बहुत बड़ी थी मुकरी के छोटे कद की शोहरत…

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शशी कुमार केसवानी

बात दिल की

नमस्कार दोस्तों, अपन हर हफ्ते किसी न किसी ऐसे महान शख्सियत को याद करते हैं जिसे दुनिया भूलती जा रही है। पर हमने ये ठान रखा है कि हम उन कलाकारों को आजकल के युवाओं को कभी नहीं भूलने देंगे। जी हां दोस्तो आज बात कर रहा हूं मैं एक ऐसे अदाकार की जो बहुत ही धार्मिक किस्म का व्यक्ति था। इस्लाम की अच्छी जानकारी के साथ-साथ कई अन्य धर्मों की जानकारी रखता था। एक जमाने में मस्जिद में कुरान पढ़ाने वाला ये कलाकार आर्थिक तंगी से फिल्मी दुनिया में दिलीप कु्रमार की वजह से आया। जी हां दोस्ता मैं बात कर रहा हूं मुहम्मद उमर मुकरी की जिसे दुनिया मुकरी के नाम से ही जानती है। बहुत की मिलनसार शख्सियत थी। उन्होंने लगभग 600 फिल्मों में काम किया हर फिल्म में अलग छाप छोड़ी। मजेदार किस्से बताने में माहिर मुकरी साहब ने हमें एक बार बताया कि आन फिल्म के समय महबूब खान ने लंदन में कहा था कि तुम्हें कौन सा कमरा चाहिए, मैंने कहा था मैं तो युसूफ भाई के साथ ही सो जाऊंगा पर वे गलती से नादरा के कमरे में जाकर रजाई में चला गया दो मिनट बाद गदर मच गया बाद में युसूफ साहब ने संभाला। मुकरी की दो बेटिया रही नसीम और अमीना और तीन बेटे नासिर फारूख और बिलाल। नसीम ने धड़कन और हां मैंने भी प्यार किया फिल्म के डायलाग भी लिखे थे। और धड़कन का स्क्रीन प्ले भी लिखा और एक्टिंग भी की। पर वो कमाल कुछ कर न सकी कुछ छोटे-मोटे काम किए। एकता कपूर ने अपने एक टीवी सीरीयल के लिए मुकरी को आफर किया था पर मुकरी ने मना कर दिया। बाद में जितेंद्र ने भी उन्हें फोन किया और मनाने की कोशिश की । तब मुकरी ने बताया अब मेरी उम्र 78 साल हो चुकी है जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। पर आखिरी समय तक जब भी उनसे मुलाकात होती थी तो उनकी एक जिंदादिली अलग झलकती थी। मुझे वे अपना एक डायलाग जरूर सुनाया करते थे। अलखनिरंजन, बम बम बम बम, जब तक दम में दम, ना कोई धोखा ना कोई गम, कमाएगी दुनिया खाएंगे हम। आखिरी वक्त में लीलावटी हॉस्पिटल में भी डॉक्टरों और नर्सों को हमेशा हंसाने वाले मुकरी जाते जाते आंखों में आंसू देकर गए। तो आइए उनके जीवन के कुछ अनछूए पहलू पर बात दिल की करते है।


