निरंकारी सत्संग पर हमला, कहीं खालिस्तान जैसी साजिश की शुरूआत तो नहीं?

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चंडीगढ़। अमृतसर में निरंकारी सत्संग पर हुए ग्रेनेड अटैक ने न केवल पंजाब सूबे को हिला दिया है बल्कि कुछ बड़ी आशंकाएं भी खड़ी हो गई हैं। रविवार को धार्मिक डेरे के कार्यक्रम में हुए इस हमले ने 1980 के दशक की उस पंजाब की याद दिला दी है जब निरंकारियों व सिखों के बीच हिंसा ने खालिस्तान मूवमेंट को रौद्र रूप दिया और पंजाब में आतंकवाद चरम पर पहुंच गया। हालांकि इस हमले में अलकायदा और आईएसआई कनेक्शन की आशंकाओं की भी पड़ताल की जा रही है। फिलहाल राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली है।
The attack on Nirankari satsanga, not the beginning of a conspiracy like Khalistan?
निरंकारी समागम पर हुए हमले की फिलहाल कई थिअरी चर्चा में हैं। एक थिअरी सिख धर्म के आंतरिक संघर्ष की भी है, जिसने 1980 के दशक में पंजाब को आतंकवाद की आग में झोकने का काम किया था। इस पूरे मामले को समझने के लिए पहले आपको सिख-निरंकारी विवाद के बारे में जानना होगा।

दरअसल निरंकारी मिशन की शुरूआत सिख धर्म के भीतर ही एक पंथ के रूप में हुई थी। 1929 में पेशावर (अब पाकिस्तान में) में बूटा सिंह ने निरंकारी मिशन की शुरूआत की थी। निरंकारियों ने सिखों के गुरुग्रंथ साहिब को गुरु मानने की पंरपरा का बहिष्कार करते हुए जीवित गुरु को मानने की बात कही। बंटवारे के बाद दिल्ली में निरंकारियों का मुख्यालय बना। बूटा सिंह, अवतार सिंह, बाबा गुरबचन सिंह, बाबा हरदेव सिंह, माता सविंदर हरदेव और माता सुदीक्षा निरंकारियों के 6 गुरु हुए। फिलहाल माता सुदीक्षा ही निरंकारियों की गुरु हैं।

सिखों ने निरंकारी गुरु अवतार सिंह द्वारा रचित अवतारवाणी और युग पुरुष जैसी रचनाओं पर सिख धर्म और सिख गुरुओं की आलोचना का आरोप लगाया। सिखों और निरंकारियों के बीच का यही विवाद आगे चलकर हिंसक हो गया। 1980 के दशक में ही पंजाब में आतंकवाद के प्रमुख चेहरे जरनैल सिंह भिंडरावाले का भी उदय हो रहा था। भिंडरावाले की पहचान सिख कट्टरपंथी के रूप में बन रही थी और उसने निरंकारियों का खूब विरोध किया।

13 अप्रैल 1978 को अमृतसर में ही निरंकारी मिशन के एक कार्यक्रम के दौरान निरंकारियों और सिखों के बीच हिंसक संघर्ष में 16 लोग (3 निरंकारी, 13 सिख) मारे गए। इस घटना के बाद अकाल तख्त ने हुकमनामा जारी कर निरंकारियों को सिख धर्म से बाहर कर दिया, लेकिन हिंसा का यह दौर यहीं नहीं थमा। इस बीच सिखों ने प्रतिशोध लेने के लिए रणजीत सिंह नाम के एक कार्यकर्ता के नेतृत्व में 24 अप्रैल 1980 को निरंकारी गुरु गुरबचन सिंह की हत्या कर दी। इन दोनों हिंसाओं में आरोप भिंडारवाले पर लगे और उसके समर्थकों पर कई मुकदमे दर्ज हुए। इसके बाद पंजाब में आतंकवाद का खूनी दौर शुरू हो गया।