूसी के बाद अच्छे मियां और परेशान हो गए क्योंकि बेगम के चेहरे पर छाई मायूसी छंटने का नाम ही नहीं ले रही थी। उन्होने बातचीत कर भांपने की भी कोशिश की कि आखिर मसला है क्या, लेकिन कुछ समझ न आया…

चाहे सारे रिश्तेदार रूठ जाएं, चाहे सारा जहां बेरंग हो जाए..अच्छे मियां को कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन बेगम साहिबा जो ज़रा भी उदास हो जाए, उनकी तबियत में छटांक भर भी कमीपेशी आ जाए तो अच्छे मियां की दुनिया डोली जाती है। और पिछले कई दिनों से यही हो रहा है। यूं तो बेगम रोज़मर्रा के सारे काम कर रही हैं, न सुबह उठने में कोई देर होती न मियांजी को चाय की प्याली थमाने में। और तो और, आजकल वो कुछ ज़्यादा ही फुर्ती दिखाने की कोशिश में भी लगी रहती। इसी चक्कर में उन्होने घर पर काम में हाथ बंटाने वाली शहनाज़ को भी छुट्टी दे दी है। अब घर का काम निपटाकर वो दालान को भी रोज़ बुहारने लगी हैं, जबकि शहनाज़ भी पहले ये काम हफ्ते में दो ही बार किया करती थी…

अच्छे मियां की फिक्र का पारा अब मीटर तोड़ बाहर आने की हद तक आ गुज़रा है। उनसे बिल्कुल सहा नहीं जा रहा..आखिर हिम्मत जुटा पूछ ही बैठे – “ क्या बात है बेगम , आजकल आप कुछ दुरूस्त नहीं लग रहीं, तबियत ख़राब है क्या आपकी। जो तबियत ख़राब हो तो डॉक्टर के पास चले चलते हैं और जो जी ख़राब हो तो दो-चार दिन आपके मैके हो आते हैं, जैसा आप मुनासिब समझें…”

बस इतना सुनते ही..अच्छे मियां को पूरा अंदेशा था कि बेगम भड़क उठेंगी। वो जानते हैं उन्हें फिज़ूल दरयाफ़्त बिल्कुल पसंद नहीं। “अगर जो तबियत खराब हुई तो क्या मैं बोलूंगी नहीं तुमसे..” ये कहकर वो चार बातें सुना ही डालती। लेकिन ये क्या…बेगम ने तो उनकी ओर ऐसी सूनी नज़रों से देखा कि मियांजी के मन में हौल उठ गए। उनकी मोहब्बत भरी नज़र, गुस्से से लाल और शरारत से भरी गुलाबी आंखों के तो आदी हैं अच्छे मियां, लेकिन ये जो देखा उन्होने, ऐसा देखना मियांजी से देखा न गया…

तो अब तय हो गया कि किसी तकलीफ में हैं बेगम साहिबा, और तकलीफ भी ऐसी जो वो मियांजी से बांटना नहीं चाहतीं। अब अच्छे मियां तो वो बात भी नहीं समझ पाते जो बेगम उन्हें भरपूर बताना चाहती हैं, ऐसे में जो बात वो नहीं बता रही या छिपा रही हैं, उसे जानना तो उनके लिए आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा ही है। लेकिन वो इस बात को यूं ही छोड़ भी तो नहीं सकते, आखिर बेगम के चेहरे पर छाई मायूसी और उनके खानपान में हो रही लापरवाही को वो कैसे बर्दाश्त कर लें…

तो अच्छे मियां ने सोचा कुछ किया जाए बेगम को खुश करने की खातिर। इस मामले में उन्होने बेगम का ही तरीक़ा आज़माना तय किया। जब बेगम उन्हें खुश करना चाहती हैं तो लज़ीज़ पकवान बनाकर परोस देती हैं सामने। तो क्यों न वो भी बेगम की पसंद के सारे खाने बनवाकर उनके सामने दस्तरखान सजा दें। इससे बेगम के मुंह का ज़ायका भी सुधरेगा और मन का भी…

तो अच्छे मियां ने चुपके से शहनाज़ के घर की राह पकड़ी, मियांजी के बाद शहनाज़ से अच्छा कोई नहीं जान सकता बेगम साहिबा को। दिनभर उनके साथ लगी रहा करती और हाथों में भी बड़ा स्वाद है उसके। तो मियांजी ने शहनाज़ को सब समझा दिया कि कैसे खाने पकाने है और किस वक्त घर पहुंचाना है…

शाम ढलने को हुई तो बेगम उठी रसोई में जाने को। मियांजी पहले से ही तैयार थे, बोल उठे “ आज कुछ खाने का जी नहीं चाह रहा बेगम, आप ज़्यादा कुछ पकाइयेगा मत ”

इतना सुनते ही बेगम बोल उठीं – “ फिर तो मैं भी नहीं खाऊंगी, मेरा तो पहले ही मन न था खाने का ”। ये दांव तो सही पड़ गया मियांजी का, अब उन्हें इंतज़ार था शहनाज़ का…
तय वक्त पर शहनाज़ आई और अच्छे मियां को गुपचुप बाहर ही दो बड़े-बड़े स्टील के टिफिन पकड़ा गई। अंदर आकर मियांजी ने बेगम को पुकारा और टिफिन खोल दिये। जैसे बागों की बहार होती है, वैसे यहां खाने की बहार थी…कबाब, परांठे, रायता, छोले, सूखी भिंडी, बिरयानी, सेवई और बेगम की पसंदीदा नारियल की बर्फी। बस अब इंतज़ार था कि बेगम इस सरपिराइज़ को देख खुशी से फट पड़े…

फट ही पड़ी बेगम… “दो महीने से मैं सूखी रोटी खा रही हूं, उबली सब्ज़ी पे गुज़ारा कर रही हूं, घी की तरफ देखना बंद कर दिया, मीठे से तौबा कर ली, गोश्त को खुदाहाफिज़ कह दिया…पोंछे लगा-लगाकर हलकान हो रही हूं, दिन भर घर ही में चक्कर काट-काट जान दे दी और तुम मेरे सब किये कराये पर पानी फेरना चाहते हो….पड़ोस वाली खाला कबसे कह रही है कि बेगम तुम मुटिया रही हो, पिछले महीने भाभी आई थी वो भी बोल गई कि पूरे शरीर पर चर्बी जम गई है, अब मैं किसी तरह तो कोशिश कर रही हूं कि फिर पहले जैसी हो जाऊं, इस मोटापे से छुटकारा मिले, और तुम ये दावतें सजाकर मेरी जान जलाना चाहते हो…”

अब समझ आया मियांजी को सारा चक्कर…हंसी फूट पड़ रही थी उनके भीतर से लेकिन किसी तरह खुद को संभाला। कहना तो चाह रहे थे कि बेगम आप तो हमें हर हाल में बेइंतिहा खूबसूरत लगती हैं, कहना तो चाह रहे थे कि खूबसूरती का कोई पैमाना थोड़ी होता है, आप सी तो दुनिया भर में कोई नहीं…लेकिन वो जानते हैं फिलहाल कुछ भी कहना मुनासिब नहीं, इस वक्त चुप रहने में ही समझदारी है…

तो अच्छे मियां ने अपना सारा ध्यान खाने की ओर लगा लिया है..वो समझ गए हैं कि उन्हें अब अकेले ही ये दावत उड़ानी होगी….

जानी मानी लेखिका