एक बार फिर पीसीसी चीफ को लेकर फैसला टल गया

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TIO भोपाल

एक बार फिर पीसीसी चीफ को लेकर फैसला टल गया है। अब करीब दो हफ्तों के बाद इस पर फैसला लिया जाएगा कि प्रदेश की कमान किसे सौंपी जाए। पार्टी आलाकमान ने बैठक में इस बात के संकेत दिए हैं कि संगठन की मजबूती पर प्रदेश इकाइयां खास ध्यान दें।वही पार्टी सुत्रों का कहना है कि श्राद्ध पक्ष शुरू होने के चलते फैसले को कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया है। लगातार देरी और बढ़ते सस्पेंस ने नेताओं और समर्थकों की दिलों की धड़कने बढ़ा दी है।वही समर्थकों में भी नाराजगी देखी जा रही है।

हालांकि शुक्रवार को हुई बैठक में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को अपनी सरकार के कामकाज की मार्केटिंग को भी तवज्जो देने की सलाह दी है।सरकार और प्रदेश कांग्रेस संगठन में घमासान पर सख्त तेवर अपनाते हुए पार्टी नेतृत्व ने मुख्यमंत्रियों को सरकार व संगठन में बेहतर समन्वय की जवाबदेही तय की है। सरकार में पार्टी नेताओं की सुनवाई के लिए हर हफ्ते प्रदेश कांग्रेस के दफ्तर में राज्य के एक मंत्री की बैठने की व्यवस्था शुरू करने का दिशा-निर्देश दिया गया है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस दफ्तर में सूबों के मंत्रियों की ‘रोस्टर डयूटी’ लगाने की मुख्यमंत्रियों से व्यवस्था शुरू करने को भी कहा है।

वही उन्होंने कहा पार्टी ने विधानसभा चुनाव में घोषाण पत्र में जो वादे किए थे, उन्हें पूरा किया जाना चाहिए। बैठक में आर्थिक मंदी के मौजूदा दौर पर भी चर्चा की गई और पार्टी की राज्य सरकारों द्वारा इससे निपटने के लिए किए गए उपायों और भविष्य में किए जाने वाले उपायों को तत्परता से लागू करने का फैसला किया गया। वही नवंबर में अपने एक साल का कार्यकाल पूरा कर रहे छत्तीसगढ, मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों से उनके पूरे कामकाज की समीक्षा की गई। इन सरकारों की पहली सालगिरह को शो-केस करने की रूपरेखा पर भी चर्चा हुई।

दिग्विजय बनाम सिंघार विवाद भी टला
उधर, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और वन मंत्री उमंग सिंघार विवाद पर भी बैठक टल गई है। अनुशासन समिति के अध्यक्ष एके अंटोनी ने इस मसले पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई थी, लेकिन कोरम पूरा नहीं होने के कारण बैठक टल गई। इसलिए अब 15 दिन बाद ही प्रदेशाध्यक्ष और विवाद पर कोई फैसला हो सकेगा। वहीं, दिग्विजय सिंह ने सोनिया गांधी से चर्चा हुई है, जिसमें उन्होंने कहा है कि आरोप-प्रत्यारोपों के दौर को वरिष्ठ नेता हस्तक्षेप करते तो स्थिति भयावह नहीं होती।