राफेल विवाद: मना करने के बाद केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सील बंद लिफाफे में बताई राफेल की कीमत

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नई दिल्ली। राफेल की कीमतों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच छिड़ा विवाद अब थम सकता है। राफेल की कीमतों का खुलासा करने से मना करने के बाद केंद्र सरकार ने सीलबंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में जानकारी दी। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट समेत सभी याचिकाकतार्ओं को यह भी बताया कि यह पूरा सौदा कैसे हुआ।
Rafael dispute: After refusing the Center told the Supreme Court the sealed envelope, the price of Rafael
राफेल की कीमत बताने के फैसले पर केंद्र सरकार का यू-टर्न 13 दिन बाद आया है। इससे पहले केंद्र ने कहा था कि राफेल की तकनीक और कीमत की जानकारी आॅफिशल सीक्रेट ऐक्ट 1923 के तहत गोपनीय है, ऐसे में इसकी जानकारी संसद से भी साझा नहीं की गई है।  रक्षा मंत्रालय से एक सीलबंद लिफाफा सीधे सुप्रीम कोर्ट के सेक्रटरी जनरल रवींद्र मैथानी के दफ्तर ले जाया गया, इसे रजिस्ट्री में भी दर्ज नहीं किया गया। यहां तक कि अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को भी इस रिपोर्ट की जानकारी नहीं दी गई।

बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार और बीजेपी के सीनियर नेताओं के बीच चली लंबी चर्चा के बाद इसका फैसला लिया गया कि सुप्रीम कोर्ट की जानकारी के लिए राफेल विमान की कीमत की जानकारी सीलबंद लिफाफे में देने से इस मामले को सुलझाने में मदद मिलेगी। साथ ही इस डील के बाद केंद्र सरकार पर उठ रहे सवालों पर लगाम लगने का फायदा आने वाले चुनाव में भी हो सकता है।

एक वरिष्ठ विधि अधिकारी ने बताया कि विभिन्न आपत्तियों के मद्देनजर सौदे के मूल्य का ब्यौरा न्यायालय में एक सीलबंद लिफाफे में दिया गया है। दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि इसके लिये भारतीय वातार्कार दल का गठन किया गया था जिसने करीब एक साल तक फ्रांस के दल के साथ बातचीत की और अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले सक्षम वित्तीय प्राधिकारी, मंत्रिमंडल की सुरक्षा मामलों की समिति, की मंजूरी भी ली गई।

दस्तावेज में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दोहराए गए आरोपों का भी जिक्र किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आॅफसेट पार्टनर के रूप में अनिल अंबानी के रिलायंस समूह की एक कंपनी का चयन करने के लिए फ्रेंच कंपनी दसॉ एविएशन को मजबूर किया ताकि उसे 30,000 करोड़ रुपये ह्यदिए जा सकें।

रिपोर्ट में कहा गया है कि रक्षा आॅफसेट दिशानिदेर्शों के अनुसार, कंपनी आॅफसेट दायित्वों को लागू करने के लिए अपने भारतीय आॅफसेट सहयोगियों का चयन करने के लिए स्वतंत्र है। दस्तावेज में विस्तार से कहा गया है कि क्यों सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस सौदे में आॅफसेट पार्टनर बनने में नाकाम रही क्योंकि दसॉ के साथ उसके कई अनसुलझे मुद्दे थे।

बता दें कि राफेल डील पर विपक्ष के आरोपों का सामना कर रही केंद्र सरकार ने सोमवार को इस सौदे से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक कर दीं। केंद्र सरकार की ओर से विमान खरीद की प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज याचिककतार्ओं को सौंप दिए गए।  केंद्र सरकार की ओर से याचिकाकर्ताओं को सौंपे गए दस्तावेजों में कहा गया है कि राफेल की खरीद में सभी प्रकियाओं का पालन किया गया।

सरकार ने बताया कि इस प्रक्रिया के लिए फ्रांस सरकार से करीब एक साल तक बात चली। सरकार ने दस्तावेजों में यह भी कहा कि कैबिनेट कमिटी आॅन सिक्यॉरिटी (सीसीएस) से अनुमति लेने के बाद समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस दस्तावेज का शीर्षक ’36 राफेल विमानों की खरीद में फैसले लेने की प्रक्रिया की विस्तार से जानकारी’ है।

केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि आॅफसेट पार्टनर चुनने में सरकार का कोई रोल नहीं है। नियमों के मुताबिक विदेशी निमार्ता किसी भी भारतीय कंपनी को बतौर आॅफसेट पार्टनर चुनने के लिए स्वतंत्र है। यूपीए के जमाने से चली आ रही रक्षा उपकरणों की खरीद प्रकिया के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया 2013 का ही पालन किया गया है।