आरिफ़ मिर्ज़ा
राजकुमार केसवानी के इन्तकाल की खबर भोपाल और भोपालियों के बीच भोत अफसोस के साथ सुनी गई। अगर में ये कऊं के वो बर्रुकट भोपाली थे तो कुछ गलत न होगा। उनके वालिद मरहूम लक्ष्मणदास केसवानी आज़ादी के बाद हुए बंटवारे में सिंध से हिंदुस्तान आये थे। आज़ादी की लड़ाई में भी उनका लपक योगदान रहा। राजकुमार केसवानी की पैदाइश सुल्तानिया जनाना अस्पताल भोपाल की है। सुल्तानिया बोले तो लेडी अस्पताल। इतवारे में बिरजिसिया मस्जिद के कने इंनक आबाई (पुश्तेनी ) मकान आज भी हेगा। असिल में पूरा केसवानी खनदान भोपाल की गंगा जमुनी तहजीब का नुमाइंदा है। राजकुमार भाई जित्ते ऊंचे पाए के सहाफी थे उनके क़दम उत्ते ही ज़मींन पे रेते। भोपाली तालिब-ए-इल्म के मरकज़ रहे सेफिया कालिज से उन्ने एमए करा। मियां खां इस क़दर के पढ़ाकू रहे के घण्टों लाइब्रेरी में बिता देते। इब्राहिमपूरे की पटेल और मदीना होटल बी इनके ठिये हुआ करते। छोटे भाई शशि केसवानी के मुताबिक भाई मियां मछली के इंतहाई शौकीन थे। लिहाज़ा अफगान होटल में अक्सर पाए जाते। सत्तर की दहाई में इनकीं सहाफत की इब्तिदा में ये रपट वीकली और शहरनामा अखबार निकालते। तब डिलाइट होटल में एक कमरे में इनका दफ्तर होता। यहां मनोहर आशी, देवकांत शुक्ला, प्रलेस के राजेन्द्र शर्मा, रामप्रकाश त्रिपाठी, राजेश जोशी,मंज़ूर एहतेशाम, जगत पाठक वगैरह के साथ राजकुमार साब की बैठकें होतीं। केसवानी की ज़ुबान पे भोपाली गालियां भी खुल के निकलतीं। कई दफे इनकीं टोली इमामी गेट पे तो कभी बुधवारे में नमक वाली सुलेमानी चाय के मज़े लेती। को खां… कां हो खां जैसे जुमले इनकीं जुबां पे रहते। भोपाल की पतली गलियों का राजकुमार चला गया। हिंदी पत्रकारिता को भाई इत्ता दे गए हैं के उनका वो जखीरा बरसा बरस हमारी सहाफत को चमकाता रहेगा। उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी ज़ुबानों का भेतरीन संगम पेश करने वाले इस मायानाज़ सहाफी को खिराजे अक़ीदत।

