राजबाड़ा टू रेसीडेंसी

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अरविंद तिवारी

बात यहां से शुरू करते हैंइसे कमलनाथ का घोड़ा पछाड़ दांव ही कहा जाएगा। कुछ महीने पहले अरुण यादव से मुलाकात के बाद जब कमलनाथ ने कहा था कि मेरी उनसे चुनाव को लेकर कोई बात नहीं हुई, न ही अरुण ने ऐसी कोई मंशा जाहिर की। तभी अहसास हो गया था कि ‘साहब’ कुछ अलग मूड में हैं। तब से लेकर अब तक तरह-तरह की बातें होती रहीं। आखिरकार वही हुआ जो कमलनाथ चाह रहे थे, लेकिन बात यहीं थमी अरुण को बाहर का रास्ता दिखाने के बाद कमलनाथ ने अपनी पत्नी के लिए टिकट की आस लगाकर बैठे बुरहानपुर के विधायक सुरेंद्रसिंह शेरा के मंसूबों पर भी पानी फेर ही दिया।

कोई कुछ भी कहे लेकिन निकट भविष्य में होने वाले चार उपचुनाव ने शिवराज सिंह चौहान के लिए एक अलग संकट तो पैदा कर रखा है। दिल्ली भोपाल के बीच लगातार दौड़ लगा रहे शिवराज को लेकर न जाने क्यों मध्यप्रदेश भाजपा के कई कद्दावर नेता यह कहने से परहेज नहीं कर रहे हैं कि यदि उपचुनाव के नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं रहे तो फिर मध्यप्रदेश का परिदृश्य कुछ अलग ही होगा। यही कारण है कि शिवराज कोई कसर बाकी नहीं रख रहे हैं और संगठन के अलावा अपने निजी नेटवर्क को भी मैदान में झोंक रखा है।

यह सब जानना चाहते हैं कि अरुण यादव ने आखिर क्यों मैदान छोड़ा। कृष्णमुरारी मोघे जैसे कद्दावर नेता को हराकर 16 साल पहले अपने संसदीय जीवन की शुरुआत करने वाले अरुण ने भले ही पारिवारिक कारणों का हवाला देते हुए खंडवा उपचुनाव से मुंह मोड़ लिया हो, लेकिन हकीकत इससे विपरीत है। दरअसल अरुण को खंडवा-बुरहानपुर क्षेत्र में अपनी खिसकती जमीन का अहसास हो चुका है। गृह जिले खरगोन में भी स्थितियां उनके अनुकूल नहीं हैं। वे यह जानते हैं कि यदि इस चुनाव में शिकस्त खा गए तो फिर न घर के रहेंगे न घाट के। उन्हें दुख इस बात का जरूर रहा होगा कि चुनाव न लडऩे का पत्र भी कमलनाथ ने उन्हीं से लिखवाया और वायरल भी करवाया।

इसे कांतिलाल भूरिया की समझदारी ही कहा जाएगा, जब जोबट से कांग्रेस उम्मीदवार के मुद्दे पर पार्टी के दिग्गज जिनमें कमलनाथ के अलावा भूरिया, सज्जन सिंह वर्मा, रवि जोशी और डॉ. विक्रांत भूरिया भी शामिल थे, जब विचार विमर्श के लिए बैठे तो तय हुआ कि यहां से चुनाव कौन लड़े, यह भूरिया ही तय करेंगे। दो नाम सामने थे, अलीराजपुर जिला कांग्रेस अध्यक्ष महेश पटेल और भूरिया के बेटे युवक कांग्रेस के अध्यक्ष विक्रांत भूरिया के। इस विधानसभा की तासीर से अच्छे से वाकिफ भूरिया ने बिना विलंब के कहा कि यहां से महेश को ही मौका मिलना चाहिए। खुद विक्रांत ने भी यह स्पष्ट कर दिया कि अपनी वर्तमान जिम्मेदारी के चलते वे उम्मीदवारी की दौड़ में है ही नहीं।

मंत्री कमल पटेल की बेबाकी और साफगोई की इन दिनों बड़ी चर्चा है। चाहे कैबिनेट की बैठक हो चाहे मुख्यमंत्री का अपने मंत्रियों से वन टू वन संवाद हो या फिर पार्टी फोरम पर अपनी बात रखने का मौका। पटेल बेबाकी से अपनी बात रखते हैं और यदि नौकरशाहों के कारण जनता के हित में निर्णय नहीं होने जैसी स्थिति बनती देखते हैं तो फिर खुलकर मैदान भी संभाल लेते हैं। कहा यह जा रहा है कि जब कमलनाथ सरकार की अपदस्थगी के बाद सीहोर के नजदीक एक बड़े होटल में भाजपा के विधायक एक साथ बैठे थे तब पटेल ही वह नेता थे, जिन्होंने दमदारी से यह कहा था कि हमारे सत्ता से बाहर होने का कारण नौकरशाह ही थे और यदि इस बार हम सत्ता में आते हैं तो सबसे पहले नौकरशाही पर अंकुश लगाना जरूरी होगा। इसी का अनुसरण अब वे कर रहे हैं।

राधेश्याम जुलानिया 30 सितंबर को सेवानिवृत्त हो गए। बेदाग केरियर वाले मध्य प्रदेश काडर के इस अफसर के साथ अपने सेवाकाल के अंतिम 6 महीनों में जो सलूक हुआ उसकी इन दिनों बड़ी चर्चा है। कुछ ऐसा ही मनोज श्रीवास्तव के साथ हुआ था। मजेदार बात यह है कि एक जमाने में ‘सरकार’ की आंखों के तारे रहे यह दोनों अफसर संघ के भी बहुत प्रिय पात्र रहे हैं।कहा यह जा रहा है कि श्रीवास्तव पर संघ की नजरें इनायत होने के बाद अब ‘सरकार’ के स्तर पर भी किसी नई जिम्मेदारी की चर्चा शुरू हो गई है वही जुलानिया अभी रुको और इंतजार करो की स्थिति में है।

इकबाल सिंह बैंस, अजय शर्मा बीआर नायडू के बाद अब ट्रांसपोर्ट कमिश्नर मुकेश जैन भी उन अफसरों की कतार में शामिल हो गए हैं जिनके बेटे बेटी उनके सरकारी सेवा में रहते ही आईएएस या आईपीएस हो गए। कुछ दिनों पहले ही घोषित संघ लोक सेवा आयोग के नतीजों में जैन के बेटे का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हुआ है।इनमें से बैस और नायडू के पुत्र पुत्री तो मध्य प्रदेश काडर में ही सेवाएं दे रहे।

चलते चलते

अपने पति की शराबखोरी से परेशान एक आईपीएस अफसर की पत्नी अंततः इस चेतावनी के साथ पति को छोड़कर चली गई थी जब आप शराब पीना बंद कर दोगे तब मैं वापस लौट आऊंगी उक्त अवसर का ताल्लुक YB मालवा क्षेत्र से है।

पुछल्ला

एक ही विभाग में पदस्थ दो महिलाओं के बीच आखिर पटरी क्यों नहीं बैठ रही है। इनमें से एक मंत्री हैं तो दूसरी प्रमुख सचिव। दोनों के बीच बातचीत तक बंद है और कई बार तू तू मैं मैं भी हो चुकी है। आखिर ऐसा क्यों।