राघवेंद्र सिंह

असाध्य रोगों की चिकित्सा में होम्योपैथी की दवा को लेकर कई दफा उसके आलोचक कहते हैं लग गया तो तीन नही तो तुक्का। ऐसा ही माहौल चुनावी नतीजो को लेकर बना हुआ है। तीन दिसम्बर तक देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव परिणामों को लेकर अनुमानों और अटकलों का बाजार गर्म है। वोटर की खामोशी ने नेताओं की धुकधुकी बढ़ा रखी है। विशेषज्ञों के अलावा हर कोई अपने अपने हिसाब से तुक्के लगा रहे हैं निशाने पर लग गया तो तीर वरना तुक्का तो है ही। कुल मिलाकर मतदाताओं की चुप्पी सबसे शीर्षासन करा रही है। ये है डेमोक्रेसी में वोटर का मैजिक। किसी को सम्पट नही पड़ रही है।
ऐसे में पत्रकारों और राजनेताओं के साथ बस- ट्रेन, बस अड्डों, एयरपोर्ट, से गली मोहल्लों, चौक चौराहों, केश कर्तनालयों,चाय पान की गुमठियों, गांव देहात की चौपालों तक एक ही सवाल सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है कि किस की सरकार बनेगी और किसके गले में हार-जीत का हार डलने वाला है। टीवी चेनल्स पर अलबत्ता एग्जिट पोल का जादू शुरू होने वाला है। ओपिनियन पोल का खेल तो खेला जा चुका है। अब मतदान के बाद के अनुमान – रुझान भी तीन दिसम्बर तक टाइम पास मूंगफली की तरह बैचेन नेताओं उनके समर्थकों और आमजनता के लिए थोड़ी खुशी, थोड़ा गम जैसा होने वाले हैं। बहरहाल, भाजपा और कांग्रेस दोनो ही दलों में सरकार के दावे किसी से कम नही है। भाजपा में लाडली बहनों और किसान भाइयों के साथ आदिवासियों के वोट पर पूरा जोर है। इसमे बहनों को हर महीने साढ़े बारह सौ रुपए और किसानों को धान -गेहूं की एमएसपी में डेढ़ हजार रुपए प्रति क्विंटल का इजाफे का वादा जीत का आश्वासन माना जा रहा है। इसके अलावा मोदी है तो गारंटी भी उन्हें सुकून की नींद सोने का आधार बना हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस जनों को भाजपा के खिलाफ मतदाता और उसके कार्यकर्ताओं का असन्तोष जीत की दहलीज पार कर सत्ता का मुकुट पहनने का भरोसा दिलाए हुए है। कांग्रेस को विश्वास है कि भाजपा कार्यकर्ताओं का यह सोच कि पार्टी से बैर नही लेकिन विधायक-मंत्री तेरी खैर नही। अहंकारी और बेईमान प्रत्याशी जो दलालों के जरिए राजनीति कर रहे थे जरूर पार्टी के लिए संकट बन गए हैं। भाजपा में करीब पचास से ज्यादा ऐसे उम्मीदवार हैं जिन्हें बदल दिया जाता तो हालत बेहतर होती। लेकिन टिकट कटने वाले नेता जी की बगावत और उनकी भितरघात से निपटने का सिस्टम पार्टी ध्वस्त भले ही न हो लेकिन निष्प्रभावी पड़ा हुआ था।सो सामने दिख रही हार के बाद भी नेतृत्व टिकट काटने का वह साहस नही दिखा पाया जिस के लिए वह जाना जाता रहा है।
खैर कांग्रेस -भाजपा की कई कमजोरियों के चलते बागी उम्मीदवार के साथ सपा-बसपा और निर्दलीय भी इस बार सरकार के भाग्यविधाता बनने के सपने संजोए हुए है। इस सबके बीच नतीजा जो भी आए बहुमत किसी एक दल को मिले तो राजनीतिक अस्थिरता से बचना सबके हित में होगा। असली मीडिया के लिए तो कोई नृप हो हमे का हानि का भाव है।वैसे अब सियासी दल भी किसी पत्रकार या मीडिया घराने को निष्पक्ष नही रहने देना चाहते। एक देशी कहावत रांड तो बुढ़ापा काट ले पर रडुए काटने दे तब न…मीडिया तो अब गरीब लुगाई और सबकी भौजाई जैसी हो जा रही है…कमोबेश मतदाता भी कुछ इसी दशा का शिकार है…फिर हम यही कामना करते हैं नतीजे ऐसे आए जिसमे लोकतंत्र की जय जय हो…अभी तो गली गली चल रहे हैं गप्पों के तुक्के… जो निशाने पर लग गए तो तीर मान ही लिए जाएंगे…