नई दिल्ली। शुक्रवार को मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव गिर गया। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में 126 वोट पड़े जबकि उसके खिलाफ 325 वोट पड़े। एनडीए के खिलाफ यूपीए के इतर विपक्षी एकता की कोशिशों के लिए भी इसे एक झटके के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे तो कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों के समर्थन से टीडीपी के अविश्वास प्रस्ताव का गिरना पहले से तय था। हालांकि ऐंटी बीजेपी वोटों की संख्या के हिसाब से विपक्ष को कुछ ज्यादा वोटों के मिलने का अनुमान था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या मोदी ने 2019 के महाभारत के पहले विपक्षी एकता में ही सेंध लगा दी है?
Opposition had to give a no-confidence motion, Modi made a mistake before it became a big bang
दक्षिण में गोलबंदी की कोशिश हुई नाकाम?
अविश्वास प्रस्ताव पर सबसे बड़ा झटका दक्षिण की राजनीति ने ही दिया है। एक तरह से कहें तो साउथ ही साउथ से खेल गया। साउथ इंडिया की एक पार्टी (टीडीपी) ने अविश्वास प्रस्ताव लाया। साउथ इंडिया की दूसरी पार्टी (टीआरएस) ने वोटिंग से अनुपस्थित रहकर मोदी सरकार को फायदा पहुंचाया। साउथ इंडिया की तीसरी पार्टी (एआईएडीएमके) ने अविश्वास प्रस्ताव के विरोध में वोटिंग कर दी। दरअसल अविश्वास प्रस्ताव के बाद दक्षिण की यह सियासी तस्वीर बीजेपी के लिहाज से बिल्कुल मुफीद नजर आ रही है।
टीडीपी के एनडीए का साथ छोड़ने के बाद बीजेपी को साउथ में नए पार्टनरों की तलाश है। तमिलनाडु में जहां अब उसे स्पष्ट तौर पर एआईएडीएमके का साथ मिलता दिख रहा है तो के. चंद्रशेखर राव की टीआरएस भी मोदी सरकार के साथ ही दिख रही है। टीआरएस का यह स्टैंड इसलिए भी अहम है क्योंकि राव पिछले दिनों गैर कांग्रेसी-गैर बीजेपी फ्रंट बनाने की दिशा में काफी सक्रिय दिख रहे थे। हालांकि अभी 2019 के चुनाव में वक्त है और राजनीति तबतक क्या करवट ले, इसका अंदाजा अभी लगाना थोड़ा मुश्किल है।
क्या विपक्ष को जितनी उम्मीद थी उतने वोट नहीं मिले?
अविश्वास प्रस्ताव तो गिरा ही, विपक्ष के खाते में भी 126 वोट ही आए। ऐसे में एक सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या विपक्ष को जितनी उम्मीद थी, उतने वोट नहीं मिले। आइए इसे आंकड़ों की कसौटी पर परखते हैं। टीडीपी (15) के अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस (48), टीएमसी (34), सीपीएम (9), आरजेडी (4) और आम आदमी पार्टी (4) ने पहले ही समर्थन की घोषणा कर दी थी। इसके अलावा विपक्षी एकता या ऐंटी-बीजेपी वोटों के आधार पर एसपी (7), एनसीपी (7), एआईयूडीएफ (3), आईएनएलडी (2), एनसी (1), जेडीएस (1), सीपीआई (1), जेएमएम (2), पीडीपी (1), आरएनएलडी (1), एआईएमआईएम (1), आईयूएमएल (2) जैसे दलों से समर्थन मिलने की उम्मीद थी। यानी कुल मिलाकर विपक्ष को 140 से अधिक वोट पाने के आसार साफ थे।
इसके बावजूद विपक्ष के खाते में केवल 126 वोट आए। ऐसे में सवाल यह है कि जब अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष क्षेत्रीय पार्टियों की गोलबंदी कराने में विपल रहा तो क्या 2019 के चुनावों में उसे सफलता मिलेगी? वैसे इस सवाल का अंतिम जवाब भी अभी भविष्य के गर्भ में ही छिपा हुआ है।
क्षेत्रीय दलों को छोड़ मोदी के निशाने पर केवल कांग्रेस
पीएम मोदी ने अविश्वास प्रस्ताव पर अपने संबोधन में दो चीजें की। एक तो अपनी सरकार की सफलताएं गिनाईं और दूसरी- राहुल गांधी व कांग्रेस पर जमकर हमला बोला। इस बीच पीएम मोदी विपक्ष के क्षेत्रीय दलों पर खास हमलावर नहीं हुए। हमला करने के उलट मोदी ने टीआरएस की तारीफ भी कर दी। राजनीतिक विश्लेषक इसे बीजेपी की 2019 की चुनावी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। पीएम मोदी कांग्रेस और वंशवादी राजनीति पर हमला करते हुए भारत की ग्रैंड ओल्ड पार्टी को विपक्षी एकता की धुरी बनने से रोकने की पूरी कोशिश करते हुए नजर आए।

