पंकज शुक्ला
नर्मदा बांध परियोजनाओं के हजारों डूब प्रभावित परिवारों ने अपने हक के लिए एक नहीं तीन सरकारों से मैदानी संघर्ष, बंद कमरों की कानूनी व प्रशासनिक लड़ाई यदि 34 सालों बाद भी नहीं हारी तो इसके पीछे सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर जैसे दधीचि का होना है। दधीचि हमारे पौराणिक आख्यान का वह किरदान जिसने असुरों के साथ संघर्ष के लिए देवों को अपनी अस्थियां दान दी थीं।
मेधा पाटकर ने भी अपना पूरा जीवन नर्मदा घाटी के विस्थापितों को न्याय दिलवाने के लिए होम कर दिया है। 34 सालों से चल रहा आजीविका का यह संकट अब लगभग अपने निर्णायक मोड़ पर आ गया है। गुजरात सरकार और केन्द्र सरकार डूब प्रभावितों की तो ठीक मप्र सरकार भी सुन नहीं रही हैं। वे सरदार सरोवर को अधिक ऊंचाई 138 मीटर तक भरना चाहते हैं। इस कदम से मप्र के सवा सौ से अधिक गांव डूब जाएंगे। 18 हजार से अधिक परिवार बिना पुनर्वास के ही डूब क्षेत्र में आ जाएंगे। मेधा पाटकर के साथ ग्रामीण न्याय की आस लिए नर्मदा के पानी में खड़े हैं। वे जानते हैं कि नर्मदा का बढ़ता जल स्तर उनके लिए जलमग्न होने की चेतावनी है मगर डूबने के पहले वे एक बार और अपनी मुट्ठियां तान संघर्ष कर लेना चाहते हैं।
गुजरात सरकार बांध को अधिकतम ऊंचाई तक भर लेना चाहती है तब सवाल उठता है कि क्या सभी लोगों का पुनर्वास हो गया है? हकीकत यह है कि धार तहसील में जमीन दी गई तो कब्जा नहीं, खलघाट में जमीन दी तो घर नहीं मिला। नर्मदा बचाओ आंदोलन के अनुसार 2017 में जितने घर जबरन तोड़े गए थे उनमें से भिताड़ा, झंडाना, रोलीगांव, कुकडिया जैसे गांवों के परिवारों को तो अब तक मकान बनाने के लिए भूखण्ड भी नहीं मिले हैं। पुनर्वास स्थलों पर पीने का पानी हो या सीवेज व्यवस्था, चारागाह या श्मशान, अस्पताल, स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं हों, यह कौन देख रहा है?
पिछले साल की मप्र की भाजपा सरकार ने भरे-पूरे डूब-क्षेत्र को शून्य आबादी वाला बताकर बांध की ऊंचाई बढ़ाने पर सहमति दे दी थी। यह गुजरात के आगे आत्मसमर्पण की उसकी राजनीतिक मजबूरी ही थी। तभी तो दिसंबर में कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मप्र सरकार ने ‘सरदार सरोवर’ के ‘शिकायत निवारण प्राधिकरण’ (जीआरए) के सामने स्वीकार किया कि साढ़े आठ हजार से अधिक प्रकरण लंबित हैं और डूब-क्षेत्र के 76 गांवों में कम-से-कम छह हजार परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। मप्र सरकार ने नाराजी जताई है गुजरात सरकार सरदार सरोवर बांध से बिजली भी नहीं बना रहा है और अधिकतम ऊंचाई तक पानी भर कर मप्र के लोगों को डूबो रहा है।
यहां यह समझना आवश्यक है कि गुजरात, मप्र, महाराष्ट्र और राजस्थान को शामिल कर बनाई गई सरदार सरोवर बांध परियोजना में सबसे अधिक जमीन मप्र की डूब रही है। इस परियोजना से बनने वाली बिजली का 57 फ़ीसदी हिस्सा मध्य प्रदेश को, 27 फ़ीसदी हिस्सा महाराष्ट्र को और 16 फ़ीसदी हिस्सा गुजरात को मिलना तय हुआ। राजस्थान को सिर्फ़ पानी मिलना तय हुआ था। मप्र की चिंता यह है कि गुजरात न बिजली बना रहा है और न पुनर्वास नहीं हुए परिवारों की चिंता करते हुए नर्मदा का जलस्तर घटाने को तैयार हो रहा है। मप्र सरकार अपना विरोध दर्ज करवा चुकी है। गुजरात सरकार सुन नहीं रही है और डूब प्रभावितों के सामने करो या मरो का सवाल पैदा हो गया है।
डूब प्रभावित कह रहे हैं कि गुजरात के 204 बांधों के जलाशय लबालब भरे हुए हैं। गुजरात को अगले साल गर्मियों में सरदार सरोवर के पानी की जरूरत नहीं होगी। गुजरात वैसे भी मप्र को बिजली बना कर नहीं दे रहा है। मप्र को बिजली की जरूरत भी नहीं है। उसके पास 21 हजार मेगावाट विद्युत निर्माण की क्षमता है और मांग की पूर्ति प्रतिदिन मात्र 7000 मेगावाट से हो रही है। मेधाजी का सवाल है कि लोगों को बिना पुनर्वास डूबो देने की इतनी जल्दी क्यों हैं? क्या बांध पूरा भरने के लिए साल भर तक रूका नहीं जा सकता है?
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है


