पर्यावरण बचाने की जुगत : इस फिक्र को चाहिए रिले रेस जैसा सिस्टम और जन भागीदारी

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पंकज शुक्ला
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

प्रख्यात पर्यावरणविद् और ’आज भी खरे हैं तालाब’ के लेखक स्व. अनुपम मिश्र ने लिखा है- सैकड़ों, हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक इकाई थी बनवाने वालों की, तो दहाई थी बनाने वालों की। यह इकाई, दहाई मिलकर सैकड़ा, हजार बनती थी। लेकिन पिछले 200 बरसों में नए किस्म की थोड़ी सी पढ़ाई पढ़ गए समाज ने इस इकाई, दहाई, सैकड़ा, हजार को शून्य ही बना दिया। वे लिखते हैं, इन तमाम बुरी परिस्थितियों में भी कुछ कानों में आज भी यह स्वर गूंजता है : ’अच्छे-अच्छे काम करते जाना।’

यहां अच्छे काम से उनका तात्पर्य पानी की फिक्र करने को लेकर है। मगर दुर्भाग्य है कि हम पानी की चिंता गर्मियों के मौसम में ही करते हैं। हम पानी बचाने के प्रति बारिश के मौसम तक गंभीर रहते ही नहीं और इस तरह हमारी व्यवस्था में पानी अनमोल हो जाता रहा है। ऐसे ही हमारी चिंता पेड़ों के प्रति भी मौसमी ही होती है। किसी एक दिन पेड़ लगाने और उन्हें बचाने की कसमें खा कर रस्म अदायगी हमारी आदत हो चली है।

किस्से, कहानियों, इतिहास में हमने सुना, पढ़ा है कि पहले राजा-महाराजा सड़कों के किनारे पेड़ लगाते थे, प्याऊ, तालाब, बावड़ी, कुंए, धर्मशालाएं बनवाते थे। किस्से है कि समाज इन धरोहरों की रक्षा करता था। समय के साथ शासन और समाज ने अपनी जिम्मेदारियों को नकारा, अधिकारों को अपनाया और इस तरह प्रकृति विकृत होती रही। ऐसे में अनुपम जी द्वारा कहे गए ‘अच्छे-अच्छे काम करते जाना’ के उदाहरण भी हमारे बीच मौजूद हैं। एक शासन-प्रशासन का और एक समाज के हस्तक्षेप का उदाहरण रखना काफी होगा। भोपाल की कमिश्‍नर कल्पना श्रीवास्तव की पहल पर 15 लाख पौधे लगाने का अभियान आकार ले रहा है। यह विभिन्न विभागों की जिम्मेदारी होगी और समाज के जुड़ने से इसके सफल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

जैसे होशंगाबाद संभाग में ‘नर्मदा पवित्र सर्वदा अभियान’ के साथ हुआ। यहां तत्कालीन संभागायुक्त उमाकांत उमराव ने नर्मदा नदी के रिपेरियन झोन को पुनर्जीवित करने की पहल की। इस काम में समाज साथ आ गया। नर्मदा नदी के 120 किलोमीटर क्षेत्र में लुप्त हो चुकी 418 ऐसी वनस्पतियों की खोज कर इनमें से 105 प्रकार की वनस्पतियों के डेढ़ करोड़ से अधिक बीज जुटाए गए। पौधरोपण के लिए ढाई हजार नर्मदा परिवारों का गठन कर 4 जून 2017 एवं 9 जून 2018 को आठ टन एवं 6 टन बीजों (लगभग 2 करोड़ बीजों) का रोपण किया गया। इनमें से 20 प्रतिशत से अधिक बीज अंकुरित हुए। अब यहां 13 जून को बीजरोपण किया जाएगा। खास बात यह है कि यहां उमराव की जगह रवींद्र मिश्रा आयुक्त हो गए हैं और समाज की ओर से कौशलेश तिवारी सहित सैकड़ों की संख्या में जनता और सरकारी अमला इस अभियान को सफल बनाने में जुटा हुआ है। यानि, व्यक्ति बदले मगर अभियान न रुका।

ऐसे कार्यों में रिले रेस की तरह जिम्मेदारी संभालने की दरकार है। ऐसा न हो कि एक अफसर के बदलते ही उसकी योजनाओं को भी विराम लग जाए। होना तो यह चाहिए कि पर्यावरण सरंक्षण की चिंताएं प्रशासन तंत्र के कामकाज के प्रोटोकॉल का हिस्सा बनाई जाएं। मसलन, सड़क/हाईवे के किनारे पेड़ लगाने और उसे संवारने का जिम्मा सड़क बनाने और उसका रखरखाव करने वाली ठेकेदार फर्म को दिया जाए। टोल नाकों का संचालन करने वाले निश्‍चित दूरी तक सड़क किनारे लगे पौधों की देखभाल करें। इसी तरह, खदान के ठेकेदार अपनी बंद हो चुकी खदानों को तालाबों में तब्दील करें और उनके आसपास पौधों को लगा, पेड़ बनने तक उनकी देखभाल करें। निर्माण और विकास एजेंसियों की टेंडर शर्तों में पौधरोपण तथा उनकी पेड़ होने तक देखभाल आवश्यक कार्य शर्त हो। सिस्टम के सिस्टम को थोड़ा तोड़ा जाए और उसमें पर्यावरण की चिंता को एक शर्त के रूप में शामिल किया जाए। तब तो हम पर्यावरण में हो रही चिंताजनक तब्दीलियों से दो-दो हाथ कर पाएंगे, अन्यथा तो काम न करने के हजार बहाने।