5 जनवरी 1922 में जन्मे मुकरी ने भी लिखा था, मुकरी एक भारतीय फिल्म अभिनेता थे, जिन्होंने हिंदी फिल्मों में एक हास्य अभिनेता के रूप में काम किया था। कोकिनी मुस्लिम परिवार में अलीबाग में मुहम्मद उमर मुकरी के रूप में जन्मे, मुकरी और दिलीप कुमार बम्बई के एक ही स्कूल में पढ़े, जिन दिनों दिलीप कुमार अपनी पढ़ाई खत्म करके और एक दिन घर में अपने वालिद की डांट से गुस्सा होकर, पूना की मिलिट्री कैंटीन में नौकरी कर रहे थे, उनका दोस्त मुकरी एक मदरसे में बच्चों को इस्लाम की तालीम देने लगा था। कहते हैं कि मदरसे की मामूली तनख्वाह से घर परिवार का गुजारा करना मुश्किल था, इसीलिए उनका रुझान फिल्मों की तरफ हुआ। मुकरी खुद लिखते हैं जब यूसुफ मियां दिलीप कुमार बनकर ज्वार भाटा में आये तो मैं उस वक़्त के आसिफ साहब का चीफ असिस्टेंट हुआ करता था। आसिफ साहब उन दिनों फूल बना रहे थे। इस बयान से पता चलता है कि मुकरी, दिलीप कुमार से पहले फिल्म इंडस्ट्री में आ गए थे। हालांकि मैंने बहैसियत एक अदाकार टुन-टुन के साथ एक फिल्म में काम किया था लेकिन यूसुफ मियां की दूसरी फिल्म प्रतिमा (1944) में मुझे एक साथ काम करने का मौका मिला। 78 बरस के जीवन में मुकरी 50 साल तक फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहे और करीब 600 फिल्मों में अपनी अदाकारी के जौहर दिखाए। वैसे तो महत्वपूर्ण होने के बावजूद, एक हास्य कलाकार, सिर्फ एक हास्य-कलाकार ही होता है लेकिन मुकरी अपनी इन 600 फिल्मों में कुछ ऐसी फिल्में भी दे गए जिनमें से अगर उनके रोल को निकाल दिया जाय तो पूरी फिल्म लड़खड़ाने लगेगी। मुकरी साहब के पास मजेदार किस्सों का एक न खत्म होने वाला एक पिटाता होता था। 95-96 की बात है, एक लेखक एक इंटरव्यू के सिलसिले से उनके फ्लैट पर पहुंचा। दोपहर का वक्त था और मुकरी साहब नमाज अदा कर रहे थे। लेखक वहीं उनके करीब एक कुर्सी पर बैठ गया। एक छोटे से कद का आदमी कुर्सी पर बैठ कर (सेहत की वजह से, उस वक़्त शायद खड़े होकर नमाज पढ़ना उनके लिए नामुमकिन था) बारगाहे-इलाही में झुक के सजदा अदा कर रहा था। नमाज खत्म हुई और मैंने लपक कर मुकरी साहब से मुसाफह (हाथ मिलाया) किया। अगले चंद मिनटों में मुकरी साहब अपने अंदाज में आ गए और फिर वो-वो किस्से सुनाए कि हमारे पास सिवाय हंसते रहने के और कोई चारा न था। नाट्यशास्त्र के नौ रसों में हास्य-रस भी है। संस्कृत-नाटकों में विदूषक के महत्त्व को बहुत सराहा गया है और उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण काम लिया गया है। पारसी थिएटर में भी (जिसका बड़ा असर हमारे मंचों और फिल्मों पर रहा है) हास्य यानी कॉमेडी-आर्ट पर गंभीर काम हुआ है। सिगमंड फ्रायड द जोक एंड इट्स रिलेशन टू द अनकांशस में लिखते हैं लोगों के अन्दर का हास्य फूट पड़ता है जब, दिमाग में छुपे हुए अनजाने खयालात और भावनाएं, जान-बूझकर व्यक्त की जाएं। हमारी हिंदी फिल्मों में ज्यादातर, कहानी भावनाओं के सम्मोहन में आगे बढ़ती है, जिसे मेलोड्रामा कहा जाता है। ऐसे नाटकों में बात कहने के लिए जितनी जरूरत ट्रेजेडी की होती है उतनी ही तलाश कॉमेडी की होती है। और जब-जब इन दोनों विधाओं की जुगलबंदी अपने कमाल पर होती है तो फिल्में यादगार बन जाती हैं।
सोच कर देखिए अगर अमर, अकबर, अन्थोनी की कहानी से तय्यब अली को निकाल दिया जाय तो क्या बचा रह जाएगा। सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने एक बातचीत में हमसे कहा था कि ये सिनेमा की कामयाबी है कि जब आप थिएटर से निकल रहे हों तो आपके होंठों पर मुस्कुराहट और आंखों में नमी हो। मुकरी दिलीप साहब के अलावा निम्मी और उनके पति अली रजा, महमूद साहब, सुनील दत्त और नर्गिस से गहरी दोस्ती थी।
नर्गिस को मैं लंबे समय तक मुकरी को सगी बहन ही मानता रहा। वे एक-दूसरे के परिवार के हर सुख-दुख में आखिरी दम तक शामिल रहे। मुकरी की बेटी ने बताया कि पापा को साहित्य में भी बहुत दिलचस्पी थी। हमारे घर में मजरूह सुल्तानपुरी, संवाद लेखक अली रजा, आगा जानी कश्मीरी, अली सरदार जाफरी सहित बहुत से लेखकों और शायरों की नियमित बैठक हुआ करती थी। तब मुझे उनकी बातें समझ में नहीं आती थीं, लेकिन वे बातें अच्छी लगती थीं। शायद उन बातों का ही असर हुआ होगा कि 12 साल की उम्र में मैंने तय कर लिया था कि मुझे जर्नलिस्ट बनना है। मैं कुछ-कुछ लिखती रहती थी। फिर मैं अमीन सयानी साहब के साथ रेडियो प्रोग्राम के लेखन से जुड़ गई। पापा को इस बात की बेहद खुशी होती थी कि मैं लिखने पढ़ने के काम में लग गई हूं। एक बार एक पत्रकार पापा की जिंदगी के बारे में एक लेख लिखने के लिए उनसे मिलने आए, लेकिन पापा को शूटिंग के लिए निकलना था। उन्होंने कहा कि नसीम मेरे बारे में आपको लिख देगी। उसी के आधार पर आप लेख तैयार कर लीजिएगा। मैंने जो कुछ पापा के बारे में लिखकर दिया, उसे बिना एडिट किए मेरे नाम से छाप दिया गया और मेहनताने के रूप में मुझे 50 रुपये का चेक मिला। जब पापा को पता चला, तो वे खुशी और गर्व से झूम उठे। पता नहीं कितने दिन तक उन्होंने वह पचास रुपये का चेक अपने सारे जानने वालों को दिखाया।

