तिरुअनंतपुरम। राजनीति में शायद ही ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी’ जैसा अवसर किसी नेता के हाथ लग पाता है। लेकिन, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने अपने लिए ऐसा अवसर पैदा करने के लिए ही सबरीमाला मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश का बेहद अलोकप्रिय एवं आदर्शवादी फैसला लिया। पिनराई और उनकी पार्टी सीपीएम ने 28 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बेहद उत्साहपूर्वक स्वागत किया क्योंकि इस फैसले ने पिनराई को राजनीतिक लाभ लेने के साथ-साथ केरल के ‘पुनर्जागरण का नेता’ के रूप में अपनी छवि पेश करने का बड़ा अवसर दिया। केरल सरकार के इस फैसले के पीछे राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को अलग-थलग करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
Sabrimala controversy: Kerala government has made big bets in the hope of ‘double benefits’
लैंगिक समानता की आड़
लेकिन, धर्म सहित हर क्षेत्र में लैंगिक समानता के राज्यव्यापी आंदोलन और केरल के लोगों में कुत्सित प्रथाओं से किनारा करने की जागरूकता पैदा करने के इस अभियान के पीछे पिनराई का बहुत बड़ा पॉलिटिकल अजेंडा है। दरअसल, पिनराई ने यह अभियान स्पष्ट रूप से बीजेपी और संघ परिवार को पूरी तरह निशाने पर रखकर छेड़ा। उन्होंने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर सीधे बीजेपी के साथ दो-दो हाथ कर कांग्रेस की अगुवाई वाले बड़े विपक्षी गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को केरल की राजनीतिक परिधि से बिल्कुल दूर धकेल दिया। अब वहां की राजनीतिक लड़ाई सीपीएम और बीजेपी तक सीमित हो गई।
सीएम दोहरा फायदा पाने की आस
सीपीएम के सूत्रों ने कहा कि इस रणनीति से पार्टी को चुनावी राजनीति में बड़े नुकसान की कोई आशंका नहीं है। पार्टी के एक नेता ने कहा, ‘बीजेपी के वोटर बढ़ सकते हैं, लेकिन कांग्रेस के पारंपरिक वोटरों में ही सेंध लगेगी।’ सीपीएम को उम्मीद है कि हिंदू मतदाता बीजेपी और कांग्रेस में बंट जाएंगे और अल्पसंख्यक मतदाताओं का बड़ा हिस्सा सीपीएम के पाले में आ जाएगा।
अल्पसंख्यक वोटरों के ध्रुवीकरण की चाल
मंगलवार को यूडीएफ के प्रदर्शन की आलोचना करते हुए पिनराई विजयन ने कहा था, ‘कांग्रेस अब बीजेपी की हमेशा की सबसे अच्छी दोस्त बन गई है।’ केरल में सीपीएम की राज्य इकाई के सचिव कोडियेरी बालाकृष्णन, सीपीआई की राज्य इकाई के सचिव कन्नम राजेंद्रन और एलडीएफ के संयोजक ए विजयराघवन ने मीडिया अथवा जनता को संबोधित करते वक्त हमेशा कांग्रेस और बीजेपी के अपवित्र गठबंधन का जिक्र करने का फैसला किया है। इसका मकसद बिल्कुल साफ है- केरल की 44 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी को यह बताना कि एलडीएफ ही अकेला ऐसा राजनीतिक मोर्चा है जिसमें वह अपना विश्वास व्यक्त कर सकते हैं।
पिनराई का पुराना अजेंडा
यह पहला मौका नहीं है जब पिनराई ने अल्पसंख्यकों को लुभाने की बड़ी चाल चली हो। 2009 में लोकसभा चुनाव हुआ था। उसी वर्ष उन्होंने पार्टी के स्टेट सेक्रटरी का पद संभालते ही आंतकवाद के मुकदमे से रिहा हुए कट्टरपंथी अब्दुल नासर मदनी को अपने चुनावी रथ का सारथी बना दिया था। उन्होंने विपक्षी गठबंधन यूडीएफ में शामिल मुस्लिम लीग के वोट बैंक में घात लगाने के लिए चुनाव से पहले ही मदनी की पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया था। हालांकि, इसका नतीजा बहुत बुरा हुआ और हिंदुओं की एकता ने एलडीएफ को 20 में से 16 सीटों पर धूल चटा दी।
इतनी आसान नहीं है जीत
दरअसल, हिंदू, मुसलमान और ईसाई मतादाओं के आधे-आधे हिस्से को अपने पाले में कर केरल पर राज करते रहने का सूत्र पहली बार पिनराई के गुरु एमवी राघवन ने दिया था। तब सीपीएम ने राघवन के ‘वैकल्पिक दस्तावेज (अल्टरनेट डॉक्युमेंट)’ को खारिज कर दिया था। उन्हें 1986 में पार्टी से निकाल दिया गया था। हालांकि, सीपीएम में कई लोग उनके नजरिए से प्रभावित रहे, जिनमें पिनराई भी एक हैं। हालांकि, यह सूत्र सिद्धांत में बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इस लिहाज से जमीनी परिस्थिति बहुत पेचीदा है। न सिर्फ बीजेपी बल्कि एनएसएस और एसएनडीपी जैसी प्रमुख सांप्रदायिक संस्थाएं सरकार के सामने ताल ठोंकती रहती हैं।

