TIO NEW DELHI
सत्चरित्र की हत्या व दुष्चरित्र के महिमामंडन करने वाली मानसिकता के दौर में महामारी ने चरित्र दर्पण का कार्य भी किया है। आपदा में अवसर दोनों ओर के विचारों को मिला। कुछ गम्भीर रोगियों ने बेड तक दे दिए अन्य जरूरत मन्दो को तो वही कुछ ने बेड बेचे, दवाइयों की कालाबाज़ारी की, ऑक्सीजन टेंकरो को आपातकालीन गंतव्य पहुचने में देरी कर गुब्बारे लगा फ़ोटो भी खिंचवाए।
ऐसे चिकित्सक भी देखे जिन्होंने दिन रात एक कर सेवा में उत्कृष्ट योगदान दिया तो वही कुछ अस्पतालों को छोड़ भाग गए।
महामंडलेश्वर स्वामी शैलेशानन्द गिरी जो कि विगत दो दशकों से कर्तव्य क्रांति शीर्षक से अवसाद के खिलाफ अभियान श्रृंखला चलाते रहे है , ने राष्ट्रीय चरित्र पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि अनुभव है इतिहास का कि जिस भूमि ने आपदा व युद्ध इत्यादि नही देखे वहां मानवीय मूल्य कभी पूर्ण स्थापित नही हुए।धर्म, ईतिहास , संस्कृति के पारस्परिक संघर्ष हमारी मूढ़ता का परिचय देता रहा है। राजनैतिक अंधत्व धर्म व विज्ञान व्यवस्था से ऊपर करने की होड़ लगी हुई है।
महामारी के इस दौर में सत्ता लोलुपता ने नवीन अमानवीय कीर्तिमान रच दिए।विगत वर्ष महामारी आग़ाज़ को हम अनदेखा कर राजनीतिक गणित में व्यस्त रहे व सरकार बनने बिगाड़ने के खेल में बेशर्मी से ठहाके लगाते रहे। इस वर्ष तो हमारी जिम्मेदारी प्रत्यक्ष खड़ी महामारी से लोहा लेने की थी , फीर भी हम बंगाल, आसाम, तमिलनाडु में चुनाव करवा कर ज्ञातअज्ञात हमलावर के आगे जन जीवन को खतरे में डाल चुके।इन हत्याओं के सेहरे छीन कर बेशर्मी से पहनने की मानो होड़ लगी। अंगुलिमाल के गले की माला में मानो नई उंगली पिरोने की पाशविक जल्दबाजी है।
न्याय व्यवस्था की देर अनेकानेक हादसों की नींव रच रही। सिर्फ नोटिस दे कर कागजी भंडार बढ़ाने से ज्यादा कुछ नही प्राप्त होता। न्याय होना चाहिए कि समस्त जिम्मेदार केंद्र व राज्यो के स्वास्थ्य प्रमुखों को उपस्थित कर पूछताछ कर आगामी निर्णय लिए जाए। जबकि विगत वर्ष से आजतक जब वैज्ञानिकों ने दूसरी लहर के और घातक होने की घोषणा कर दी थी। कितनी स्वास्थ्य सुविधाये, अस्पताल, दवाई, ऑक्सीजन, बेड आदि का इंतजाम किया। जिस रोज जिम्मेदारी न निभाने के आधार पर किसी उच्चसिन पद को न्यायालय प्रत्यक्ष खारिज कर देगी, उसी समय राष्ट्रीय चरित्र नए आयाम छूने लगेगा। यदि चिकित्सक व वैज्ञानिक खतरा मोल ले कर आई सी यु व प्रयोगशालाओं में युद्ध लड़ सकते राष्ट्रीय चरित्र को स्थापित करते हुए, तो न्याय व्यवस्था भी मानवीय जीवन से कोई कम जरूरी नही।उसकी भी घर पहुच होना जरूरी।
पत्रकार परिषद ने अनेकानेक साथी खोए किन्तु फीर भी निष्पक्षता फिलहाल बाधित ही है। प्रायोजित व भ्रामक प्रचार में कई उलझ भी गए।जबकि ऐसे भी है जो सत्य। की मशाल लिए आज भी आशान्वित कर रहे।
युद्धकाल में स्वाभिमान राष्ट्र का होता, निजी स्वार्थ व अहं नही। महाराणा प्रताप जब अंग्रेज़ो से लोहा ले रहै थे तब पड़ोसी राज्य खेती कर रहे थे, अंग्रेज़ो के स्वागत के उत्सव हो रहे थे।
सत्ताओं व सिंहासन के लोभ राष्ट्र से ऊपर नही होते।ऐसी आपातकालीन परिस्थितियों में हमारी सम्पूर्ण ब्यवस्था का इस कदर लड़खड़ाना निश्चय ही क्षोभनिय हैं।
ऐसे में मात्र निंदा नही प्रखर व मुखर परिवर्तन की आवश्यकता है। सामूहिक जवाबदारी ले कर हमारी तैयारी आपदा हेतु सदैव रहे ।
शिक्षा व्यवस्था में स्कूल से ही स्वास्थ्य, सामरिक व सामाजिक सुरक्षा व न्याय में प्रशिक्षित किया जाना अनिवार्य रहे। हमारी सामाजिक राजनीतिक बुनावट में हमे चिकित्सक व वेज्ञानिको को और ज्यादा शक्ति व अधिकार देने की आवश्यकता है।ताकि वे सत्तारूढ़ दल के अधीन न हो कर स्वतंत्र निर्णय ले सके।
कर्तव्य क्रांति के इस निराकर्णीय दौर में मात्र ऊर्जावान कर्तव्य निर्वहन ही कुछ चरित्र निर्माण कर सकेगा। उठ कर हूंकार की आवश्यकता है। सवाल निर्भीकता से पूछने की जरूरत है। उसके साथ ही पूर्ण सुरक्षा के साथ पीड़ित को ये विश्वास दिलाने की जरूरत है कि वह अकेला नही। जापान से सीख हम ले कि कैसे एटम बम त्रासदी के बाद वहां के नागरिकों ने राष्ट्रीय चरित्र से कम से कम समय मे पुनः स्वयं को विकसित राष्ट्र बनाया।
रूस से भी सबक आवश्यक कि कैसे उसके टुकड़े हुए।
आपके राजनीतिज्ञ पड़ोसी राष्ट्र, विपरीत धर्म, महामारी के भय से मानसिक रूप से उलझाये रखते व राज करते।क्यूंनकी ये भय ही आपको वास्तविक चरित्र भुलवाता।
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा विभेः।।
जिस प्रकार आकाश एवं पृथ्वी न भयग्रस्त होते हैं और न इनका नाश होता है, उसी प्रकार हे मेरे प्राण! तुम भी भयमुक्त रहो। संयम के साथ निर्भिकता होना जरूरी है। डर सिर्फ ईश्वर का रखें।
हमारे अत्यधिक लोकतांत्रिक होने का भी दंड हमे मिल चुका। व अत्यधिक एकल नियंत्रण से भी अनुभव बुरा ही रहा है।इस समय जो प्रथम पंक्ति के कोरोना स्वास्थ्य योद्धाओं ने भूमिका निभाई व निभा रहे वो प्रशंसनीय है। इसमें और गिनती बढाने की आवश्यकता है।
अधिकार व कर्तव्य की सूची प्रत्येक की, किन्तु समय की आवश्यकता एक व्यापक कर्तव्य क्रांति की है।
अब समय है जागने का, क्रियाशील होने का, व राष्ट्रिय चरित्र स्थापित करने का।
ॐ नमो नारायण