मूंछें हों तो नत्थूलाल जी जैसी हों वर्ना न हों

फिल्म शराबी में अमिताभ बच्चन का एक डायलॉग तो आपको याद ही होगा भई वाह जवाब नहीं आपकी मूंछों का। मूंछें हों तो नत्थूलाल जी जैसी, वर्ना न हों। 70 और 80 के दशक में टिंकू जी यानी मोहम्मद उमर मुकरी की जोड़ी लम्बू जी यानी अमिताभ के साथ खूब जमी थी। शराबी, नसीब, मुकद्दर का सिकंदर, लावारिस, महान, कुली और फिर अमर अकबर अन्थोनी में तय्यब अली का रोल, मुकरी ने अपनी अदायगी से अमर कर दिया था। दिलीप कुमार ने जिन चंद दोस्तों का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है, उनमें राजकपूर, प्राण, डायरेक्टर एसयू सन्नी के साथ मुकरी की यादें भी सहेजी हैं। मुकरी ने हमें, फिल्म आन के प्रीमियर का एक मजेदार किस्सा भी सुनाया उस दिन। आन का प्रीमियर लंदन में हुआ था। फिल्म का सारा क्रू, हवाई-जहाज से लंदन ले जाया गया। प्रीमियर के बाद वहां एक बड़ी दावत थी जिसमें पूरे शाही अंदाज से हमारा स्वागत हुआ, खाने को जो बैठे तो मैंने देखा चम्मच और कांटे चांदी के हैं। मैं बम्बई से आते समय ही सोच रहा था की वहां से कोई चीज यादगार के लिए जरूर लाऊंगा, हालांकि हमारे पास पैसे-वैसे नहीं होते थे। ये वो दिन थे जब हम और यूसुफ मियां बॉम्बे-टॉकीज से घर लोकल ट्रेन से आते-जाते थे। तो साहब मेरी कुछ समझ में नहीं आया और मैंने चुपके से एक चमची अपनी जेब में डाल ली। मैं बेफिक्र था कि किसी ने मुझे नहीं देखा है लेकिन यूसुफ भाई ने देख लिया था। जब खाना खत्म हुआ तो यूसुफ मियां खड़े हुए और उन्होंने दावत में मौजूद लोगों का शुक्रिया अदा किया और फिर कहा कि आप लोगों ने हिन्दुस्तान के जादू के बारे में बहुत सुना होगा। आज मैं रिटर्न-गिफ्ट के तौर पर आपको जादू दिखता हूं। सब लोग दम साधे देखने लगे की देखें दिलीप कुमार क्या करते हैं। तो यूसुफ मियां ने एक चमची अपनी जेब में डालते हुए कहा- साहिबान ये देखिए मैं अपनी जेब में ये चम्मच डाल रहा हूं। अब इसे आप मुकरी, जो मेज के दूसरी ओर बैठे हैं, की जेब से निकाल सकते हैं। एक अंगरेज झिझकते हुए मेरे पास आया और मेरी जेब से उसने चमची निकाल ली। पूरा हाल तालियों से गूंज रहा था और मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि कहां अपना मुंह छुपाऊं। खैर जब हम दिल्ली के लिए रवाना हुए तो यूसुफ भाई ने पूछा की मैंने ऐसा क्यों किया मैंने बच्चों की तरह उन्हें बता दिया की मैंने ऐसा एक यादगार सहेजने के लिए किया था। यूसुफ मियां मुस्कुराए और अपनी जेब से चमची निकाल के मुझे देते हुए बोले- ऐसा था मुझे बोले देते। तो ये थे मुकरी साहब, जो तय्यब अली बनके अपने दर्शकों के दिलों पर आज भी राज करते हैं। चलते-चलते याद ताजा कीजिए तय्यब अली का वो सदाबहार किरदार।
फिल्म अमर अकबर अन्थोनी अमिताभ बच्चन, ऋषि कपूर, नीतू सिंह पर फिल्माया गया यह गाना (कव्वाली) लोगों के दिलों दिमाग में आज भी छाई रहती है। जब दो प्यार करने वालों के बीच में किसी का बाप आता है तो उन आशिकों के दिमाग में तय्यब अली की ये कव्वाली गुंजती है। तय्यब अली प्यार का दुशमन हाय हाय, मेरी जान का दुश्मन, हाय हाय हाय हाय । दुनिया में बहुत कलाकार आएंगे जाएंगे पर मुकरी जैसे कलाकार न पहले कोई आया था न आगे कोई आएगा। अब उन्हें फिल्मों के जरिये ही देखा जा सकता है और याद किया जा सकता है।